नई दिल्ली
आशिका इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज़ की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मेटल्स (धातुओं) के विकास का अगला दौर माइनिंग (खनन) के बजाय रीसाइक्लिंग से आगे बढ़ेगा, जिसमें स्क्रैप इस इंडस्ट्री का सबसे अहम संसाधन बनकर उभरेगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि देश की संगठित नॉन-फेरस (अलौह) रीसाइक्लिंग इंडस्ट्री कई सालों तक चलने वाले स्ट्रक्चरल ग्रोथ (संरचनात्मक विकास) के दौर में प्रवेश कर रही है। "रीसाइक्लिंग: द न्यू ओर" (Recycling: The New Ore) नाम की अपनी रिपोर्ट में, आशिका ने कहा कि ग्लोबल मेटल्स इंडस्ट्री में एक स्ट्रक्चरल बदलाव हो रहा है, क्योंकि इलेक्ट्रिफिकेशन, रिन्यूएबल एनर्जी और इंफ्रास्ट्रक्चर से बढ़ती मांग का सामना संसाधनों की कमी और कड़े पर्यावरण नियमों से हो रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है, "हमारा मानना है कि मेटल्स इंडस्ट्री में वैल्यू क्रिएशन (मूल्य सृजन) का अगला दौर खदानों के मालिकाना हक से कम और स्क्रैप तक पहुंच, सोर्सिंग नेटवर्क और प्रोसेसिंग टेक्नोलॉजी से ज़्यादा आगे बढ़ेगा। यह स्ट्रक्चरल बदलाव भारत के संगठित नॉन-फेरस रीसाइक्लर पर हमारे निवेश के नज़रिए का आधार है।" रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की मेटल्स की कहानी "माइनिंग से रीसाइक्लिंग की ओर" बढ़ रही है। धातु की बढ़ती खपत, संसाधनों की कमी और सस्टेनेबिलिटी (स्थिरता) की ज़रूरतों के कारण रीसाइकिल किया गया लेड, कॉपर और एल्युमीनियम सप्लाई का एक अहम स्रोत बन रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, बैटरी वेस्ट मैनेजमेंट रूल्स (BMWR) और एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (EPR) फ्रेमवर्क जैसे रेगुलेटरी उपाय अनौपचारिक स्क्रैप प्रोसेसिंग से संगठित रीसाइक्लिंग की ओर बदलाव को तेज़ कर रहे हैं, जिससे "नियमों का पालन करने वाली कंपनियों के लिए लंबे समय तक स्ट्रक्चरल ग्रोथ का मौका" बन रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि इंडस्ट्री का कॉम्पिटिटिव एडवांटेज (प्रतिस्पर्धी लाभ) भी बदल रहा है, जिसमें केवल प्रोसेसिंग क्षमता के बजाय स्क्रैप तक पहुंच ज़्यादा कीमती हो रही है।
रिपोर्ट में कहा गया है, "स्क्रैप तक पहुंच सबसे कीमती एसेट (संपत्ति) के रूप में उभर रही है।" इसमें आगे कहा गया है कि "सोर्सिंग नेटवर्क, कलेक्शन क्षमताएं और रेगुलेटरी नियमों का पालन, इंडस्ट्री में लंबे समय तक लीडरशिप तय करने में इंस्टॉल्ड क्षमता से ज़्यादा अहम हो जाएंगे।" रिपोर्ट में बताया गया है कि कंपनियां तेज़ी से बेसिक मेटल रिकवरी से आगे बढ़कर एलॉय, कंडक्टर, बसबार और स्पेशलिटी प्रोडक्ट्स जैसे वैल्यू-एडेड प्रोडक्ट्स की ओर बढ़ रही हैं, जिससे बेहतर मार्जिन और ग्राहकों के साथ मज़बूत संबंध बनाने में मदद मिल सकती है।
इसमें कहा गया है, "मेटल रिकवरी से ज़्यादा अहम वैल्यू एडिशन (मूल्य संवर्धन) होता जा रहा है।" साथ ही कहा गया है कि कमाई का अगला दौर केवल रीसाइक्लिंग की मात्रा बढ़ाने के बजाय, प्रोसेस किए गए हर टन स्क्रैप से मिलने वाली वैल्यू को बढ़ाने से आगे बढ़ेगा। रिपोर्ट के अनुसार, अलग-अलग धातुओं में लेड (सीसा) से सबसे ज़्यादा कमाई की उम्मीद है, क्योंकि बैटरी बदलने की मांग का अंदाज़ा लगाया जा सकता है और इसे सरकारी नियमों का भी समर्थन मिलता है। वहीं, कॉपर (तांबा) लंबे समय के लिए सबसे बड़ा मौका है, क्योंकि देश में इसकी सप्लाई की कमी बढ़ रही है और इलेक्ट्रिफिकेशन (बिजलीकरण) की वजह से इसकी मांग भी बढ़ रही है। साथ ही, एल्युमीनियम डीकार्बोनाइज़ेशन (कार्बन उत्सर्जन कम करने) के एक अहम मौके के तौर पर उभर रहा है, क्योंकि प्राइमरी प्रोडक्शन के मुकाबले रीसाइकल किए गए एल्युमीनियम के लिए बहुत कम ऊर्जा की ज़रूरत होती है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अभी इस बदलाव के शुरुआती दौर में है, जिसे धातुओं की मज़बूत मांग, अच्छे पॉलिसी सुधार और बढ़ती ऑर्गनाइज़्ड रीसाइक्लिंग क्षमता का समर्थन मिल रहा है। रिपोर्ट में कहा गया, "हमारा मानना है कि भारत इस बदलाव के शुरुआती दौर में है। धातुओं की मज़बूत मांग, अच्छे पॉलिसी सुधार और बढ़ती ऑर्गनाइज़्ड क्षमता के समर्थन से, देश का रीसाइक्लिंग उद्योग कई सालों तक चलने वाले ग्रोथ साइकल के लिए अच्छी स्थिति में है, जिसमें नॉन-फेरस धातुएं निवेश के सबसे अच्छे मौके दे रही हैं।"