Indian markets likely to turn increasingly earnings-driven amid global risks: Report
नई दिल्ली
ICICI प्रूडेंशियल AMC की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय इक्विटी मार्केट पर अब कॉर्पोरेट कमाई का असर ज़्यादा दिखेगा। जिन कंपनियों का कैश फ्लो मज़बूत है, जिनकी कमाई का भविष्य साफ़ है और जो काम को सही ढंग से करती हैं, वे बाज़ार में जारी उतार-चढ़ाव का बेहतर ढंग से सामना कर पाएंगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि बाहरी जोखिम - जैसे पश्चिम एशिया में तनाव, कच्चे तेल की कीमतें, ग्लोबल बॉन्ड यील्ड और विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) का पैसा निकालना - बाज़ार की चाल पर असर डाल सकते हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि घरेलू लिक्विडिटी और मज़बूत आर्थिक गतिविधियाँ सहारा दे सकती हैं, जबकि रिटर्न तय करने में सही स्टॉक चुनना और भी ज़रूरी हो जाएगा।
यह आकलन तब आया है जब सितंबर में भारतीय इक्विटी पर काफ़ी दबाव था। जियो-पॉलिटिकल तनाव बढ़ने, कच्चे तेल की कीमतें ज़्यादा होने, ग्लोबल बॉन्ड यील्ड बढ़ने और विदेशी निवेशकों की बिकवाली के कारण निफ्टी 50 में 6.1 प्रतिशत की गिरावट आई। इस महीने के दौरान निफ्टी मिडकैप 150 और निफ्टी स्मॉलकैप 250 इंडेक्स में क्रमशः लगभग 7.1 प्रतिशत और 3.1 प्रतिशत की गिरावट आई। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने सेकेंडरी मार्केट में भारतीय इक्विटी से लगभग 4.1 बिलियन अमेरिकी डॉलर निकाले, जबकि घरेलू संस्थागत निवेशकों ने लगभग 8 बिलियन अमेरिकी डॉलर की खरीदारी की, जिससे विदेशी बिकवाली का असर कम हुआ।
मैक्रो-इकोनॉमिक मोर्चे पर, रिपोर्ट ने महंगाई के दबाव और लंबे समय तक ऊँची ब्याज दरों वाले माहौल के जोखिम की ओर इशारा किया। भारत में कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन (खुदरा महंगाई) जुलाई में 4.5 प्रतिशत से बढ़कर अगस्त में 4.8 प्रतिशत हो गई, जबकि मॉनसून सीज़न के दौरान देश में बारिश की 12.6 प्रतिशत कमी दर्ज की गई, जिससे कृषि उत्पादन, ग्रामीण आय और खाद्य पदार्थों की महंगाई को लेकर चिंताएँ बढ़ गईं। इस माहौल में, एसेट मैनेजर ने कहा कि जो कंपनियाँ निकट भविष्य में मज़बूत कैश फ्लो बना रही हैं, वे उन कंपनियों की तुलना में बेहतर स्थिति में हो सकती हैं जो भविष्य की कमाई पर निर्भर हैं, क्योंकि ऊँची डिस्काउंट दरों का वैल्यूएशन पर असर पड़ सकता है। ज़्यादा कर्ज़ वाली कंपनियों को भी फंडिंग की लागत बढ़ने पर बैलेंस-शीट से जुड़े बड़े जोखिमों का सामना करना पड़ सकता है।
रिपोर्ट से पता चला है कि पोर्टफोलियो को उन वैल्यू-ओरिएंटेड व्यवसायों की ओर झुकाव से फ़ायदा हो सकता है जिनमें मज़बूत कैश जेनरेशन, समझदारी भरा कैपिटल स्ट्रक्चर और मज़बूत बैलेंस शीट हो। इस बीच, भारत के निवेश आउटलुक में कुछ सकारात्मक संकेत दिखे। FY27 की पहली तिमाही में नए प्रोजेक्ट्स की घोषणाएं सालाना आधार पर लगभग 29% बढ़कर ₹14.6 ट्रिलियन हो गईं। इसमें मुख्य रूप से प्राइवेट सेक्टर के निवेश का योगदान रहा, जबकि सरकारी प्रोजेक्ट्स की घोषणाओं में कमी आई।
रिपोर्ट में कहा गया है कि वेस्ट एशिया में फिर से बढ़ते तनाव, मॉनसून से जुड़ी महंगाई और रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के पॉलिसी फ़ैसले अहम कारक होंगे जिन पर नज़र रखनी होगी। इसमें यह भी कहा गया है कि जिन कंपनियों की कमाई में स्थिरता की उम्मीद है और जिनकी काम करने की क्षमता मज़बूत है, वे मार्केट के प्रदर्शन के लिए बहुत महत्वपूर्ण होंगी, क्योंकि निवेशक अब बुनियादी बातों (फ़ंडामेंटल्स) पर ज़्यादा ध्यान दे रहे हैं।