असम उपचुनाव: मुस्लिम वोट बना बड़ा चुनावी रणक्षेत्र

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 06-10-2026
Assam By-elections: Muslim Vote Becomes a Major Electoral Battleground
Assam By-elections: Muslim Vote Becomes a Major Electoral Battleground

 

fदौलत रहमान

सत्तारूढ़ भाजपा के लिए मध्य असम की नगांव लोकसभा सीट का उपचुनाव इस बात की परीक्षा है कि क्या वह लंबे समय से कांग्रेस के गढ़ रहे इस क्षेत्र में आखिरकार सेंध लगा सकती है। कांग्रेस के लिए यह उस सीट पर अपना प्रभाव बनाए रखने की लड़ाई है, जहां मुस्लिम मतदाता लंबे समय से उसकी चुनावी ताकत का अहम आधार रहे हैं। वहीं देवबंद से शिक्षा प्राप्त इस्लामी विद्वान और ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी एआईयूडीएफ के प्रमुख मौलाना बदरुद्दीन अजमल के लिए यह अपनी पार्टी को फिर से मजबूत करने की कोशिश है।

कभी मजबूत राजनीतिक ताकत रही एआईयूडीएफ अब असम विधानसभा में केवल दो सीटों तक सिमट गई है।इन सभी राजनीतिक समीकरणों के केंद्र में असम का मुस्लिम वोट है। 6 अक्टूबर को होने वाला नगांव लोकसभा उपचुनाव संसद में सत्ता के संतुलन को भले ही नहीं बदलेगा, लेकिन इसका राजनीतिक महत्व एक सीट से कहीं ज्यादा है।

भाजपा के लिए जीत का मतलब उस लोकसभा क्षेत्र में प्रवेश करना होगा, जहां असम में अपना राजनीतिक आधार लगातार बढ़ाने के बावजूद पार्टी अब तक बड़ी सफलता हासिल नहीं कर सकी है। कांग्रेस के लिए यह परीक्षा होगी कि क्या वह अल्पसंख्यक समर्थन को अपने साथ बनाए रख सकती है, जो लंबे समय से उसके चुनावी आधार का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। वहीं बदरुद्दीन अजमल के लिए यह मुकाबला एआईयूडीएफ के खोए राजनीतिक प्रभाव को कुछ हद तक वापस हासिल करने की कोशिश है।

इसलिए इस उपचुनाव में तीनों प्रमुख राजनीतिक ताकतों के वोट प्रतिशत पर नजर रहेगी। साथ ही यह भी देखा जाएगा कि असम के मुस्लिम मतदाताओं के राजनीतिक रुझान में कितना बदलाव आया है।

परिसीमन के बाद बदल गया नगांव का चुनावी स्वरूप

नगांव लोकसभा क्षेत्र में कुल 19,05,519 मतदाता हैं। इनमें 9,62,023 पुरुष, 9,43,446 महिलाएं और तीसरे लिंग के 50 मतदाता शामिल हैं। 2023 में हुए परिसीमन के बाद इस लोकसभा क्षेत्र का चुनावी स्वरूप काफी बदल गया। अल्पसंख्यक बहुल विधानसभा क्षेत्र धींग, रूपोहिहाट और सामागुड़ी को तत्कालीन कलियाबोर लोकसभा क्षेत्र से हटाकर नगांव में शामिल किया गया। वहीं बरहामपुर, होजाई और लुमडिंग को नगांव से बाहर कर दिया गया।

इन बदलावों से नगांव लोकसभा क्षेत्र में अल्पसंख्यक मतदाताओं का प्रभाव काफी बढ़ गया। राजनीतिक विश्लेषकों का अनुमान है कि अब मुस्लिम मतदाता यहां के कुल मतदाताओं का 60 प्रतिशत से अधिक हैं।

यही वजह है कि उपचुनाव में मुस्लिम वोट सबसे महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दा बन गया है। साथ ही यह चुनाव भाजपा के लिए भी इस बात की परीक्षा है कि वह अपने पारंपरिक चुनावी आधार से आगे कितनी दूर तक विस्तार कर सकती है।

2024 के लोकसभा चुनाव में नगांव के अंतर्गत आने वाली आठ विधानसभा सीटों में से भाजपा ने पांच पर जीत हासिल की थी। इनमें जागीरोड, मोरीगांव, नगांव, बटद्रवा और राहा शामिल हैं। कांग्रेस ने लाहोरीघाट, रूपोहिहाट और सामागुड़ी में जीत दर्ज की थी, जबकि रायजोर दल ने धींग सीट जीती थी।

चुनावी नक्शा काफी स्पष्ट है। भाजपा ने मुख्य रूप से हिंदू बहुल विधानसभा क्षेत्रों में अपना दबदबा बनाए रखा है। वहीं कांग्रेस और रायजोर दल का प्रभाव अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों में अधिक रहा है।अब उपचुनाव यह तय करेगा कि यह राजनीतिक विभाजन पहले की तरह कायम रहता है या तीनों प्रमुख राजनीतिक दल एक-दूसरे के प्रभाव वाले क्षेत्रों में सेंध लगाने में कामयाब होते हैं।

कांग्रेस का गढ़ तोड़ने की भाजपा की बड़ी कोशिश

2019 के बाद से नगांव भाजपा की पहुंच से बाहर रहा है। हालांकि इस दौरान पार्टी ने असम के पड़ोसी क्षेत्रों में अपना संगठन और चुनावी प्रभाव लगातार मजबूत किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार प्रद्युत बोरदोलोई ने 7,88,850 वोट हासिल कर भाजपा के सुरेश बोरा को हराया था। बोरा को 5,76,619 वोट मिले थे। बोरदोलोई ने 2,12,231 वोटों के अंतर से जीत दर्ज की थी। एआईयूडीएफ उम्मीदवार अमीनुल इस्लाम 1,37,340 वोटों के साथ तीसरे स्थान पर रहे थे।

बाद में बोरदोलोई ने लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और भाजपा में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने असम विधानसभा चुनाव में दिसपुर से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। उनके इस्तीफे के कारण नगांव लोकसभा सीट पर उपचुनाव की स्थिति बनी।

भाजपा ने इस बार नगांव के पूर्व उपायुक्त देवाशीष शर्मा को उम्मीदवार बनाया है। पार्टी को उम्मीद है कि संगठन की ताकत के साथ नगांव और मोरीगांव में प्रशासनिक अधिकारी के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान बनी छवि भी उनके पक्ष में काम करेगी।

शर्मा ने 3 सितंबर को स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ली और पांच दिन बाद भाजपा में शामिल हो गए। हालांकि नौकरशाही से सीधे चुनावी राजनीति में उनके प्रवेश को लेकर विपक्ष के साथ-साथ समाज के कुछ वर्गों ने सवाल उठाए हैं।

नगांव के एक कॉलेज शिक्षक ने कहा, "नगांव में इस समय चुनावी लहर जैसी कोई स्थिति नजर नहीं आ रही है।" उन्होंने कहा, "देवाशीष शर्मा एक प्रशासक के रूप में लोकप्रिय थे। लेकिन वह लगभग आखिरी समय तक प्रशासन में रहे और कुछ ही दिनों बाद भाजपा में शामिल होकर चुनाव मैदान में उतर गए। कई जागरूक मतदाताओं को उनका यह फैसला पसंद नहीं आया।"

हालांकि भाजपा के पास इसके जवाब में एक दूसरा चुनावी तर्क भी है। वह सरकारी योजनाओं के लाभार्थियों और कल्याणकारी योजनाओं को अपने पक्ष में मजबूत आधार मान रही है। जिन मतदाताओं को आवास और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ मिला है, वे ऐसे उपचुनाव में अपना राजनीतिक विकल्प बदलने की जरूरत महसूस नहीं कर सकते, जिसका परिणाम न तो असम की सरकार बदलेगा और न ही केंद्र की सत्ता पर कोई असर पड़ेगा।भाजपा को उम्मीद है कि यह सोच उसके पक्ष में जा सकती है।

मुस्लिम वोट को लेकर भाजपा का नया दावा

नगांव उपचुनाव में भाजपा के प्रचार अभियान की सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही है कि पार्टी उस धारणा को चुनौती दे रही है जिसके मुताबिक यहां का मुस्लिम मतदाता स्वाभाविक रूप से कांग्रेस या एआईयूडीएफ के साथ ही जाता है।

भाजपा नेताओं का कहना है कि मुस्लिम मतदाता एकजुट होकर किसी एक पार्टी को वोट नहीं करते और मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्से पहले भी भाजपा का समर्थन कर चुके हैं।मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने चुनाव प्रचार के दौरान इस तर्क को खुलकर सामने रखा है। उन्होंने मुस्लिम बहुल विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को मिले वोटों का हवाला देते हुए कहा कि अल्पसंख्यक मतदाताओं के एक हिस्से ने पहले भी भाजपा का समर्थन किया है।

22 सितंबर को सरमा ने कहा था कि पिछले लोकसभा चुनाव में धींग, रूपोहिहाट, लाहोरीघाट और सामागुड़ी विधानसभा क्षेत्रों में भाजपा को 40 हजार से अधिक वोट मिले थे। उन्होंने दावा किया कि इस बार पार्टी अल्पसंख्यक समुदाय से अपना समर्थन और बढ़ा सकती है।

एक अन्य चुनावी कार्यक्रम में सरमा ने कहा कि "मियां" समुदाय के कुछ मतदाताओं ने पहले भाजपा का समर्थन किया था। उन्होंने दावा किया कि भाजपा धार्मिक आधार से ऊपर उठकर समर्थन मांग रही है।उन्होंने यह भी कहा कि 2026 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को अल्पसंख्यक समुदाय से अच्छा खासा समर्थन मिला था।

भाजपा की यह राजनीतिक रणनीति महत्वपूर्ण है। उसका सीधा संदेश यह है कि केवल नगांव में मुस्लिम आबादी अधिक होने के कारण कांग्रेस यह मानकर नहीं चल सकती कि मुस्लिम मतदाता हमेशा उसके साथ रहेंगे।

साथ ही भाजपा कांग्रेस पर मुस्लिम वोटों पर निर्भर रहने का आरोप लगा रही है। पार्टी कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच राजनीतिक समझ होने का भी आरोप लगा रही है। उसका कहना है कि दोनों दल अल्पसंख्यक वोटों के समीकरण को ध्यान में रखकर एक-दूसरे के साथ राजनीतिक तालमेल कर रहे हैं। कांग्रेस और एआईयूडीएफ ने इन आरोपों को खारिज किया है या इन पर तत्काल कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है।

इस तरह भाजपा के अभियान की दो समानांतर धाराएं हैं। एक तरफ वह कांग्रेस को मुस्लिम वोटों पर निर्भर पार्टी के रूप में पेश कर रही है। दूसरी तरफ मुस्लिम मतदाताओं से कह रही है कि उन्हें कांग्रेस के साथ ही जाने की कोई बाध्यता नहीं है।

मुस्लिम मतदाताओं से सरमा की सीधी अपील

हिमंत बिस्व सरमा ने चुनावी रैलियों में मुस्लिम मतदाताओं से सीधे भाजपा के पक्ष में मतदान करने की अपील भी की है।मुख्यमंत्री ने अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में भाजपा के प्रदर्शन का हवाला देकर कहा है कि मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से का भाजपा को वोट देना कोई नई बात नहीं है। उन्होंने यह भी कहा है कि नगांव उपचुनाव में भाजपा को अल्पसंख्यक समुदाय से मिलने वाले समर्थन में वृद्धि की उम्मीद है।

यह दावा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भाजपा ने 2024 के लोकसभा चुनाव और 2026 के विधानसभा चुनाव में असम से किसी मुस्लिम उम्मीदवार को अपना प्रत्याशी नहीं बनाया था। अब 6 अक्टूबर को यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरमा का यह दावा मुस्लिम मतदाताओं के बीच वास्तव में कितने बड़े चुनावी बदलाव में बदलता है।

कांग्रेस के सामने अल्पसंख्यक वोट बचाने की चुनौती

कांग्रेस के सामने भी चुनौती साफ है। 2019 से पार्टी नगांव में अपना प्रभाव बनाए हुए है और अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्रों से उसे पारंपरिक रूप से मजबूत समर्थन मिलता रहा है। लेकिन बदरुद्दीन अजमल की चुनावी मैदान में वापसी ने इस समीकरण को जटिल बना दिया है।

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भाजपा विपक्ष और अल्पसंख्यक वोटों के विभाजन का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। कई विपक्षी दलों ने कांग्रेस उम्मीदवार सिबामोनी बोरा को समर्थन देने की घोषणा भी की है।

कांग्रेस इसलिए दो मोर्चों पर चुनाव लड़ रही है। पहला, उसे अपना पारंपरिक समर्थन आधार बचाना है। दूसरा, उसे यह सुनिश्चित करना है कि एआईयूडीएफ मुस्लिम मतदाताओं के उस हिस्से को अपने साथ न ले जाए, जो अब तक कांग्रेस का समर्थन करता रहा है।

कांग्रेस नेता इस चुनाव को संविधान, विकास और समावेशी शासन जैसे व्यापक मुद्दों से भी जोड़ रहे हैं। असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई ने पार्टी के अभियान और उम्मीदवार की जीत को लेकर भरोसा जताया है।लेकिन अजमल की मौजूदगी कांग्रेस के लिए ऐसी चुनौती है जिसे वह नजरअंदाज नहीं कर सकती।

अजमल के सामने एआईयूडीएफ के अस्तित्व की लड़ाई

भाजपा और कांग्रेस जहां मुस्लिम वोट के भविष्य को लेकर आमने सामने हैं, वहीं बदरुद्दीन अजमल के लिए यह चुनाव उनकी पार्टी के राजनीतिक अस्तित्व से भी जुड़ा है।एआईयूडीएफ की विधानसभा में ताकत 16 सीटों से घटकर सिर्फ दो सीटों पर रह गई है। ऐसे में अजमल का नगांव उपचुनाव में उतरना केवल लोकसभा सीट जीतने की कोशिश नहीं है। यह उनकी पार्टी को फिर से राजनीतिक जमीन दिलाने की कोशिश भी है।

इत्र कारोबारी अजमल 2024 में अपनी पारंपरिक धुबरी लोकसभा सीट से 10 लाख से अधिक वोटों के अंतर से चुनाव हार गए थे। फिलहाल वह बिन्नाकांडी विधानसभा सीट से विधायक हैं।

अजमल खुद को भाजपा और कांग्रेस दोनों के विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस ने मुसलमानों के लिए पर्याप्त काम नहीं किया। उन्होंने यह भी दावा किया है कि उन्हें मुस्लिम और हिंदू दोनों समुदायों का समर्थन मिलेगा।उम्मीदवारी घोषित होने के बाद अजमल ने कहा था, "मुझे मुसलमानों और हिंदुओं दोनों के वोट मिलेंगे।"

उनका चुनाव प्रचार भावनात्मक और समुदाय केंद्रित भी रहा है। एक चुनावी बैठक में मतदाताओं से अपील करते हुए अजमल भावुक हो गए। उन्होंने लोगों से इस बार "वही गलती न दोहराने" की अपील की।

अल्पसंख्यक मतदाताओं, खासकर महिलाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "हम आपके मुस्लिम भाई हैं। इस बार हमें अपना वोट दें।"कांग्रेस के लिए अजमल की मौजूदगी बड़ी राजनीतिक चुनौती है। पार्टी के भीतर भी यह स्वीकार किया जा रहा है कि उनके मैदान में उतरने से मुकाबला काफी कठिन हो गया है।

एक मतदाता वर्ग पर तीन राजनीतिक दावे

नगांव का चुनाव प्रचार इस तरह एक ही मुस्लिम मतदाता वर्ग को लेकर तीन अलग-अलग राजनीतिक दावों में बदल गया है।भाजपा का कहना है कि मुस्लिम मतदाता हमेशा कांग्रेस या एआईयूडीएफ के साथ बंधे नहीं हैं। पार्टी का दावा है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ हिस्से पहले ही भाजपा का समर्थन करने लगे हैं।

कांग्रेस अल्पसंख्यक समर्थन को अपने साथ बनाए रखने की कोशिश कर रही है। यही समर्थन लंबे समय से नगांव में उसकी चुनावी जीत का आधार रहा है। कांग्रेस मतदाताओं को यह भी समझाने की कोशिश कर रही है कि उसके मुताबिक भाजपा और एआईयूडीएफ के बीच राजनीतिक तालमेल विपक्षी वोटों को बांटने की रणनीति का हिस्सा है।

दूसरी ओर अजमल उस मुस्लिम समर्थन को वापस हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, जो कभी एआईयूडीएफ की राजनीतिक ताकत की बुनियाद था। वह अपनी पार्टी को कांग्रेस और भाजपा से अलग एक स्वतंत्र राजनीतिक विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं।

इस चुनाव का परिणाम केवल मुस्लिम मतदाताओं की संख्या से तय नहीं होगा। असली सवाल यह होगा कि मुस्लिम वोट किस अनुपात में भाजपा, कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच बंटता है।

अल्पसंख्यक बहुल विधानसभा क्षेत्रों में मतदान के रुझान में मामूली बदलाव भी पूरे लोकसभा क्षेत्र के परिणाम को प्रभावित कर सकता है। इसी तरह कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच वोटों का बंटवारा भी निर्णायक साबित हो सकता है।

सिर्फ उपचुनाव नहीं है नगांव की लड़ाई

भाजपा के लिए नगांव उस राजनीतिक विस्तार को साबित करने का अवसर है, जिसकी कोशिश वह लंबे समय से कर रही है। पार्टी यह दिखाना चाहती है कि उसका चुनावी प्रभाव उन इलाकों तक भी पहुंच सकता है, जहां उसे ऐतिहासिक रूप से मुश्किलों का सामना करना पड़ा है।

कांग्रेस के लिए यह परीक्षा है कि असम की बदलती राजनीति के बीच उसका पारंपरिक अल्पसंख्यक वोट बैंक अब भी उसके साथ मजबूती से खड़ा है या नहीं।अजमल और एआईयूडीएफ के लिए यह साबित करने की कोशिश है कि विधानसभा में केवल दो सीटों तक सिमटने के बावजूद पार्टी के पास अभी भी एक मजबूत राजनीतिक आधार मौजूद है।

असम की व्यापक राजनीति के लिए नगांव उपचुनाव उस बड़े सवाल की परीक्षा भी है, जो राज्य की चुनावी राजनीति में लगातार महत्वपूर्ण होता जा रहा है।क्या असम का मुस्लिम वोट अब भी मुख्य रूप से कांग्रेस और अल्पसंख्यक केंद्रित राजनीतिक दलों के साथ है? या भाजपा इस मतदाता वर्ग के कुछ हिस्सों में अपनी जगह बनाने लगी है?

6 अक्टूबर को नगांव इस सवाल का अगला चुनावी जवाब देगा। हालांकि यह जवाब पूरे असम की राजनीति की तस्वीर नहीं बताएगा, लेकिन राज्य में तेजी से बदलते मुस्लिम राजनीतिक रुझान के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों में से एक जरूर सामने आएगा।

लेखक आवाज द वाॅयस असमिया के संपादक हैं