PIL in SC seeks court-mandated SOP, fast-track probe and property confiscation to curb paper leak menace
नई दिल्ली
सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई है। इसमें देश भर में पेपर लीक मामलों की जांच और कानूनी कार्रवाई के तरीके को पूरी तरह से बदलने के लिए कई निर्देश देने की मांग की गई है। इन निर्देशों में एक स्पेशल इन्वेस्टिगेशन प्रोसीजर (SIP) बनाना, तय समय में जांच और तेज़ी से सुनवाई सुनिश्चित करना, संगठित पेपर लीक रैकेट में शामिल लोगों की संपत्ति ज़ब्त करना और दोषियों को एक के बाद एक सज़ा देना शामिल है।
संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर इस PIL में कहा गया है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक ने सार्वजनिक परीक्षाओं की विश्वसनीयता को कम कर दिया है और लाखों छात्रों के भविष्य को खतरे में डाल दिया है। याचिका में कहा गया है कि 'सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024' बनने के बावजूद, पेपर लीक की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं क्योंकि इस कानून में जांच का कोई प्रभावी ढांचा और दोषियों को रोकने के लिए पर्याप्त उपाय नहीं हैं।
याचिका के अनुसार, मौजूदा कानून में जांच या सुनवाई के लिए कोई तय समय-सीमा, जांच का एक जैसा तरीका, डिजिटल सबूतों को सुरक्षित रखना ज़रूरी बनाना, एजेंसियों के बीच तालमेल, संगठित गिरोहों की वित्तीय जांच, या परीक्षा में धोखाधड़ी से बनाई गई संपत्ति का पता लगाने और उसे ज़ब्त करने का कोई तरीका नहीं बताया गया है। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इन कमियों के कारण असली मास्टरमाइंड कानूनी कार्रवाई से बच जाते हैं, जबकि केवल निचले स्तर पर शामिल लोगों को ही गिरफ्तार किया जाता है।
याचिका में केंद्र और राज्यों को निर्देश देने की मांग की गई है कि वे पेपर लीक मामले के हर चरण - रिपोर्टिंग और सबूत इकट्ठा करने से लेकर कानूनी कार्रवाई और सुनवाई तक - के लिए जांच का एक मानक ढांचा तैयार करें। इसमें कहा गया है कि ऐसे ढांचे में परीक्षा रद्द करने, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों को सुरक्षित रखने, प्रभावित छात्रों की सुरक्षा और जांच एजेंसियों के बीच तालमेल के लिए स्पष्ट नियम भी होने चाहिए।
इसमें कोर्ट से यह भी आग्रह किया गया है कि वह अधिकारियों को दोषियों और उनके परिवार के सदस्यों की संपत्ति की पहचान करने और उसका आकलन करने का निर्देश दे। साथ ही, जहां भी लागू हो, संगठित परीक्षा धोखाधड़ी से हुई कमाई का पता लगाने और उसे ज़ब्त करने के लिए 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम', 'मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम', 'बेनामी लेनदेन कानून' और 'काला धन अधिनियम' के प्रावधानों का इस्तेमाल किया जाए।
याचिका में तर्क दिया गया है कि बार-बार होने वाले पेपर लीक समानता, शिक्षा और सरकारी नौकरी में समान अवसर, और अनुच्छेद 14, 16 और 21 के तहत जीवन और सम्मान के अधिकार की संवैधानिक गारंटी का उल्लंघन करते हैं। इसमें कहा गया है कि छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सालों बिताते हैं और कोचिंग, पढ़ाई के सामान और रहने-सहने पर काफी पैसा खर्च करते हैं, लेकिन लीक के कारण उन्हें अनिश्चितता और बार-बार परीक्षा देने जैसी स्थितियों का सामना करना पड़ता है। इसमें यह भी कहा गया है कि ऐसी घटनाओं से गंभीर मानसिक परेशानी और आर्थिक तंगी होती है, साथ ही शिक्षा और नौकरी के मौके भी हाथ से निकल जाते हैं।
याचिकाकर्ता ने यूनाइटेड किंगडम, चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के तौर-तरीकों का ज़िक्र करते हुए कहा है कि उन देशों में अनिवार्य रिपोर्टिंग, सबूतों को सुरक्षित रखने, मिलकर जांच करने और संस्थागत जवाबदेही के लिए व्यवस्थित तरीके मौजूद हैं। वहीं, भारत का सिस्टम सिर्फ़ अपराध और सज़ा तय करने तक ही सीमित है और इसमें जांच का कोई व्यापक प्रोटोकॉल नहीं है।
PIL में यह भी मांग की गई है कि पेपर लीक के मामलों में सज़ा एक साथ (concurrently) चलने के बजाय एक के बाद एक (consecutively) चलनी चाहिए, ताकि डर पैदा किया जा सके और ऐसे मामलों को रोका जा सके। इसके अलावा, याचिका में सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया गया है कि वह लॉ कमीशन को निर्देश दे कि वह अंतरराष्ट्रीय तौर-तरीकों की जांच करे और तीन महीने के भीतर पेपर लीक के मामलों से निपटने के लिए सुधारों पर रिपोर्ट सौंपे।
याचिकाकर्ता ने कोर्ट से धोखे का पता लगाने वाली कुछ तकनीकों से जुड़ी कानूनी स्थिति पर फिर से विचार करने का भी अनुरोध किया है। उनका तर्क है कि भले ही नार्को-एनालिसिस की इजाज़त न हो, लेकिन कोर्ट को पॉलीग्राफ और ब्रेन इलेक्ट्रिकल एक्टिवेशन प्रोफ़ाइल (BEAP) टेस्ट के इस्तेमाल पर लगी पूरी रोक पर फिर से विचार करना चाहिए। उनका कहना है कि ये तकनीकें जांचकर्ताओं को संगठित पेपर-लीक सिंडिकेट के मास्टरमाइंड की पहचान करने में मदद कर सकती हैं।