आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
भारत के प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने लंदन में भारतीय उच्चायोग द्वारा आयोजित एक परिचर्चा के दौरान कहा कि भारत की न्यायपालिका ने मध्यस्थता को केवल एक वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में नहीं, बल्कि विवाद निपटान के एक सशक्त और प्रभावी तंत्र के रूप में बढ़ावा दिया है।
सीजेआई ने कहा कि मध्यस्थता की व्यवस्था उनके दिल के बहुत करीब है। उन्होंने बताया कि उच्चतम न्यायालय विधिक सेवा समिति (एससीएलएससी) ने प्रशिक्षित मध्यस्थों की एक बड़ी टीम तैयार की है।
उन्होंने कहा, ‘‘मैं गर्व से कह सकता हूं कि भारत में हर शहर और हर गली में लोग जानते हैं कि मध्यस्थता क्या होती है।’’
एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग ने बुधवार को ‘‘प्रौद्योगिकी और मध्यस्थता का भविष्य’’ विषय पर एक उच्चस्तरीय परिचर्चा आयोजित की, जिसमें भारत और ब्रिटेन के प्रमुख न्यायिक एवं कानूनी विशेषज्ञों ने भाग लिया।
प्रधान न्यायाधीश के अलावा पैनल में ब्रिटेन की उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश लॉर्ड हैम्बलेन, बार काउंसिल ऑफ इंग्लैंड एंड वेल्स की अध्यक्ष क्रिस्टी ब्राइमलॉ केसी और लॉ सोसायटी ऑफ इंग्लैंड एंड वेल्स के उपाध्यक्ष ब्रेट डिक्सन शामिल थे।
भारतीय उच्चायुक्त कुमारन पी के भाषण के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हुई, जबकि चर्चा का संचालन उच्चतम न्यायालय की ‘एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड’ तन्वी दुबे ने किया।
मध्यस्थता को बढ़ावा देने में न्यायपालिका की भूमिका पर सीजेआई ने भारत में मध्यस्थता के विकास को दो चरणों - मध्यस्थता अधिनियम, 2023 से पहले और उसके बाद- में विभाजित किया।
उन्होंने कहा कि कानून बनने से पहले भी अदालतें मध्यस्थता को विवाद समाधान के एक मजबूत माध्यम के रूप में प्रोत्साहित करती रही हैं। 2004 में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में अपने शुरुआती दिनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि निचली अदालतों, उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय स्तर पर मध्यस्थता केंद्र स्थापित किए गए थे।
उन्होंने कहा, ‘‘मध्यस्थता अधिनियम, 2023 एक ऐसी वैधानिक और न्यायिक व्यवस्था का परिणाम है, जो दशकों में विकसित हुई है।’’
प्रधान न्यायाधीश ने मध्यस्थता की क्षमता बढ़ाने के लिए न्यायपालिका की विभिन्न पहलों का उल्लेख किया। इनमें राज्य न्यायिक अकादमियों के माध्यम से मध्यस्थों के लिए अनिवार्य प्रशिक्षण कार्यक्रम तथा राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण और लोक अदालतों की भूमिका शामिल है, जिन्होंने लोगों को सहमति आधारित विवाद समाधान तंत्र से परिचित कराया है।