आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
पृथ्वी पर इस समय भले ही काफी उथल-पुथल मची हो, लेकिन कम से कम हमारे आसपास का अंतरिक्ष शांत दिखाई देता है। मगर ब्रह्मांड के हर हिस्से में ऐसा नहीं है। कहीं विस्फोट हो रहे हैं, कहीं खगोलीय पिंड टकरा रहे हैं और कहीं दूसरे तरह के खतरे मंडरा रहे हैं
पत्रिका ‘मंथली नोटिसेज ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी’ में प्रकाशित नए शोध में हमने कृत्रिम रूप से तैयार किए गए ब्रह्मांडों की पड़ताल की, ताकि यह पता लगाया जा सके कि जीवन के लिए सबसे अनुकूल स्थान कौन-से हैं।
हमें एक राहत देने वाली बात पता चली कि आकाशगंगा के बाहरी हिस्से में स्थित हमारा सूर्य जीवन के लिए उपलब्ध सबसे अनुकूल जगहों में से एक है।
जीवन के लिए ब्रह्मांड में मौजूद अनुकूल क्षेत्र को ‘गोल्डीलॉक्स क्षेत्र’ कहा जाता है-यानी ऐसी जगहें जहां परिस्थितियां न बहुत गर्म होती हैं, न बहुत ठंडी, बल्कि बिल्कुल अनुकूल होती हैं।
हालांकि, वहां वास्तव में जीवन मौजूद है या नहीं, यह अलग सवाल है। खगोल विज्ञानी और जीवविज्ञानी यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि सौरमंडल के बाहर मौजूद ग्रहों पर जीवन कैसे विकसित हो सकता है। वहीं, खगोल भौतिक विज्ञानी ब्रह्मांड की संरचना और उसके विकास का अध्ययन कर यह पता लगा रहे हैं कि जीवन के लिए सबसे अनुकूल स्थान कौन-से हैं और वे कौन-सी जगहें हैं जहां जीवन पल भर में समाप्त हो सकता है।
मसलन, तारों के आसपास ही एक ‘गोल्डीलॉक्स क्षेत्र’ होता है। यह न तो तारे के इतना करीब होता है कि वहां अत्यधिक गर्मी हो, न ही इतना दूर कि पानी जम जाए। इस ‘तारे के चारों ओर रहने योग्य क्षेत्र’ में पानी भाप या बर्फ के बजाय तरल अवस्था में रह सकता है।
अब जरा दायरा और बड़ा कर जीवन के लिए सबसे अनुकूल स्थान और समय तलाशते हैं। कोई नया तारा अगर आकाशगंगा के केंद्र के बहुत करीब हो, तो उसे आसपास मौजूद तारों की भारी हलचल का सामना करना पड़ेगा। वहीं, जो तारे बहुत दूर स्थित हैं, वे ऐसे वातावरण में होंगे जहां जीवन के लिए जरूरी रासायनिक तत्वों का अभाव होगा।