अमनप्रीत सिंह
कहते हैं कि अगर हौसला फौलादी हो तो फटे हुए जूते भी मंजिल का रास्ता नहीं रोक सकते। पाकिस्तान के नए टेनिस सनसनी मुहम्मद शोएब की कहानी कुछ ऐसी ही है। एक समय था जब शोएब के पास टेनिस खेलने के लिए न तो ढंग के जूते थे और न ही किट। वे चप्पल पहनकर और सलवार-कमीज में टेनिस कोर्ट पर अभ्यास करते थे।
उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वे खेल के जरूरी संसाधन खरीद सकें। कई बार अभ्यास के दौरान उनके पुराने जूतों के तलवे फट जाते थे। इसकी वजह से उनके पैरों में छाले पड़ जाते और खून तक निकलने लगता था। लेकिन शोएब ने कभी हार नहीं मानी। उन्होंने पेशावर की तपती गर्मी में दोपहर के उस वक्त अभ्यास किया जब कोर्ट खाली रहता था। उनकी यह जिद रंग लाई और आज वे पूरे पाकिस्तान के हीरो बन गए हैं।
संघर्षों की तपिश से निकला चैंपियन
20साल के मुहम्मद शोएब ने रविवार को इस्लामाबाद में इतिहास रच दिया। उन्होंने वह कर दिखाया जो पिछले दो दशकों में कोई पाकिस्तानी खिलाड़ी नहीं कर पाया था। शोएब ने आईटीएफ फ्यूचर्स का एकल खिताब जीतकर पाकिस्तान में टेनिस के 20साल के सूखे को खत्म कर दिया। वे देश के इतिहास में यह उपलब्धि हासिल करने वाले महज तीसरे खिलाड़ी हैं। उनसे पहले केवल ऐसाम-उल-हक कुरैशी और अकील खान ने ही यह मुकाम हासिल किया था।
शोएब की यह जीत इसलिए भी बड़ी है क्योंकि आखिरी बार 2007में अकील खान ने लाहौर में फ्यूचर्स टूर्नामेंट जीता था। उसी साल ऐसाम-उल-हक ने दिल्ली में चैलेंजर खिताब अपने नाम किया था। तब से अब तक पाकिस्तान एकल टेनिस में किसी बड़ी सफलता को तरस रहा था। पेशेवर टेनिस सर्किट में भले ही यह खिताब निचले स्तर का माना जाए लेकिन पाकिस्तान जैसे देश के लिए यह किसी विश्व कप से कम नहीं है।
बॉल बॉय से एटीपी रैंकिंग तक का सफर
शोएब का सफर किसी फिल्मी कहानी जैसा लगता है। उन्होंने पेशावर में एक 'बॉल बॉय' के तौर पर टेनिस की दुनिया में कदम रखा था। वे कोर्ट के बाहर से गेंदें उठाकर खिलाड़ियों को देते थे। इसी दौरान उनके भीतर टेनिस के प्रति प्रेम जगा। उन्होंने अपने भाई शाह हुसैन के नक्शेकदम पर चलना शुरू किया। उनके मामा रोमन गुल ने उन्हें खेल की बारीकियां सिखाईं।
शोएब के पिता हैदर हुसैन एक दिहाड़ी मजदूर हैं। वे खेतों में कड़ी मेहनत करके दिन के 500से 600रुपये कमा पाते हैं। गरीबी का आलम यह था कि बारिश के दिनों में परिवार को खाने तक के लाले पड़ जाते थे। उनके पिता अक्सर शोएब को टेनिस छोड़ने की सलाह देते थे। वे चाहते थे कि शोएब पढ़ाई करें और कोई ऐसी नौकरी करें जिससे घर का गुजारा हो सके। पिता का मानना था कि टेनिस अमीरों का खेल है और उनके जैसे गरीब परिवार के लिए यह एक महंगी विलासिता है।
मां की ममता और अटूट भरोसा
जब पिता हार मानने को कहते थे तब शोएब की मां उनकी ढाल बनकर खड़ी होती थीं। शोएब बताते हैं कि उनकी मां ने हमेशा उनका हौसला बढ़ाया। वे कहती थीं कि अगर तुम कड़ी मेहनत करोगे तो एक दिन सबको गलत साबित कर दोगे। मां के इसी भरोसे ने शोएब को टूटने नहीं दिया। संसाधनों की कमी को उन्होंने अपनी ताकत बनाया। वे स्थानीय बाजारों से पुराने रैकेट और घिसे हुए जूते खरीदते थे। जब जूते नहीं मिलते थे तो वे चप्पलों में ही अभ्यास शुरू कर देते थे।
अभ्यास की परिस्थितियां भी उनके पक्ष में नहीं थीं। उनके पास नई गेंदें खरीदने के पैसे नहीं थे। वे पुरानी गेंदों को पानी से गीला कर लेते थे ताकि उनकी रफ्तार कम हो जाए और वे लंबे समय तक चल सकें। पेशावर क्लब के कोर्ट पर उन्हें दोपहर की भीषण गर्मी में पसीना बहाना पड़ता था। ऐसा इसलिए क्योंकि उस वक्त बड़े और अमीर खिलाड़ी कोर्ट छोड़ देते थे और शोएब जैसे लड़कों को अभ्यास का मौका मिलता था।
एक अंक का लक्ष्य और मिल गया खिताब
इस्लामाबाद में जब यह टूर्नामेंट शुरू हुआ तब शोएब का इरादा बहुत छोटा था। वे सिर्फ एक एटीपी अंक हासिल करना चाहते थे ताकि उनकी रैंकिंग शुरू हो सके। उन्हें अपनी पिछली असफलताओं की वजह से खुद पर थोड़ा शक भी था। वे अक्सर बड़े खिलाड़ियों के खिलाफ बढ़त बनाने के बाद मैच हार जाते थे। लेकिन इस बार इस्लामाबाद की मिट्टी ने उनका साथ दिया।
पहला अंक मिलते ही शोएब का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुँच गया। उन्होंने बिना किसी डर के खेलना शुरू किया। उन्होंने टूर्नामेंट के शीर्ष वरीयता प्राप्त खिलाड़ी को हराकर सबको चौंका दिया। शोएब ने खुद से वादा किया था कि वे अपना 100प्रतिशत देंगे ताकि बाद में कोई पछतावा न रहे। वे फाइनल तक पहुँचते समय किसी रिकॉर्ड या इतिहास के बारे में नहीं सोच रहे थे। वे बस हर आने वाले अंक पर ध्यान लगा रहे थे।
बिना रैंकिंग से सीधे टॉप तक
टूर्नामेंट खत्म होते-होते शोएब के पास केवल एक अंक नहीं बल्कि 15एटीपी अंक और विजेता की ट्रॉफी थी। सिर्फ एक हफ्ते के भीतर शोएब बिना रैंकिंग वाले खिलाड़ी से पाकिस्तान के नंबर एक एकल टेनिस खिलाड़ी बन गए। यह जीत पाकिस्तान के उस युवा तबके के लिए एक मिसाल है जो अभावों में जी रहा है। शोएब ने साबित कर दिया कि खेल के मैदान पर बैंक बैलेंस नहीं बल्कि खिलाडी का जज्बा बोलता है।
पाकिस्तान में टेनिस को लंबे समय से वह समर्थन नहीं मिला जिसका वह हकदार था। क्रिकेट के जुनून के बीच टेनिस कहीं खो सा गया था। लेकिन शोएब की इस जीत ने एक बार फिर उम्मीद जगाई है। पेशावर की गलियों से निकलकर इस्लामाबाद के कोर्ट पर तिरंगा (पाकिस्तानी झंडा) लहराने वाले शोएब अब विश्व टेनिस में अपनी पहचान बनाना चाहते हैं। उनकी यह कहानी करोड़ों युवाओं को यह संदेश देती है कि अगर आंखों में सपने हों और दिल में जिद तो आसमान भी झुकाया जा सकता है।