हाजी सैयद सलमान चिश्ती
आज की दुनिया अस्थिर है। कई हिस्सों में युद्ध चल रहे हैं। राजनीतिक तनाव बढ़ रहे हैं। हिंसा और अविश्वास का माहौल गहरा हो रहा है। ऐसे समय में एक बुनियादी सवाल फिर सामने खड़ा होता है। क्या युद्ध कभी नैतिक हो सकता है। और अगर संघर्ष अपरिहार्य हो जाए तो उसकी सीमाएं क्या हों।
मानव इतिहास में लगभग हर सभ्यता ने इस सवाल पर विचार किया है। धर्मों और आध्यात्मिक परंपराओं ने भी युद्ध और शांति की नैतिकता को समझाने की कोशिश की है। इस्लामी परंपरा में भी इस विषय पर गहरी चर्चा मिलती है। खासकर सूफी दृष्टि से युद्ध को कभी शक्ति के प्रदर्शन या विजय के उत्सव के रूप में नहीं देखा गया। उसे एक दुखद परिस्थिति माना गया है। ऐसी स्थिति जो केवल अन्याय और अत्याचार को रोकने के लिए सीमित रूप में सामने आती है।
सूफी विचार का आधार एक गहरी सच्चाई है। सबसे बड़ा युद्ध मैदान में नहीं होता। वह इंसान के अपने भीतर होता है।इस्लामी आध्यात्मिक शिक्षाओं में संघर्ष के दो रूप बताए गए हैं। पहला बाहरी संघर्ष। यानी अन्याय और अत्याचार के खिलाफ खड़ा होना। दूसरा संघर्ष उससे भी बड़ा है। यह इंसान के अपने अहंकार के खिलाफ संघर्ष है। गुस्सा, लालच, घमंड और नफरत के खिलाफ लड़ाई। इस आंतरिक संघर्ष को इस्लामी परंपरा में जिहाद अल नफ्स कहा गया है।
हजरत मुहम्मद ने इस आंतरिक संघर्ष को बड़ा संघर्ष बताया है। यानी असली जंग इंसान को अपने भीतर लड़नी होती है।आज के समय में यह शिक्षा और भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। कोई भी समाज या नेतृत्व अगर अपने अहंकार और लालच से मुक्त नहीं है तो वह युद्ध में नैतिकता का दावा नहीं कर सकता। सूफी संतों ने हमेशा चेतावनी दी है कि जब युद्ध में अहंकार और बदले की भावना शामिल हो जाती है तो न्याय की जगह जल्दी ही अन्याय ले लेता है।
कुरआन में युद्ध की अनुमति दी गई है लेकिन बहुत स्पष्ट सीमाओं के साथ। यह अनुमति केवल रक्षा के लिए है। केवल तब जब अन्याय और आक्रमण को रोकना जरूरी हो जाए। कुरआन का निर्देश साफ है। जो तुमसे लड़ते हैं उनसे लड़ो। लेकिन सीमा पार मत करो।
यह शिक्षा बहुत गहरी है। इसका मतलब यह है कि युद्ध को विस्तार, बदले या राजनीतिक महत्वाकांक्षा का साधन नहीं बनाया जा सकता। उसका उद्देश्य केवल मानव गरिमा की रक्षा होना चाहिए।इस्लामी परंपरा में युद्ध के दौरान भी कई मानवीय नियम बताए गए हैं। पैगंबर मुहम्मद ने स्पष्ट रूप से महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को नुकसान पहुंचाने से मना किया। साधुओं और धार्मिक व्यक्तियों को भी सुरक्षित रखने का निर्देश दिया गया। खेती को नष्ट करने की अनुमति नहीं दी गई। पानी के स्रोतों को नुकसान पहुंचाने से रोका गया। पूजा स्थलों को भी सुरक्षित रखने की शिक्षा दी गई।

यह नियम चौदह सौ साल पहले बताए गए थे। आज जब दुनिया आधुनिक अंतरराष्ट्रीय कानून और युद्ध संबंधी मानवीय संधियों की बात करती है तो उनके मूल सिद्धांत भी कुछ ऐसे ही हैं।कुरआन इंसानियत को एक परिवार की तरह देखता है। सब लोग एक ही ईश्वर की रचना हैं। इसलिए अंतिम लक्ष्य युद्ध नहीं बल्कि मेल मिलाप है। न्याय के साथ दया है।
महान सूफी कवि जलालुद्दीन रूमी ने लिखा है। सही और गलत के विचारों से आगे एक मैदान है। मैं तुम्हें वहां मिलूंगा।सूफी परंपरा के लिए वह मैदान इंसान के दिल का मैदान है। जहां इंसान अपने भीतर की रोशनी को पहचानता है।
युद्ध के समय भी इंसान की गरिमा खत्म नहीं होती। यह विचार सूफी परंपरा का मूल है। इतिहास में इसका सबसे सुंदर उदाहरण मक्का की विजय में दिखाई देता है।कई वर्षों तक अत्याचार और संघर्ष झेलने के बाद जब पैगंबर मुहम्मद मक्का लौटे तो उनके पास शक्ति थी। वह चाहें तो बदला ले सकते थे। लेकिन उन्होंने बदले की जगह क्षमा को चुना। अपने पुराने विरोधियों को आम माफी दे दी।
सूफी परंपरा इस घटना को सबसे बड़ी नैतिक विजय मानती है। असली जीत दुश्मन को हराने में नहीं है। असली जीत दिल में मौजूद नफरत को हराने में है।आज के दौर में एक बड़ी समस्या यह भी है कि कई बार धर्म का इस्तेमाल हिंसा को सही ठहराने के लिए किया जाता है। सूफी विद्वानों ने हमेशा इसके खिलाफ आवाज उठाई है। उन्होंने कहा है कि धर्म सत्ता की महत्वाकांक्षा का साधन नहीं बनना चाहिए।
धर्म का काम शक्ति को सीमित करना है। उसे हिंसा का औजार नहीं बनाना चाहिए।अजमेर शरीफ की दरगाह से भी यही संदेश सदियों से दिया जाता रहा है। महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की शिक्षा बहुत सरल है। सबके लिए प्रेम रखो। किसी के लिए घृणा मत रखो।
यह केवल आध्यात्मिक वाक्य नहीं है। यह समाज के लिए एक व्यावहारिक नैतिक रास्ता है। ऐसा रास्ता जो धर्म, जाति और पहचान की सीमाओं से ऊपर उठता है।भारत की सभ्यता में भी इसी तरह की शिक्षाएं दिखाई देती हैं। सूफी संतों की परंपरा हो। भक्ति आंदोलन की धारा हो। गुरु नानक का संदेश हो। या महात्मा गांधी का अहिंसा का विचार। इन सबमें एक समान बात है। असली शक्ति करुणा और नैतिक साहस में है।
आज की दुनिया पहले से ज्यादा जुड़ी हुई है। एक जगह का युद्ध दूसरे देशों को भी प्रभावित करता है। उसके असर केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहते। समाज और अर्थव्यवस्था पर भी गहरे घाव छोड़ जाते हैं।सूफी दृष्टि से धर्म का उद्देश्य लोगों को बांटना नहीं है। उसका उद्देश्य इंसान के दिल को जागृत करना है।
कभी कभी न्याय की रक्षा के लिए युद्ध की स्थिति पैदा हो सकती है। लेकिन उसे महिमा मंडित नहीं किया जाना चाहिए। उसे सामान्य नहीं बनाया जाना चाहिए।मानवता की असली जीत युद्ध में नहीं है। असली जीत संघर्ष को रोकने में है। संवाद और न्याय के रास्ते खोजने में है।
जलालुद्दीन रूमी का एक और सुंदर संदेश है। अपनी आवाज ऊंची मत करो। अपने शब्दों को बेहतर बनाओ। बारिश फूल उगाती है। गरज नहीं।आज की दुनिया को इसी तरह की बुद्धिमत्ता की जरूरत है। हथियारों की आवाज से ज्यादा जरूरी है इंसानियत की आवाज।
सूफी समझ के अनुसार युद्ध शक्ति का उत्सव नहीं है। यह इंसानी असफलता का संकेत है। इसलिए उसकी नैतिक सीमाएं तय की गई हैं। ताकि निर्दोष लोगों की रक्षा हो सके। ताकि अत्याचार को रोका जा सके।लेकिन आध्यात्मिक लक्ष्य इससे भी बड़ा है। इंसान को करुणा, न्याय और एकता की ओर जगाना।
अंत में सबसे बड़ी जीत यही है कि इंसान अपने दिल के अंधेरे को हरा दे। यही असली विजय है। यही वह रास्ता है जो इंसानियत को शांति की ओर ले जा सकता है।
(हाजी सैयद सलमान चिश्ती,गद्दी नशीन, दरगाह अजमेर शरीफ | चेयरमैन, चिश्ती फाउंडेशन)