रूसी तेल के मामले में अमेरिकी टैरिफ का बोझ जनता पर नहीं : जमात-ए-इस्लामी हिंद

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 19-09-2026
The burden of US tariffs on Russian oil should not be passed on to the public: Jamaat-e-Islami Hind.
The burden of US tariffs on Russian oil should not be passed on to the public: Jamaat-e-Islami Hind.

 

नई दिल्ली।

जमात-ए-इस्लामी हिंद के नायब अमीर एस. अमीनुल हसन ने रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों, जिनमें भारत भी शामिल है, पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को देने संबंधी अमेरिकी कांग्रेस की पहल पर गहरी चिंता जताई है।

मीडिया को जारी बयान में एस. अमीनुल हसन ने कहा कि जमात-ए-इस्लामी हिंद ‘लिंडसी ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट 2026’ को लेकर चिंतित है। उनके अनुसार, यह कानून रूस-यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में अमेरिका की प्रतिक्रिया को कूटनीतिक उपायों से आगे बढ़ाकर कठोर आर्थिक प्रतिबंधों की दिशा में ले जाता है। उन्होंने इस रणनीति को नैतिक और आर्थिक, दोनों दृष्टियों से अनुचित बताया।

एस. अमीनुल हसन ने कहा कि टैरिफ भले ही आयातकों पर लगाया जाता है, लेकिन उसका आर्थिक बोझ अंततः उपभोक्ताओं, निर्यातकों, श्रमिकों और छोटे कारोबारियों तक पहुंच सकता है। उन्होंने कहा कि 2025 में अमेरिका को भारत का निर्यात करीब 104 अरब डॉलर रहा। ऐसे में सवाल उठता है कि ऐसे भू-राजनीतिक विवाद की कीमत भारतीय श्रमिकों और उनके परिवारों को क्यों चुकानी चाहिए, जिसमें उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं है।

उन्होंने कहा कि ऊर्जा आपूर्ति में अचानक आने वाला व्यवधान परिवहन, उद्योग, खाद्य पदार्थों की कीमतों और घरेलू बजट पर असर डाल सकता है। उनके मुताबिक, यदि अमेरिकी दबाव के कारण भारत रूस से कच्चे तेल की खरीद में उल्लेखनीय कमी करता है, तो उसे दूसरे स्रोतों से अधिक तेल खरीदना पड़ेगा। इससे मध्य पूर्व, अफ्रीका और अन्य तेल उत्पादक देशों से आपूर्ति हासिल करने के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।

उन्होंने यह भी कहा कि यदि वैश्विक तेल बाजार में आपूर्ति घटती है और कीमतों पर दबाव बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। इससे रूस के तेल राजस्व पर दबाव डालने के उद्देश्य का प्रभाव कुछ हद तक कम हो सकता है।

सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा जरूरी

एस. अमीनुल हसन ने कहा कि भारत की 1.4 अरब आबादी के लिए सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा सुनिश्चित करना देश के लिए एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय हित है। हालांकि, उनके अनुसार ऊर्जा सुरक्षा का अर्थ केवल ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि यह भी है कि आम लोगों को सस्ती ऊर्जा उपलब्ध हो।

उन्होंने कहा कि आयातित तेल पर भारत की भारी निर्भरता एक बुनियादी कमजोरी है। इसलिए इसका दीर्घकालिक समाधान केवल एक देश से तेल खरीदना कम करके किसी दूसरे देश से अधिक तेल खरीदना नहीं हो सकता। ऐसा करने से एक निर्भरता की जगह दूसरी निर्भरता पैदा हो सकती है।

उन्होंने ऊर्जा के क्षेत्र में दीर्घकालिक बदलाव की जरूरत बताते हुए सार्वजनिक परिवहन और रेलवे, ऊर्जा दक्षता, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, विकेंद्रीकृत बिजली उत्पादन और घरेलू विनिर्माण को बढ़ावा देने में निवेश बढ़ाने की बात कही। उनके अनुसार, इससे आयातित जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता कम हो सकती है और पर्यावरण संरक्षण के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी मजबूती मिल सकती है।

ऊर्जा और व्यापार में विविधता पर जोर

जमात-ए-इस्लामी हिंद के नायब अमीर ने भारत सरकार से किसी एक भू-राजनीतिक समूह या ऊर्जा स्रोत पर अत्यधिक निर्भरता से बचने और रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाने का आग्रह किया।

उन्होंने कहा कि भारत को अपनी ऊर्जा और व्यापारिक साझेदारियों में विविधता लानी चाहिए। साथ ही, नवीकरणीय ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा दक्षता और ऐसे अन्य क्षेत्रों में निवेश तेज करना चाहिए, जिनसे आयातित जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम हो सके।

उन्होंने कहा कि भारत को किसी एक भू-राजनीतिक खांचे में बंधने से बचना चाहिए और अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखनी चाहिए। उनके अनुसार, देश की विदेश और आर्थिक नीतियां शांति, आर्थिक सुरक्षा और आम नागरिकों के कल्याण को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए।

भारत-अमेरिका बातचीत जारी रखने की अपील

एस. अमीनुल हसन ने भारत और अमेरिका के बीच लगातार कूटनीतिक बातचीत जारी रखने की मांग की, ताकि मौजूदा विवाद व्यापक आर्थिक टकराव का रूप न ले।

उन्होंने कहा कि भारत सरकार को अपने व्यापारिक और आर्थिक हितों की रक्षा करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उसके फैसले जनता के कल्याण तथा देश के दीर्घकालिक हितों को ध्यान में रखकर लिए जाएं।