संगठनात्मक गिरावट और मध्य-स्तरीय नेतृत्व के कमजोर होने से तृणमूल ने बंगाल में मुंह की खाई

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 05-05-2026
organisational decline and weak middle-level leadership.
organisational decline and weak middle-level leadership.

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली 

 
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार केवल सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं है, बल्कि यह उसके संगठनात्मक ढांचे में गहरी दरार और संस्थागत कमजोरी को भी उजागर करती है जिससे पार्टी की दीर्घकालिक स्थिरता पर सवाल खड़े हो गए हैं
 
इस झटके के केंद्र में केवल सत्ता-विरोधी लहर या भाजपा का उभार नहीं है, बल्कि पार्टी की उस “मध्य-स्तरीय नेतृत्व” परत का क्रमिक क्षरण है जो पहले ममता बनर्जी की जन अपील को बूथ स्तर तक प्रभावी संगठनात्मक ताकत में बदलती थी।
 
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा, “तृणमूल कांग्रेस ने सिर्फ चुनाव नहीं हारा, उसने अपनी संगठनात्मक स्मृति खो दी है। यह केवल हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक पतन है। पार्टी नेतृत्व और कार्यकर्ताओं के बीच का संपर्क सेतु टूट गया है।”
 
चुनावी आंकड़े भी इसी गिरावट की पुष्टि करते हैं। भाजपा का वोट शेयर 38 प्रतिशत से बढ़कर लगभग 45 प्रतिशत हो गया, जबकि तृणमूल कांग्रेस का वोट शेयर 48 प्रतिशत से घटकर करीब 40.94 प्रतिशत रह गया। सीटों के लिहाज से यह बदलाव और भी बड़ा रहा। तृणमूल कांग्रेस की सीटें 215 से घटकर 80 रह गईं, जबकि भाजपा 77 से बढ़कर 206 सीटों पर पहुंच गई।
 
विश्लेषकों के अनुसार, तृणमूल कांग्रेस की संगठनात्मक ताकत पहले उसके मध्य-स्तरीय नेताओं पर आधारित थी, जिनमें मुकुल रॉय, शुभेंदु अधिकारी और पार्थ चटर्जी जैसे दिग्गजों के नाम शामिल थे। ये नेता केवल राजनीतिक चेहरे नहीं, बल्कि स्थानीय नेटवर्क और चुनावी मशीनरी के महत्वपूर्ण स्तंभ थे।
 
अब यह परत काफी हद तक कमजोर हो चुकी है। कुछ नेता पार्टी छोड़कर चले गए, कुछ विवादों में घिर गए और कई की भूमिका एक अत्यधिक केंद्रीकृत नेतृत्व संरचना में सीमित हो गई, जो ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी के इर्द-गिर्द केंद्रित रही।
 
राजनीतिक विश्लेषक संजय कुमार ने कहा, “भाजपा का उभार उतना ही तृणमूल कांग्रेस के आंतरिक संकुचन का परिणाम है जितना कि उसके अपने विस्तार का। तृणमूल कांग्रेस के संगठन में अहम भूमिका निभाने वाले कई नेता भाजपा में चले गए।”
 
यह बदलाव निर्णायक साबित हुआ। कई जिलों में भाजपा ने पूर्व तृणमूल कांग्रेस नेताओं के नेटवर्क का उपयोग कर मजबूत जमीनी पकड़ बना ली जिससे उसे पहले से तैयार संगठनात्मक ढांचा मिल गया।