Prime Minister Modi Should Convene an All-Party Meeting to Discuss the Delimitation Issue: Revanth Reddy
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने मंगलवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से प्रस्तावित परिसीमन पर विचार-विमर्श करने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाने की अपील की।
उन्होंने आरोप लगाया कि आर्थिक योगदान पर विचार किए बिना आनुपातिक आधार पर लोकसभा सीट में वृद्धि से देश के संघीय संतुलन में विकृति आएगी।
रेड्डी ने प्रधानमंत्री मोदी को लिखे खुले पत्र में परिसीमन के लिए अपने ‘हाइब्रिड’ मॉडल का सुझाव दिया, जिसमें 50 प्रतिशत सीट आनुपातिक आधार पर बढ़ाने और शेष सीट जीएसडीपी और अन्य प्रदर्शन मानदंडों के आधार पर बढ़ाने का प्रस्ताव दिया गया है।
उन्होंने कहा कि आनुपातिक मॉडल दक्षिण भारत की जनता और सरकारों को स्वीकार्य नहीं होगा और उनकी चिंताओं को दूर किए बिना आगे बढ़ने का कोई भी प्रयास अनिवार्य रूप से व्यापक विरोध तथा प्रतिरोध को जन्म देगा, क्योंकि यह न्यायोचित प्रतिनिधित्व के मूलभूत सिद्धांत को प्रभावित करता है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि इसलिए, एक ऐसा सामूहिक समाधान खोजना आवश्यक है जो न्यायसंगत और टिकाऊ दोनों हो।
उन्होंने पत्र में कहा, ‘‘मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि कृपया इस मुद्दे पर पारदर्शी और समावेशी तरीके से विचार-विमर्श करने के लिए सभी राज्यों और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को एक मंच पर लाने के लिए जल्द से जल्द एक सर्वदलीय बैठक बुलाएं।’’
रेड्डी ने स्वामी विवेकानंद की इस टिप्पणी को याद करते हुए कहा कि उनके द्वारा प्रस्तावित ‘हाइब्रिड’ मॉडल केवल एक सुझाव है, एक संभावित दृष्टिकोण है, कि यदि हम खुले दिमाग से विचार करें और नए सुझावों को आने दें, तो लोकतांत्रिक शक्तियां सर्वोत्तम समाधान ढूंढ लेती हैं।
उन्होंने दावा किया कि राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देने के बावजूद, दक्षिणी राज्यों की संसद में आवाज में सापेक्षिक कमी आएगी, जबकि उत्तरी-मध्य क्षेत्र में अधिक जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को असमान रूप से लाभ होगा।
मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि वित्तीय विकेंद्रीकरण के मामले में, दक्षिणी राज्यों को गंभीर ‘‘अन्याय, पक्षपात और भेदभाव’’ का सामना करना पड़ रहा है, जहां बिहार या उत्तर प्रदेश जैसे कुछ राज्यों को उनके द्वारा दिए गए प्रत्येक रुपये के बदले बहुत अधिक राशि प्राप्त होती है। वहीं, तेलंगाना को उसके योगदान से बहुत कम राशि मिलती है।
उन्होंने दावा किया कि यह दशकों से हमारे सामने मौजूद ‘‘दक्षिण-उत्तर’’ विभाजन का सिर्फ एक उदाहरण है।