आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
वैज्ञानिकों ने यह पता लगाया है कि कोशिका विभाजन (सेल डिवीजन) के दौरान डीएनए दोगुना हो जाने के बाद भी कुछ कोशिकाएं जीवित क्यों रहती हैं, जबकि अन्य नष्ट हो जाती हैं। यह खोज उम्र बढ़ने, कैंसर और कई गंभीर बीमारियों को समझने में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।
मानव शरीर में हर सेकंड लाखों कोशिकाएं विभाजित होकर नई कोशिकाएं बनाती हैं। यह प्रक्रिया बेहद जटिल होती है और इसमें हजारों अणुओं का सटीक समन्वय आवश्यक होता है। लेकिन कभी-कभी यह प्रक्रिया गड़बड़ा जाती है। ऐसे मामलों में कोशिका अपना डीएनए तो पूरी तरह कॉपी कर लेती है, लेकिन दो अलग-अलग कोशिकाओं में विभाजित नहीं हो पाती। परिणामस्वरूप एक ही कोशिका में सामान्य से दोगुना आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) जमा हो जाता है। इस स्थिति को ‘होल जीनोम डुप्लीकेशन’ (WGD) कहा जाता है।
जापान के Hokkaido University के शोधकर्ताओं ने यह जानने का प्रयास किया कि कोशिका विभाजन की विफलता के अलग-अलग तरीकों का कोशिकाओं के भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।
शोध में दो प्रमुख कारणों पर ध्यान केंद्रित किया गया— साइटोकाइनेसिस फेल्योर और माइटोटिक स्लिपेज। साइटोकाइनेसिस फेल्योर में कोशिका विभाजन की लगभग पूरी प्रक्रिया पूरी हो जाती है, लेकिन अंतिम चरण में कोशिका दो भागों में अलग नहीं हो पाती। वहीं माइटोटिक स्लिपेज में कोशिका गुणसूत्रों के सही ढंग से अलग होने से पहले ही विभाजन प्रक्रिया से बाहर निकल जाती है।
अध्ययन के प्रमुख लेखक और एसोसिएट प्रोफेसर Ryota Uehara ने कहा कि अब तक यह स्पष्ट नहीं था कि विभाजन की विफलता का तरीका कोशिकाओं के व्यवहार को किस हद तक प्रभावित करता है।