सानिया मिर्जा ने कैसे बदली भारतीय महिला टेनिस की तस्वीर

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 13-09-2026
Sania Mirza: The journey from the tennis court to becoming the world's number 1 player
Sania Mirza: The journey from the tennis court to becoming the world's number 1 player

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली

जिस उम्र में ज्यादातर बच्चे खेल को सिर्फ मनोरंजन के तौर पर देखते हैं, उस उम्र में हैदराबाद की एक छह साल की बच्ची ने टेनिस रैकेट थाम लिया था। शायद तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि यही बच्ची आगे चलकर भारतीय महिला टेनिस की सबसे बड़ी पहचान बनेगी, ग्रैंड स्लैम खिताब जीतेगी और दुनिया की नंबर-1 डबल्स खिलाड़ी बनेगी।

यह कहानी है सानिया मिर्जा की—एक ऐसी खिलाड़ी जिसने सिर्फ टेनिस में भारत का नाम रोशन नहीं किया, बल्कि भारतीय महिलाओं की खेलों में मौजूदगी को भी नई दिशा दी।
 
 
15 नवंबर 1986 को जन्मीं सानिया मिर्जा का शुरुआती जीवन हैदराबाद में बीता। उन्होंने महज छह साल की उम्र में टेनिस खेलना शुरू किया। उनके पिता इमरान मिर्जा ने उनकी प्रतिभा को पहचानते हुए उनके प्रशिक्षण में अहम भूमिका निभाई। 
 
शुरुआती दौर में परिवार को यह तय करना था कि सानिया के टेनिस के सपने को किस तरह आगे बढ़ाया जाए, क्योंकि पेशेवर टेनिस आसान और सस्ता खेल नहीं था। प्रशिक्षण, उपकरण, टूर्नामेंट और लगातार यात्रा के लिए परिवार को काफी मेहनत करनी पड़ी।
सानिया ने बहुत कम उम्र में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनानी शुरू कर दी। 
 
जूनियर प्रतियोगिताओं से आगे बढ़ते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कदम रखा। 2002 के नेशनल गेम्स उनके करियर का अहम मोड़ साबित हुए। उस समय वह सिर्फ 16 साल की थीं। सानिया ने बाद में खुद माना कि नेशनल गेम्स ने उनके अंतरराष्ट्रीय करियर को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उन्हें बड़े मंच के लिए आत्मविश्वास दिया।
 
2003 में सानिया ने पेशेवर टेनिस में कदम रखा और जल्द ही भारतीय टेनिस की सबसे चर्चित युवा खिलाड़ियों में शामिल हो गईं। 2004 में उन्होंने हैदराबाद में डबल्स खिताब जीता और इसी दौर में उनके खेल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तेजी से पहचान बनाई।
 
 
इसके बाद 2005 का साल उनके करियर में ऐतिहासिक साबित हुआ। अपने घरेलू मैदान पर आयोजित हैदराबाद ओपन में उन्होंने अपना पहला WTA सिंगल्स खिताब जीता और WTA टूर पर सिंगल्स खिताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। उसी साल उन्हें WTA Newcomer of the Year भी चुना गया।
 
सानिया की सफलता सिर्फ ट्रॉफियों तक सीमित नहीं थी। वह भारतीय समाज में महिलाओं और खेल को लेकर बनी कई धारणाओं को चुनौती देने वाली खिलाड़ी भी बनीं। 
 
कोर्ट पर उनका आत्मविश्वास, आधुनिक खेल परिधान और बेबाक अंदाज कई बार चर्चा का विषय बना। लेकिन सानिया ने आलोचनाओं के बजाय अपने प्रदर्शन को जवाब बनाया।
 
संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था ने भी उन्हें खेलों में लैंगिक रूढ़ियों को चुनौती देने वाली और युवा लड़कियों को अपने लक्ष्य के लिए आगे बढ़ने की प्रेरणा देने वाली खिलाड़ी के रूप में रेखांकित किया है।
 
सिंगल्स में सानिया ने 2007 में अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ विश्व रैंकिंग नंबर 27 हासिल की। 
 
वह उस समय भारत की सबसे ऊंची रैंक वाली महिला सिंगल्स खिलाड़ी बनीं। हालांकि कलाई की चोट समेत कई शारीरिक परेशानियों ने उनके सिंगल्स करियर को प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने डबल्स पर अधिक ध्यान देना शुरू किया और यहीं से उनके करियर ने एक नया और ऐतिहासिक मोड़ लिया।
 
डबल्स में सानिया ने दुनिया की कई दिग्गज खिलाड़ियों के साथ जोड़ी बनाई, लेकिन मार्टिना हिंगिस के साथ उनकी जोड़ी सबसे ज्यादा यादगार बनी। 
 
2015 में दोनों ने लगातार तीन ग्रैंड स्लैम खिताब जीते—विंबलडन 2015, यूएस ओपन 2015 और ऑस्ट्रेलियन ओपन 2016। इसी दौर में सानिया दुनिया की नंबर-1 डबल्स खिलाड़ी बनीं और ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला टेनिस खिलाड़ी का इतिहास रचा।
 
 
सानिया ने महिला डबल्स के अलावा मिक्स्ड डबल्स में भी भारत को गौरवान्वित किया। महेश भूपति के साथ उन्होंने 2009 ऑस्ट्रेलियन ओपन का मिक्स्ड डबल्स खिताब जीता। इसके बाद 2012 फ्रेंच ओपन और 2014 यूएस ओपन में भी मिक्स्ड डबल्स ग्रैंड स्लैम खिताब अपने नाम किए। कुल मिलाकर उनके नाम छह ग्रैंड स्लैम खिताब रहे—तीन महिला डबल्स और तीन मिक्स्ड डबल्स में।
 
भारत के लिए सानिया की उपलब्धियां सिर्फ ग्रैंड स्लैम तक सीमित नहीं रहीं। उन्होंने एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और एफ्रो-एशियन गेम्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया और कई पदक जीते। संयुक्त राष्ट्र महिला संस्था के अनुसार उनके नाम भारत के लिए कुल 14 अंतरराष्ट्रीय पदक रहे, जिनमें एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक भी शामिल है।
 
उनके करियर की एक खास बात यह भी रही कि वह सिर्फ अपनी उपलब्धियों के लिए नहीं, बल्कि भारतीय महिला खिलाड़ियों की अगली पीढ़ी के लिए रास्ता बनाने के कारण भी महत्वपूर्ण बनीं।
 
उन्होंने बार-बार युवा लड़कियों से कहा कि उन्हें अपने सपनों पर भरोसा करना चाहिए और समाज की तय सीमाओं से आगे बढ़ना चाहिए। उनके अपने करियर में भी कई ऐसे मौके आए जब आलोचना और दबाव के बावजूद उन्होंने पीछे हटने के बजाय अपना रास्ता चुना। WTA के साथ अपने विदाई संदेश में सानिया ने युवा लड़कियों को खुद पर भरोसा रखने और अपने फैसलों के लिए खड़े होने का संदेश दिया था।
 
 
सानिया को 2004 के प्रदर्शन के लिए अर्जुन अवॉर्ड से सम्मानित किया गया। राष्ट्रपति भवन में 29 अगस्त 2005 को आयोजित समारोह में राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। उस समय वह भारतीय महिला टेनिस में उभरती हुई सबसे बड़ी प्रतिभाओं में शामिल थीं। सरकारी रिकॉर्ड में उनका नाम 2004 के अर्जुन पुरस्कार विजेताओं में टेनिस के लिए दर्ज है।
 
अर्जुन अवॉर्ड के बाद भी सानिया का सफर लगातार आगे बढ़ता रहा। उन्हें 2015 में पद्म भूषण से भी सम्मानित किया गया। उसी साल उन्होंने डबल्स में विश्व नंबर-1 बनकर भारतीय टेनिस के इतिहास में एक और बड़ा अध्याय जोड़ा।
 
सानिया की प्रेरक कहानी सिर्फ उनकी जीतों में नहीं, बल्कि मुश्किल परिस्थितियों में वापसी में भी छिपी है। चोटों ने उनके करियर को कई बार प्रभावित किया, लेकिन उन्होंने हर बार खुद को दोबारा तैयार किया। 
 
2017 के बाद उन्होंने प्रोफेशनल टूर से ब्रेक लिया और 2020 में वापसी करते हुए होबार्ट में डबल्स खिताब जीता। इसके बाद भी उन्होंने उम्र, चोट और निजी जिम्मेदारियों के बीच अपने खेल को जारी रखा।
2023 में सानिया मिर्जा ने पेशेवर टेनिस से विदाई ली। 
 
उनका आखिरी ग्रैंड स्लैम अभियान ऑस्ट्रेलियन ओपन 2023 में रहा, जहां उन्होंने रोहन बोपन्ना के साथ मिक्स्ड डबल्स का फाइनल खेला। वह खिताब नहीं जीत सकीं, लेकिन ग्रैंड स्लैम फाइनल तक पहुंचना उनके लंबे और शानदार करियर का प्रतीक बना रहा।
 
लेकिन रैकेट को अलविदा कहने का मतलब सानिया के लिए खेल से दूर होना नहीं था। उन्होंने अपने अनुभव को अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों तक पहुंचाने का रास्ता चुना। सैनिया मिर्जा टेनिस अकादमी के जरिए वह युवा खिलाड़ियों को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन देने के काम से जुड़ी हैं।
 
अकादमी का उद्देश्य भारत में विश्वस्तरीय टेनिस प्रशिक्षण उपलब्ध कराना और प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को आगे बढ़ने का अवसर देना है। ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से आने वाली प्रतिभाओं को भी सहायता देने की व्यवस्था अकादमी के विजन का हिस्सा है।
 
 
2026 में सानिया ने अपनी अकादमी में High Performance Tennis Programme शुरू किया है, जिसका उद्देश्य युवा और प्रतिस्पर्धी खिलाड़ियों को तकनीक, फिटनेस, मैच रणनीति और मानसिक मजबूती के स्तर पर अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप तैयार करना है। यानी जिस यात्रा की शुरुआत उन्होंने छह साल की उम्र में एक टेनिस रैकेट से की थी, अब उसी अनुभव से वह अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों के लिए रास्ता तैयार कर रही हैं।
 
सानिया आज खुद प्रोफेशनल टेनिस नहीं खेलतीं, लेकिन खेल की दुनिया से उनका रिश्ता पहले से ज्यादा व्यापक हो गया है। वह युवा खिलाड़ियों की मेंटरिंग, महिला खेलों को बढ़ावा देने और खेल से जुड़े नए उपक्रमों में सक्रिय हैं।
 
2026 में उन्होंने ‘The Next Set’ नाम से भारत की उभरती महिला खिलाड़ियों को पेशेवर सहयोग देने वाली पहल भी शुरू की है।
 
हैदराबाद की छह साल की उस बच्ची से लेकर दुनिया की नंबर-1 डबल्स खिलाड़ी और छह बार की ग्रैंड स्लैम चैंपियन बनने तक, सानिया मिर्जा की कहानी भारतीय खेलों में एक बदलाव की कहानी है। उन्होंने सिर्फ रिकॉर्ड नहीं बनाए, बल्कि यह साबित किया कि भारत की बेटियां अंतरराष्ट्रीय खेलों के सबसे बड़े मंच पर न सिर्फ पहुंच सकती हैं, बल्कि वहां शीर्ष पर भी खड़ी हो सकती हैं। 
 

अर्जुन अवॉर्ड से शुरू हुआ सम्मान का सिलसिला पद्म भूषण और विश्व नंबर-1 की उपलब्धि तक पहुंचा, लेकिन सानिया की सबसे बड़ी विरासत शायद वह आत्मविश्वास है, जो उन्होंने हजारों युवा लड़कियों को दिया—अपने सपने चुनो, उन पर भरोसा करो और दुनिया को अपनी शर्तों पर जवाब दो।