आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
कल्पना कीजिए कि आप अपने बच्चे का टीकाकरण कराने को लेकर चिंतित हैं। सोशल मीडिया मंच ‘फेसबुक’ पर प्रदर्शित एक संदेश आपको कहता है- ‘‘समुदाय और अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए आज ही उनके टीकाकरण की बुकिंग करें।’’ वहीं दूसरे संदेश में कहा जाता है- ‘‘क्या आप जानते हैं कि बचपन में लगाए जाने वाले टीकों का आपके बच्चों पर क्या असर होता है?’’
दोनों संदेश टीकाकरण से जुड़ी एक ही विश्वसनीय जानकारी तक पहुंचाते हैं। लेकिन हाल में प्रकाशित हमारे शोध में पाया गया कि दूसरे संदेश पर क्लिक किए जाने की संभावना करीब 52 प्रतिशत अधिक थी।
हम यह जांचना चाहते थे कि क्या ऑनलाइन तथ्यात्मक जानकारी को पेश करने का तरीका बदलने से वह उन लोगों तक भी पहुंच सकती है, जो आम तौर पर ऐसी जानकारी पर ध्यान नहीं देते। हमारे निष्कर्ष बताते हैं कि जानकारी एक जैसी रहने पर भी उसके शब्दों और प्रस्तुति का तरीका मायने रखता है।