शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज होने पर जमाअत-ए-इस्लामी हिंद ने जताई चिंता

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 07-07-2026
Jamaat-e-Islami Hind expresses concern over the rejection of the bail pleas of Sharjeel Imam and Umar Khalid.
Jamaat-e-Islami Hind expresses concern over the rejection of the bail pleas of Sharjeel Imam and Umar Khalid.

 

नई दिल्ली:

जमाअत-ए-इस्लामी हिंद (जेआईएच) के उपाध्यक्ष मलिक मोतसिम खान ने दिल्ली की एक निचली अदालत द्वारा शरजील इमाम और उमर खालिद की नई जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने कहा कि मुकदमे की सुनवाई पूरी तरह शुरू हुए बिना लगभग छह वर्षों तक दोनों की न्यायिक हिरासत में रहना संविधान में प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और त्वरित न्याय के अधिकार से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करता है।

मीडिया को जारी एक प्रेस वक्तव्य में मलिक मोतसिम खान ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रत्येक नागरिक को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार प्राप्त है, जिसमें त्वरित सुनवाई का अधिकार भी शामिल है। उनका कहना था कि यदि किसी व्यक्ति को लंबे समय तक मुकदमा शुरू हुए बिना हिरासत में रखा जाता है, तो ऐसी स्थिति में कानूनी प्रक्रिया स्वयं दंड का रूप ले लेती है, जो संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।

उन्होंने कहा कि यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि इसी मामले में समान कानूनी प्रावधानों के तहत आरोपों का सामना कर रहे पांच अन्य सह-आरोपियों को पहले ही सर्वोच्च न्यायालय से जमानत मिल चुकी है। हालांकि, सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक पूर्व आदेश में यह माना था कि उमर खालिद और शरजील इमाम का मामला अन्य आरोपियों से "गुणात्मक रूप से अलग" है और उनके मामले में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) की धारा 43डी(5) के तहत जमानत पर लागू वैधानिक प्रतिबंध प्रभावी रहेगा।

मलिक मोतसिम खान ने कहा कि निचली अदालत ने भी स्वयं को सर्वोच्च न्यायालय के उस निष्कर्ष से बंधा हुआ माना और मामले पर पुनर्विचार करने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद यह प्रश्न बना हुआ है कि क्या "जमानत नियम है और जेल अपवाद" जैसे स्थापित संवैधानिक सिद्धांत का पर्याप्त पालन हो रहा है। उन्होंने कहा कि यह सिद्धांत सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कई मामलों में दोहराया गया है और विशेष कानूनों के तहत भी न्यायिक निर्णयों का मार्गदर्शन करना चाहिए, विशेषकर तब जब मुकदमों के पूरा होने में लंबा समय लग रहा हो।

जेआईएच उपाध्यक्ष ने कहा कि संगठन का लगातार यह मत रहा है कि देश की आपराधिक न्याय प्रणाली को निष्पक्षता, विधिसम्मत प्रक्रिया, कानून के समक्ष समानता और प्रत्येक व्यक्ति के लिए त्वरित न्याय जैसे संवैधानिक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। उन्होंने कहा कि यूएपीए के तहत जमानत से संबंधित कड़े प्रावधानों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार के बीच संतुलन का प्रश्न फिलहाल सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ के समक्ष विचाराधीन है।

मलिक मोतसिम खान ने सर्वोच्च न्यायालय की बड़ी पीठ से आग्रह किया कि वह यूएपीए के तहत जमानत से जुड़े लंबित संवैधानिक प्रश्नों पर शीघ्र सुनवाई कर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि इस महत्वपूर्ण कानूनी क्षेत्र में स्पष्टता आ सके। उन्होंने संबंधित अदालतों और अभियोजन पक्ष से भी अपील की कि मामले की सुनवाई में और विलंब न हो तथा मुकदमे को शीघ्र पूरा किया जाए।

उन्होंने कहा कि संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल आधारशिला है और न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक विलंब इन मूलभूत सिद्धांतों के प्रति जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकता है।