फुटबॉल से कुश्ती तक का सफर, सुजीत कलकल ने एशियाई खेलों में जीता स्वर्ण

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 05-10-2026
From football to wrestling: Sujeet Kalkal wins gold at the Asian Games.
From football to wrestling: Sujeet Kalkal wins gold at the Asian Games.

 

नई दिल्ली

भारतीय पहलवान सुजीत कलकल ने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर देश का नाम रोशन किया है। उनकी इस ऐतिहासिक उपलब्धि के पीछे वर्षों की मेहनत, अनुशासन और परिवार का सहयोग रहा है। कभी फुटबॉल खेलने वाले सुजीत ने कुश्ती में अपनी पहचान बनाई। खास बात यह है कि खेल के साथ पढ़ाई में भी उनका प्रदर्शन शानदार रहा। वह 12वीं कक्षा में टॉपर रहे और फिलहाल अंग्रेजी में एमए की पढ़ाई कर रहे हैं।

सुजीत के पिता दयानंद कलकल, जो खुद राष्ट्रीय स्तर के पूर्व पहलवान और उनके कोच भी हैं, ने अपने बेटे की सफलता पर खुशी जाहिर करते हुए उसके संघर्ष और खेल के सफर के बारे में बताया। सुजीत की बहन यशस्वी ने भी उनकी उपलब्धि पर गर्व जताया और कहा कि अब उनका अगला लक्ष्य लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 में देश के लिए पदक जीतना है।

पिछड़ने के बाद शानदार वापसी कर जीता स्वर्ण

सुजीत कलकल ने पुरुषों की फ्रीस्टाइल 65 किलोग्राम कुश्ती के फाइनल में ताजिकिस्तान के अब्दुलमजीद कुदिएव को हराकर स्वर्ण पदक हासिल किया। मुकाबले में एक समय सुजीत 2-9 से पिछड़ रहे थे और मैच खत्म होने में केवल एक मिनट 40 सेकंड का समय बचा था। इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। लगातार टेकडाउन करते हुए उन्होंने मुकाबले का रुख पलट दिया और मैच समाप्त होने से 11 सेकंड पहले जीत दर्ज कर ली।

इस जीत के साथ सुजीत ने भारत को एशियाई खेलों में कुश्ती का स्वर्ण पदक दिलाया। इससे पहले 2018 के जकार्ता-पालेमबांग एशियाई खेलों में बजरंग पूनिया और विनेश फोगाट ने कुश्ती में स्वर्ण पदक जीते थे।

आइची-नागोया 2026 एशियाई खेलों में भारतीय पहलवानों का प्रदर्शन छह दशकों से अधिक समय में देश के सर्वश्रेष्ठ अभियानों में शामिल रहा। भारत ने कुश्ती में कुल छह पदक जीते, जिनमें दो स्वर्ण, दो रजत और दो कांस्य पदक शामिल हैं। अमन ने पुरुषों की 57 किलोग्राम फ्रीस्टाइल स्पर्धा में स्वर्ण पदक जीता, जबकि सुजीत ने 65 किलोग्राम वर्ग में बाजी मारी। अंतिम पंघाल और नितेश सिवाच ने रजत, जबकि दीपक पूनिया और सुनील कुमार ने कांस्य पदक हासिल किए।

फुटबॉल से शुरू हुआ था खेल का सफर

समाचार एजेंसी एएनआई से बातचीत में सुजीत के पिता दयानंद ने बताया कि शुरुआत में उनके बेटे की दिलचस्पी फुटबॉल में थी। वह फुटबॉल खेलते थे, लेकिन बाद में दयानंद ने उन्हें कुश्ती की ओर प्रेरित किया।

दयानंद ने कहा, "शुरुआत में मैंने उसे फुटबॉल खेलने दिया। उसकी रुचि फुटबॉल में थी। धीरे-धीरे मैंने उसे कुश्ती की तरफ बढ़ने के लिए प्रेरित किया। समय के साथ उसने कुश्ती को पूरी तरह अपना लिया। 12वीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते वह इस खेल में पूरी तरह ढल चुका था।"

उन्होंने बताया कि सुजीत ने खेल के साथ पढ़ाई में भी बेहतरीन प्रदर्शन किया। वह विज्ञान की नॉन मेडिकल स्ट्रीम के छात्र थे और अपनी कक्षा में टॉपर रहे। पिता ने बेटे से यह भी पूछा था कि वह आगे पढ़ाई करना चाहता है या कुश्ती को अपना करियर बनाना चाहता है।

दयानंद के मुताबिक, किसी भी खिलाड़ी के लिए शिक्षा बेहद जरूरी है। पढ़ाई से व्यक्ति की सोचने-समझने की क्षमता बढ़ती है और जीवन में आगे बढ़ने के अवसर मिलते हैं।

उन्होंने कहा, "शुरुआत में पढ़ाई को प्राथमिकता देना जरूरी है। हर खिलाड़ी को शिक्षा हासिल करनी चाहिए। इससे दिमाग तेज होता है, जीवन बेहतर बनता है और खेल में प्रदर्शन सुधारने में भी मदद मिलती है।"

पिता ने बताया स्वर्ण पदक का राज

सुजीत की सफलता पर खुशी जाहिर करते हुए दयानंद ने कहा कि एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतना पूरे देश के लिए गर्व का क्षण है। यह उपलब्धि खिलाड़ी की मेहनत, समर्पण और देश के लिए कुछ कर गुजरने की भावना का परिणाम है।

उन्होंने कहा कि स्वर्ण पदक हर खिलाड़ी का सपना होता है, क्योंकि इससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर देश का तिरंगा सबसे ऊंचे स्थान पर पहुंचता है। उनके मुताबिक, सुजीत की निरंतर सफलता के पीछे उसकी कड़ी मेहनत और देश के लिए पदक जीतने का जुनून है।

सुजीत इससे पहले इसी साल बिश्केक में आयोजित एशियाई कुश्ती चैंपियनशिप में 65 किलोग्राम वर्ग का स्वर्ण पदक जीत चुके हैं। उन्होंने पिछले साल अंडर-23 स्तर पर भी स्वर्ण पदक हासिल किया था, जबकि 2022 में अंडर-20 प्रतियोगिता में कांस्य पदक जीता था।

एशियाई खेलों के फाइनल में पिछड़ने के बाद जिस तरह उन्होंने वापसी की, उससे उनकी मानसिक मजबूती, धैर्य और दबाव में सही समय पर दांव लगाने की क्षमता सामने आई है। इस प्रदर्शन के बाद लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 में उनसे पदक की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

बहन यशस्वी को भाई की उपलब्धि पर गर्व

सुजीत की बहन यशस्वी ने भी उनकी जीत पर खुशी जाहिर की। उन्होंने कहा कि परिवार को अपने भाई पर गर्व है। मुकाबले में पिछड़ने के बावजूद सुजीत ने जिस तरह जीत हासिल की, वह उनके लिए ऐतिहासिक पल है।

यशस्वी ने कहा, "हम सभी बेहद खुश हैं कि उसने स्वर्ण पदक जीता है। उसने कहा कि वह भारत के लिए स्वर्ण पदक लेकर आया है। मुकाबले के आखिरी चरण में उसने पूरा खेल पलट दिया और इतिहास रच दिया। अब उसका अगला लक्ष्य लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 है। हमें उस पर बहुत गर्व है। जय हिंद!"

अपने भाई के संघर्ष के बारे में बात करते हुए यशस्वी ने कहा कि उन्होंने सुजीत की यात्रा को करीब से तो नहीं देखा, लेकिन उसके संघर्ष, दर्द और घंटों की मेहनत के बारे में बहुत कुछ सुना है। उन्होंने कहा कि सुजीत ने अपनी सफलता के लिए पूरी लगन और मेहनत से काम किया है। वह कुश्ती की दुनिया में उभरता हुआ सितारा है।

पढ़ाई में भी अव्वल हैं सुजीत

यशस्वी ने बताया कि सुजीत खेल के साथ पढ़ाई में भी हमेशा अच्छा प्रदर्शन करते रहे हैं। वह स्कूल में 12वीं कक्षा के टॉपर थे और फिलहाल अंग्रेजी विषय में एमए की पढ़ाई कर रहे हैं। पढ़ाई के अलावा दूसरी गतिविधियों में भी उनकी रुचि रही है।

परिवार अब सुजीत की इस बड़ी उपलब्धि का जश्न मनाने की तैयारी कर रहा है। यशस्वी के अनुसार, सुजीत पहले दिल्ली में परिवार के साथ जश्न मनाएंगे। इसके बाद गांव में भी लोगों के साथ खुशी साझा करने की योजना है। हालांकि, गांव में होने वाले समारोह की तारीख और बाकी तैयारियां अभी तय नहीं हुई हैं।

सुजीत कलकल की सफलता यह दिखाती है कि खेल और शिक्षा को साथ लेकर चला जा सकता है। फुटबॉल से शुरुआत करने वाले सुजीत ने कुश्ती में एशियाई चैंपियन बनने तक का सफर तय किया है। अब उनकी नजर ओलंपिक 2028 पर है, जहां वह भारत के लिए एक और बड़ी उपलब्धि हासिल करने का लक्ष्य लेकर उतरेंगे।