आठ साल का बच्चा इतना हिंसक कैसे हुआ ?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 08-11-2026
How did an eight-year-old child become so violent?
How did an eight-year-old child become so violent?

 

अब्दुल्लाह मंसूर

28अक्टूबर को पंचकूला के एक सरकारी स्कूल में जो हुआ, उसे सिर्फ़ "बच्चों की लड़ाई" कहना सच्चाई को छोटा करना होगा। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक तीसरी क्लास के आठ साल के एक लड़के ने केजी की छह साल की बच्ची को यह कहकर बहलाया कि उसके पिता इंतज़ार कर रहे हैं, और उसे खाली क्लास में ले गया। वहाँ बच्ची को लात-घूँसे मारे गए, घसीटा गया और उसका सिर डेस्क और बेंच से टकराया गया। वह बेहोश हो गई, फिर भी हमला नहीं रुका। हमले में ईंट, पत्थर या गमले के इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग रिपोर्टें आई हैं। बच्ची खास ज़रूरतों वाली बताई गई है, यानी अपना बचाव करना उसके लिए और भी मुश्किल था।

बच्ची को पहले पंचकूला के सिविल अस्पताल और फिर गंभीर हालत में पीजीआई चंडीगढ़ ले जाया गया। 4नवंबर को उसे अस्पताल से छुट्टी मिल गई। लेकिन जिस्म की चोट से उबरना एक बात है और सदमे से निकलना दूसरी। पीजीआई के पूर्व प्रोफ़ेसर और क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट डॉ. आदर्श कोहली के मुताबिक उसे लंबे वक़्त तक ट्रॉमा काउंसलिंग की ज़रूरत होगी।

6नवंबर की मीडिया रिपोर्टों के अनुसार बच्ची अब भी सदमे में है और दोबारा स्कूल जाने से मना कर रही है। परिवार दूसरे स्कूल की तलाश में है।  यह घटना हर माँ-बाप को बेचैन करती है, क्योंकि जिस जगह को बच्चों के लिए सबसे महफ़ूज़ माना जाता है, वहीं यह सब हुआ।

कार्रवाई शुरू हो चुकी है। प्रिंसिपल, क्लास इंचार्ज और सिक्योरिटी गार्ड के खिलाफ़ एफ़आईआर दर्ज हुई है, और प्रिंसिपल समेत दो जेबीटी शिक्षक सस्पेंड किए गए हैं। किशोर न्याय बोर्ड ने आठ साल के बच्चे को ज़मानत दी और उसके इलाज व काउंसलिंग का इंतज़ाम करने को कहा। बोर्ड ने हमले का वीडियो सोशल मीडिया से हटाने का आदेश भी दिया, ताकि दोनों बच्चों की पहचान और मानसिक सेहत महफ़ूज़ रहे।

कानून को समझना भी ज़रूरी है। "डोली इन्कैपैक्स" लैटिन उसूल है, जिसका मतलब है कि छोटे बच्चे से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपने काम की प्रकृति और नतीजे पूरी तरह समझता हो। भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), 2023की धारा 20 के अनुसार सात साल से कम उम्र के बच्चे का काम अपराध नहीं माना जाता।

धारा 21के तहत सात से बारह साल के बच्चे को भी तब तक छूट मिलती है, जब तक यह साबित न हो कि वह अपने काम का नतीजा समझने लायक था। पहले यही नियम भारतीय दंड संहिता की धारा 82और 83में थे। यानी आठ साल के बच्चे के मामले में सिर्फ़ उम्र काफ़ी नहीं है। उसकी समझ का आकलन भी होगा। इसीलिए ज़िम्मेदारी तय करने के साथ सुधार और पुनर्वास पर भी ध्यान देना होगा।

आठ साल का बच्चा और हिंसा का सवाल

सबसे बेचैन करने वाला सवाल यह है कि इतना छोटा बच्चा ऐसी हिंसा क्यों कर बैठा। द ट्रिब्यून की 5नवंबर की रिपोर्ट के मुताबिक एक सरकारी अफ़सर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बच्चे ने काउंसलरों से कहा कि उसे लगा बच्ची को मारने से गेम में पॉइंट मिलेंगे। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि वह "फ्री फ़ायर" गेम बहुत खेलता था। पुलिस ने भी अब तक कोई वजह तय नहीं की है। इन्हें जाँच के इशारे की तरह ही देखना चाहिए।

हिंसक गेम और बच्चों की आक्रामकता के रिश्ते पर शोध एकमत नहीं है, पर इसे "कोई रिश्ता नहीं" कहना भी गलत होगा। 2021में Cyberpsychology, Behavior, and Social Networking  में छपे एक प्रयोग में छह साल के जिन बच्चों ने बीस मिनट हिंसक गेम खेला, उनमें गुस्सा उन बच्चों से ज़्यादा था जिन्होंने शांत गेम खेला।

पर ऐसा असर कुछ ही मिनटों में उतर जाता है, और लंबे वक़्त के असर पर बहस है। मनोवैज्ञानिक क्रिस्टोफ़र फ़र्ग्यूसन के मेटा-विश्लेषण में असर बहुत छोटा मिला, जबकि कुछ दूसरे अध्ययन ज़्यादा रिश्ता दिखाते हैं। एक वजह यह भी है कि पहले से आक्रामक बच्चे खुद हिंसक गेम की तरफ़ ज़्यादा खिंचते हैं, यानी रिश्ता दोनों तरफ़ चल सकता है।

इसलिए असली सवाल यह नहीं कि गेम हर बच्चे को हिंसक बनाता है या नहीं, बल्कि यह है कि किन बच्चों के लिए ख़तरा ज़्यादा है। Journal of Youth and Adolescence (2023) में छपे सारा कोयन और साथियों के अध्ययन में करीब 500अमेरिकी किशोरों को आठ साल तक देखा गया।

असर उन्हीं में दिखा जो शुरू से ज़्यादा आक्रामक थे, या जिनमें मध्यम आक्रामकता के साथ खुद पर काबू कम था। यानी गेम अकेला कारण नहीं, पर कमज़ोर ज़मीन पर चिंगारी का काम कर सकता है। ऐसे में उम्र से ऊपर की रेटिंग वाला गेम बच्चे के हाथ में पहुँचना माँ-बाप और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म, दोनों की निगरानी पर सवाल है।

मनोवैज्ञानिक आक्रामकता को मोटे तौर पर दो तरह की मानते हैं। एक, जो गुस्से में अचानक फूटती है, और दूसरी, जो किसी मक़सद से सोच-समझकर की जाती है। बच्ची को बहाने से अकेले कमरे में ले जाना योजना की ओर इशारा करता है, पर सिर्फ़ सीसीटीवी देखकर बच्चे के मन का फ़ैसला नहीं हो सकता।

यह भी जानना होगा कि उसने घर या आसपास हिंसा देखी या झेली या नहीं, उसे सख़्त सज़ा मिलती थी या वह भावनात्मक अनदेखी का शिकार रहा। पीजीआई की डॉ. भवनीत भारती के मुताबिक इस उम्र में बच्चों की अपनी भावनाओं और आवेग पर पकड़ पूरी तरह बनी नहीं होती।

फिर भी इतनी गंभीर हिंसा को आम बचपन की शरारत कहकर टाला नहीं जा सकता। बच्चे को काउंसलिंग और इलाज चाहिए, पर उस पर हमेशा के लिए "अपराधी" या "ख़तरनाक" का लेबल लगाना भी ठीक नहीं। उसके काम की गंभीरता और उसके सुधरने की गुंजाइश, दोनों को साथ रखकर देखना होगा।

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शिक्षक: बोझ भी, ज़िम्मेदारी भी

विभागीय जाँच में स्कूल की निगरानी पर सवाल उठे हैं। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार शिक्षकों की कमी की वजह से करीब 80बच्चे एक शिक्षिका के हवाले थे। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक शिक्षिका ने बताया कि छुट्टी के वक़्त वह बच्चों को उनके माँ-बाप तक पहुँचाने में लगी थीं।

बच्ची के पिकअप पॉइंट पर न होने की ख़बर मिलने के बाद परिवार ने उसे ढूँढना शुरू किया। एक रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रिंसिपल के कमरे में सीसीटीवी मॉनिटर लगा था और वह तीन बजे तक स्कूल से निकल चुकी थीं। इसकी सरकारी पुष्टि अभी बाकी है।

शिक्षा का अधिकार कानून प्राथमिक स्तर पर 30बच्चों पर एक शिक्षक का अनुपात तय करता है। यह पूरे स्कूल का पैमाना है, हर क्लास की अलग हद नहीं। फिर भी करीब 80बच्चों का एक शिक्षिका के ज़िम्मे होना बताता है कि निगरानी कितनी मुश्किल रही होगी। सरकारी शिक्षकों से पढ़ाई के अलावा सर्वे, चुनाव का काम, वोटर लिस्ट और अनगिनत रिपोर्टें भरवाई जाती हैं। कम स्टाफ और ऊपर से इतना काम, उनकी ज़िम्मेदारी और भारी बना देता है।

लेकिन सिस्टम की कमियों के साथ शिक्षकों की जवाबदेही की बात भी उतनी ही ज़रूरी है। छुट्टी के वक़्त बच्चों की गिनती करना, उन्हें सही हाथों में सौंपना, खाली क्लासों पर नज़र रखना और छोटे बच्चों को अकेले न घूमने देना स्कूल की बुनियादी ज़िम्मेदारी है।

बच्चों को यह सिखाना भी ज़रूरी है कि कोई जान-पहचान वाला या उनके पिता का नाम लेकर बुलाए, तब भी वे टीचर को बताए बिना अकेले कहीं न जाएँ। शिक्षक बच्चे के बदलते बर्ताव को सबसे पहले देखने वाले बड़े होते हैं: बार-बार मारपीट, दूसरों को डराना, अचानक चुप हो जाना या बात-बात पर भड़कना।

ऐसे इशारे दिखें तो उन्हें घरवालों और स्कूल तक पहुँचाना चाहिए। इसके लिए शिक्षकों को वक़्त, बाल मनोविज्ञान की बुनियादी जानकारी और स्कूल में काउंसलर का साथ मिलना चाहिए। ऐसे हादसे के बाद खुद शिक्षकों पर जो दबाव आता है, उसे भी भुलाया नहीं जाना चाहिए।

डीसीपी आदित्य सिंह ने स्कूलों के लिए तय सुरक्षा नियम और जागरूकता मुहिम की बात कही है। पर नियम तभी काम करेंगे जब स्कूल के पास उन्हें निभाने के लिए लोग और वक़्त हो। सरकार को शिक्षकों के ख़ाली पद भरने होंगे और सर्वे, वोटर लिस्ट व रिपोर्टों जैसे गैर-शैक्षणिक कामों के लिए अलग इंतज़ाम करना होगा, ताकि शिक्षक पढ़ाने और बच्चों की देखभाल पर ध्यान दे सकें।

कैमरे लगा देना भी अपने आप में हल नहीं है। प्रिंसिपल के पास दस्तावेज़ों की जाँच, माँ-बाप से मुलाक़ात, शिक्षकों की निगरानी और दर्जनों दूसरे काम होते हैं, वह दिन भर स्क्रीन के सामने नहीं बैठ सकते। अगर स्क्रीन देखना सचमुच ज़रूरी है, तो इसके लिए अलग कर्मचारी चाहिए, वरना कैमरे बस रिकॉर्डिंग के काम आएँगे, रोकथाम के नहीं। उससे ज़्यादा असरदार सीधे-सादे इंतज़ाम हैं: ख़ाली क्लासों पर ताला, छुट्टी के वक़्त बच्चों की गिनती और माँ-बाप के हवाले करने का साफ़ तरीका, और छोटे बच्चों को अकेले कहीं न जाने देना। माँ-बाप भी बच्चों के गेम, स्क्रीन टाइम और बर्ताव पर नज़र रखें और उन्हें गुस्सा हाथ से नहीं, लफ़्ज़ों में जताना सिखाएँ।

पंचकूला की घटना ने हमें झकझोरा है, पर इसमें उम्मीद की एक किरण भी है। जिस बच्ची की जान पर बन आई थी, वह इलाज के बाद मुस्कुराती हुई घर लौटी है। अब उसे सुरक्षित माहौल, धीरज और भरोसे की ज़रूरत है। वही चीज़ें उस बच्चे को भी चाहिए, जो अपने गुस्से को संभालना नहीं सीख पाया।

स्कूल को हर बच्चे तक सुरक्षित पहुँचने का इंतज़ाम करना होगा, शिक्षक को बच्चों के बदलते बर्ताव को देखने का वक़्त मिलना चाहिए, सरकार को स्कूलों में लोग और साधन देने होंगे, और माँ-बाप को बच्चे के गुस्से, गेम और संगत पर नज़र रखनी होगी। अगर हर पक्ष अपना हिस्सा निभाए, तो यही घटना स्कूलों को ज़्यादा सुरक्षित और बच्चों को ज़्यादा समझने वाली जगह बनाने की शुरुआत बन सकती है।

अब्दुल्लाह मंसूर पसमांदा दृष्टिकोण पर लिखते-बोलते हैं।