वेल्लोर विद्रोह में टीपू सुल्तान के बेटों की थी निर्णायक भूमिका

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 13-07-2026
Tipu Sultan's sons played a decisive role in the Vellore Mutiny.
Tipu Sultan's sons played a decisive role in the Vellore Mutiny.

 

fसाकिब सलीम

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास जब भी लिखा जाता है, तब 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम को अंग्रेजी शासन के खिलाफ पहला बड़ा संगठित विद्रोह माना जाता है। लेकिन इतिहास के कई शोध बताते हैं कि इसकी नींव लगभग आधी सदी पहले दक्षिण भारत के वेल्लोर में रखी जा चुकी थी। 10 जुलाई 1806 को अंग्रेजी ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना के भारतीय सिपाहियों ने जो विद्रोह किया, उसे 1857 की क्रांति का प्रारंभिक स्वरूप या अभ्यास कहा जा सकता है।

लंबे समय तक औपनिवेशिक इतिहासकारों ने वेल्लोर विद्रोह को केवल सैनिकों की नई वर्दी के खिलाफ अचानक हुई बगावत बताया। लेकिन उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेज इस धारणा से अलग तस्वीर पेश करते हैं।

इन स्रोतों के अनुसार यह विद्रोह पहले से तैयार की गई राजनीतिक योजना का हिस्सा था। इसमें टीपू सुल्तान के कैद किए गए बेटों ने नेतृत्व किया, जबकि फकीरों के एक व्यापक गुप्त नेटवर्क ने इसकी योजना को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

टीपू सुल्तान की शहादत के बाद भी खत्म नहीं हुआ संघर्ष

1799 में श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई में टीपू सुल्तान की मृत्यु के बाद अंग्रेजों ने उनके बेटों और परिवार के अन्य सदस्यों को वेल्लोर किले में कड़ी निगरानी में कैद कर दिया। अंग्रेजों को लगा कि टीपू के साथ मैसूर का प्रतिरोध भी समाप्त हो गया है। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उनके परिवार के सदस्य लगातार अंग्रेजी शासन के खिलाफ अवसर की तलाश में रहे।

1806 की शुरुआत में अंग्रेज सेना के कमांडर इन चीफ ने सैनिकों के पहनावे में कई बदलाव लागू किए। सिपाहियों को दाढ़ी रखने, तिलक लगाने और कानों में बालियां पहनने से रोका गया। साथ ही नई तरह की टोपी पहनना अनिवार्य कर दिया गया। इन आदेशों से हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के सैनिकों में असंतोष फैल गया। इसी असंतोष को टीपू सुल्तान के बेटों ने अंग्रेजों के खिलाफ संगठित विद्रोह में बदलने का प्रयास किया।

अंग्रेज अधिकारी की पत्नी ने भी स्वीकार की साजिश

वेल्लोर में तैनात एक अंग्रेज अधिकारी की पत्नी एफ डब्ल्यू ब्लंट ने अपनी पुस्तक में लिखा कि नौ भारतीय सैनिकों को विद्रोह का आरोपी बताकर जंजीरों में बांधकर मद्रास भेजा गया। उन्हें सार्वजनिक रूप से कठोर सैन्य दंड देने की तैयारी थी।

इसी घटना का इस्तेमाल टीपू सुल्तान के बेटों ने लंबे समय से बनाई जा रही योजना को अंतिम रूप देने के लिए किया। उनके अनुसार सिपाहियों ने यूरोपीय सैनिकों की हत्या कर किले पर कब्जा करने की योजना बनाई थी।

विद्रोह की रात टीपू के बेटों ने संभाली कमान

10 जुलाई 1806 की रात भारतीय सिपाहियों ने अंग्रेज सैनिकों पर हमला कर दिया। इतिहासकार कर्नल अल्फ्रेड कीन के अनुसार विद्रोह शुरू होते ही टीपू सुल्तान के बेटों ने नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया। ईसाई ड्रम बजाने वालों को पकड़कर महल ले जाया गया और विद्रोह का संकेत देने के लिए ड्रम बजवाए गए। महल में रोशनी की गई। सिपाहियों ने राजकुमारों से नेतृत्व संभालने की अपील की।

इसके बाद टीपू सुल्तान का लाल और हरे रंग वाला ध्वज किले पर फहरा दिया गया। टीपू के पुत्र मुइजुद्दीन ने अपना घोड़ा तैयार करने का आदेश दिया और सैनिकों को आसपास के किलों पर कब्जा करने के निर्देश दिए। उन्होंने कहा कि अंग्रेज अधिकारियों को पराजित करने के बाद वे स्वयं नगर में जाकर पुराने शासन की बहाली की घोषणा करेंगे।

1857 की क्रांति से मिलती है समानता

कर्नल अल्फ्रेड कीन ने लिखा कि 1806 और 1857 दोनों विद्रोहों में कई समानताएं थीं। दोनों में सैनिकों के धार्मिक विश्वासों को लेकर भय पैदा हुआ। 1806 में नई टोपी विवाद का कारण बनी, जबकि 1857 में कारतूसों पर लगी चर्बी ने विद्रोह को जन्म दिया। जिस तरह 1857 में दिल्ली में मुगल शाही परिवार विद्रोह का प्रतीक बना, उसी तरह 1806 में वेल्लोर में टीपू सुल्तान का परिवार आंदोलन का केंद्र था।

लेफ्टिनेंट कर्नल डब्ल्यू जे विल्सन ने भी लिखा कि विद्रोह के दौरान सैनिक लगातार आवाज लगा रहे थे कि नवाब बाहर आइए, अब डरने की कोई बात नहीं। माना जाता है कि यह पुकार टीपू सुल्तान के बड़े बेटे फतेह हैदर के लिए थी।

फकीरों ने बनाया क्रांति का गुप्त नेटवर्क

यदि टीपू सुल्तान के बेटों ने राजनीतिक नेतृत्व दिया, तो फकीरों ने इस विद्रोह की संगठनात्मक जिम्मेदारी निभाई। वे दक्षिण भारत के विभिन्न सैन्य ठिकानों तक संदेश पहुंचाते थे और अंग्रेजों के खिलाफ जनमत तैयार करते थे।

बेंगलुरु, वेल्लोर, बेल्लारी, नंदी हिल्स और चेन्नई जैसे सैन्य केंद्रों में बड़ी संख्या में फकीर सक्रिय थे। वे सैनिक छावनियों के आसपास कठपुतली के खेल दिखाते थे। इनमें अंग्रेजों की हार और फ्रांसीसियों की जीत को दर्शाया जाता था। वे टीपू सुल्तान की वीरता के गीत गाते थे और लोगों को बताते थे कि अंग्रेज हिंदुओं और मुसलमानों का जबरन धर्म परिवर्तन कराना चाहते हैं।

अब्दुल्ला खान और पीरजादा ने बेंगलुरु और वेल्लोर में संगठन संभाला। रुस्तम अली ने स्थानीय सैनिकों को विद्रोह के लिए प्रेरित किया। टीपू सुल्तान के आध्यात्मिक मार्गदर्शक नबी शाह ने मुहर्रम की सभाओं में टीपू की प्रशंसा की और अंग्रेजों का साथ देने वालों की आलोचना की।

शेख आदम बने विद्रोह के प्रमुख नेता

विद्रोह के दौरान फकीर शेख आदम प्रमुख नेताओं में शामिल थे। वेल्लोर में विद्रोह दबाए जाने के बाद भी अलीम अली शाह और नूर खलील शाह जैसे फकीरों ने बेल्लारी, हैदराबाद और नंदी हिल्स में नए विद्रोह की योजना बनानी जारी रखी। वे लोगों से कहते थे कि टीपू सुल्तान के समर्थक, मराठा और पॉलिगर जल्द ही अंग्रेजों के खिलाफ उठ खड़े होंगे।

इतिहासकार पेरुमल चिन्नियन ने लिखा है कि दक्षिण भारत का यह षड्यंत्र मुख्य रूप से फकीरों और अन्य धार्मिक साधुओं के सहयोग से ही सेना की विभिन्न छावनियों तक पहुंचा।

मस्जिदों और मंदिरों तक पहुंचा विद्रोह का संदेश

इतिहासकार चार्ल्स मैकफार्लेन ने लिखा कि टीपू सुल्तान के बेटों के आसपास अंग्रेज विरोधी तत्व लगातार सक्रिय थे। कुछ फ्रांसीसी लोग फकीरों का वेश धारण कर गांव गांव घूमते थे और अंग्रेजों को अत्याचारी बताते थे। मस्जिदों और मंदिरों में ऐसे पर्चे लगाए जाते थे जहां यूरोपीय लोग प्रवेश नहीं करते थे। इनका उद्देश्य आम जनता में अंग्रेज विरोधी भावना को मजबूत करना था।

अंग्रेजी जांच ने भी मानी बड़ी साजिश

विद्रोह के बाद अंग्रेज सरकार ने जांच कराई। आधिकारिक जांच में नई वर्दी और टीपू सुल्तान के परिवार दोनों को कारण माना गया। लेकिन सेना के कमांडर सर जे एफ क्रैडॉक का कहना था कि टोपी का विवाद केवल बहाना था। असली उद्देश्य टीपू सुल्तान के शासन की पुनर्स्थापना था।

बाद में ईस्ट इंडिया कंपनी के कोर्ट ऑफ डायरेक्टर्स ने भी माना कि टीपू सुल्तान के बेटों और उनके समर्थकों ने सैनिकों की नाराजगी का फायदा उठाकर विद्रोह की योजना बनाई थी ताकि वे अपनी आजादी हासिल कर सकें और पुराना शासन फिर से स्थापित किया जा सके।

भारी कीमत चुकानी पड़ी

विद्रोह में 128 अंग्रेज सैनिक और 15 अधिकारी मारे गए। इनमें कर्नल फैनकोर्ट और लेफ्टिनेंट कर्नल मैकेरस भी शामिल थे।सुबह लगभग सात बजे अर्काट से कर्नल गिलिस्पी सेना लेकर पहुंचे और अंग्रेजों ने दोबारा किले पर कब्जा कर लिया। इसके बाद पांच सौ से अधिक भारतीयों की हत्या कर दी गई। छह लोगों को तोप से उड़ाया गया। पांच को गोली मार दी गई। आठ को फांसी दी गई। कई लोगों को आजीवन कारावास की सजा मिली।

इसके बाद टीपू सुल्तान के बेटों को कड़ी सुरक्षा के बीच कलकत्ता भेज दिया गया। उनके कई सहयोगियों को फांसी या जेल की सजा दी गई। इस घटना के बाद मद्रास के गवर्नर लॉर्ड विलियम बेंटिंक और सेना प्रमुख सर जे एफ क्रैडॉक को भी उनके पदों से हटा दिया गया।

वेल्लोर विद्रोह केवल नई टोपी या सैन्य वर्दी के विरोध का आंदोलन नहीं था। उपलब्ध ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि यह अंग्रेजी शासन के खिलाफ एक संगठित राजनीतिक और सैन्य चुनौती थी। टीपू सुल्तान के बेटों ने इसे नेतृत्व दिया और फकीरों के व्यापक नेटवर्क ने इसे संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कई इतिहासकारों का मानना है कि 1857 की क्रांति में दिखाई देने वाली अनेक रणनीतियों की शुरुआती झलक 1806 के वेल्लोर विद्रोह में पहले ही दिखाई दे चुकी थी। इसी कारण वेल्लोर का यह संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी घटना माना जाता है।