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डॉ. प्रीतम भी. गेडाम
हमारे आसपास का वातावरण ही कुछ ऐसा बन गया है कि, पिछले कुछ सालों में जानलेवा बीमारियों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। कैंसर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक तो अब रोजमर्रा की बातों में सुनने मिलता है, जैसे यह कोई आम बीमारी बन गई है। आधुनिक जीवनशैली और बढ़ता मानसिक तनाव बीमारियों को बूस्टर डोज दे रहा है, जिसके कारण निरोगी और कम उम्र का व्यक्ति भी असमय घातक बीमारियों का शिकार होकर जान गवा रहा हैं। प्रदूषण, मिलावटखोरी, अशुद्धता, मौसम का बिगड़ता चक्र और जहरीले रसायनों का प्रयोग वैसे ही हमें मौत के मुहाने पर पहुंचा रहा है, ऊपर से आधुनिक जीवनशैली और मानसिक तनाव हमें शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बना रहा हैं।
शरीर और मन को खुश और निरोगी रखे ऐसा वातावरण, चीजें या लोगों का व्यवहार कम हो रहा हैं। अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में व्यस्त मनुष्य अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करता हैं।नशाखोरी, भोजन में पोषक तत्वों की कमी, पैक्ड फूड-ड्रिंक, तले मसालेदार, मीठे, नमकीन, मैदायुक्त, वसायुक्त खाद्यपदार्थ, देर रात तक जागना या अनिंद्रा, सोशल मीडिया की लत, यांत्रिक संसाधनों पर निर्भरता, निरंतर बैठक कार्य करना, व्यायाम की कमी, पर्याप्त मात्रा में शुद्ध ऑक्सीज़न, स्वच्छ जल और पोषक आहार न मिलना, बुरी संगत या बुरी आदतें, दुर्व्यवहार सहना, मन में डर बैठना या हिम्मत की कमी, बुरे विचार आना, ऐसी सभी आदतें मनुष्य के सेहत पर बुरा आघात करती है और फिर धीरे-धीरे जानलेवा बीमारियों की ओर धकेलती हैं।
धूम्रपान, मधुमेह, मोटापा, उच्च रक्तचाप, खराब कोलेस्ट्रॉल स्ट्रोक के जोखिम को बढ़ाते हैं। कोई भी घातक बीमारी हमें एक दिन में नहीं होती, बीमारियां धीमे गति से बढ़ने लगती है, लेकिन हम ध्यान देना उचित नहीं समझतें। हमारी जीवनशैली और कार्यशैली में बदलाव आवश्यक है और साथ ही प्रकृति पर होनेवाला हर प्रहार हमारी सेहत पर हो रहा है, यह जागरूकता बेहद जरुरी हैं।
हर साल 29 अक्टूबर को विश्व स्ट्रोक दिवस पूरी दुनिया में जनजागृति के लिए मनाया जाता हैं। मस्तिष्क संबंधी घातक बीमारी स्ट्रोक तेजी से बढ़ रही है, जब मस्तिष्क में रक्त का प्रवाह रुक जाता है तब स्ट्रोक होता हैं। मस्तिष्क में रक्त वाहिका के अवरुद्ध होने के कारण या फिर मस्तिष्क के अंदर रक्तस्राव के कारण यह स्थिति उत्पन्न होती हैं।
पहले यह केवल बुजुर्गों के हिस्से की बीमारी मानी जाती थी, परंतु अब युवाओं में भी यह बीमारी तेजी से बढ़ी है, नेशनल स्ट्रोक रजिस्ट्री प्रोग्राम दर्शाता है कि, स्ट्रोक के हर 7 में से 1 मरीज युवा अवस्था में कामकाजी वर्ग का है, अर्थात भारत में 14 प्रतिशत मरीज 45 साल से कम उम्र के होते हैं। स्लीप मेडिसिन रिव्यूज 2023 में बताया गया था कि, कामकाजी उम्र के 104 मिलियन भारतीय ऑब्स्ट्रक्टिव स्लीप एप्निया से पीड़ित है, जो स्ट्रोक का जोखिम कारक हैं।
अमेरिकन स्ट्रोक असोसिएशन अनुसार, स्ट्रोक किसी को भी और किसी भी उम्र में हो सकता हैं। दुनिया भर में, 25 साल से ज़्यादा उम्र के हर चार वयस्कों में से एक को अपने जीवनकाल में कभी न कभी स्ट्रोक हो सकता हैं।
साल 2020-2022 दौरान एक रिसर्च किया गया, जिसमे देश के 30 अस्पतालों के 34792 स्ट्रोक मरीजों के अध्ययन से पता कि, कुल मरीजों में 64 प्रतिशत पुरुष और 36.6 प्रतिशत महिलाएं थीं, 70 प्रतिशत से अधिक लोग ग्रामीण क्षेत्रों सेथे। 74.5 प्रतिशत में उच्च रक्तचाप, 28.5 प्रतिशत में तंबाकू का सेवन और 27.3 प्रतिशत में मधुमेह सबसे आम जोखिम कारक था।
37.8 प्रतिशत मरीज 24 घंटे बाद अस्पताल पहुंचे, केवल 20.1 प्रतिशत मरीज लक्षण शुरू होने के 4.5 घंटे के भीतर अस्पताल पहुंचे थे। स्ट्रोक आने के तीन महीने बाद, 27.8 प्रतिशत मरीजों की मृत्यु हो चुकी थी, लगभग 30 प्रतिशत मरीज गंभीर विकलांगता का शिकार हो गए थे एवं 1.1 प्रतिशत मरीजों को दोबारा स्ट्रोक आया।
स्ट्रोक होने पर संतुलन खोना, आँखों में बदलाव, चेहरे का एक तरफ झुकना, हाथ में कमजोरी, बोलने में कठिनाई जैसी समस्या हो सकती है, इसलिए हर मिनट कीमती मानकर तुरंत मरीज को अस्पताल पहुंचाए।विश्व स्वास्थ्य संगठन अनुसार, 2021 में, स्ट्रोक दुनिया भर में मौत और विकलांगता का तीसरा प्रमुख कारण था, जिसके अनुमानित 93.8 मिलियन मामले सामने आए।
2021 में, स्ट्रोक के 11.9 मिलियन नए मामले दर्ज किए गए। पिछले 20 वर्षों में जीवन भर स्ट्रोक होने का जोखिम 50 फीसदी तक बढ़ गया है, 'डिसएबिलिटी एडजस्टेड लाइफ इयर्स' के रूप में मापा जाने वाला स्ट्रोक का वैश्विक बोझ, वर्ष 2000 के 137 मिलियन से बढ़कर 2021 में 160 मिलियन हो गया है।
स्ट्रोक के बोझ का अधिकांश हिस्सा 10 ऐसे जोखिम कारकों से जुड़ा है जिन्हें बदला या नियंत्रित किया जा सकता है। इनमें शामिल हैं: हाई ब्लड प्रेशर, वायु प्रदूषण, धूम्रपान, हाई कोलेस्ट्रॉल, सोडियम की अधिक मात्रा वाला आहार, हाई फास्टिंग ब्लड ग्लूकोज, किडनी की खराबी, शरीर का अधिक वजन, शारीरिक रूप से निष्क्रिय रहना और शराब का हानिकारक सेवन यह हैं।
#WATCH | Gurugram, Haryana | Dr Naresh Trehan, CMD, Medanta Hospital, says, "People who are at risk or are known to have heart disease can carry Aspirin. It can be taken in case of chest pain. You can also take half a tablet of Sorbitrate, sit down or lie down and put it under your tongue. The third thing is to take 20 milligrams of Atorvastatin or an equivalent. These are for people with heart disease..."
— ANI (@ANI) September 28, 2026
हम किसी को गलत करने से तो नहीं रोक सकते, लेकिन हम खुद की जान को जोखिम में डालने से रोक सकते है, क्योंकि हमारी जान की हमें परवाह है, जीवन अनमोल है, यह फिर नहीं मिलेगी, इसलिए जीवन को जीभर जियें। शारीरिक और मानसिक तौर पर शरीर एकदम स्वस्थ बनाये रखें।
आधुनिक जीवनशैली को त्यागें, आधुनिकता विचारों में होनी चाहिए, स्वास्थ्य खराब करने में नहीं। पोषक आहार, पर्याप्त नींद, रोजाना व्यायाम, धूम्रपान-शराब इत्यादि नशे से दुरी, तला मीठा नमकीन वसायुक्त खाने से दुरी, शारीरिक गतिविधियां करें, प्रकृति ही जीवन का आधार है, क्योंकि प्राणवायु, जल, आहार उसी की देन है, इसलिए उसकी रक्षा करें।
बुरी आदत और बुरे विचारो वाले लोगों से दूर रहें, प्रसन्न रहें, अच्छे लोगों की संगत करें। गुस्सा, द्वेष, ईर्ष्या और झूठा दिखावा मनुष्य को मानसिक रूप से कमजोर बनाता है, इसे नियंत्रण में रखें। भावनाओं में बहना बंद करें, मन और मस्तिष्क हमेशा मजबूत बनाये रखें। कोलेस्ट्रॉल, रक्तचाप, मधुमेह नियंत्रित और सामान्य बनाए रखें। ऐसी जीवनशैली हमें बहुत-सी बीमारियों से बचाती हैं। स्वास्थ्यवर्धक खानपान, अच्छे संस्कार, संतोषी मन और मानसिक सुकून सुखी जीवन की कुंजी हैं।
स्ट्रोक आने पर मरीज के शारीरिक लक्षणों पर गौर करें। चिकित्सकीय मदद के लिए तुरंत आपातकालीन नंबर पर कॉल करें। तंग कपड़े ढीले करें, ताकि सांस लेने में आसानी हों। मरीज को खाने-पीने के लिए कुछ न दें, संभव हो तो एम्बुलेंस से ही अस्पताल ले जाएं। सांस और पल्स की जाँच करें, यदि मरीज की सांस रुकती है या वे बेहोश हो जाएं और सीपीआर देना आता है, तो तुरंत सीपीआर देना शुरू करें।
कोई भी बीमारी हो, उससे बेहतर है कि हम पहले ही उसके रोकथाम करके बचें। फिर भी अगर बीमारी होती है तो, तुरंत अस्पताल में जाएं और उचित चिकित्सा करायें। किसी भी हालत में घबराएं नहीं, मनोबल बनाए रखें और मरीज को भी दिलासा दें।
( लेखक महाराष्ट्र सरकार द्वारा सम्मानित )