DHFL मामला: वाधवान भाइयों पर अतिरिक्त आरोप लगाने की CBI अर्जी खारिज

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 30-10-2026
DHFL Case: Delhi court rejects CBI plea for additional charges against Wadhawan brothers, says it cannot review charge order
DHFL Case: Delhi court rejects CBI plea for additional charges against Wadhawan brothers, says it cannot review charge order

 

नई दिल्ली
 
दिल्ली की एक विशेष अदालत ने कथित बैंक धोखाधड़ी मामले में DHFL के पूर्व प्रमोटरों कपिल वधावन और धीरज वधावन के खिलाफ अतिरिक्त आरोप (भारतीय दंड संहिता - IPC की धारा 409 और 467 सहित) जोड़ने की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने कहा कि वह अपने ही आदेश की समीक्षा नहीं कर सकती, सिवाय इसके कि कोई लिपिकीय (clerical) या टाइपिंग संबंधी गलती हो जिसे सुधारा जाना हो।
 
राउज एवेन्यू जिला अदालत के विशेष न्यायाधीश (CBI) संजीव कुमार मल्होत्रा ​​ने कहा कि हालांकि कोई पक्ष अदालत के ध्यान में ऐसी सामग्री ला सकता है जिसके आधार पर आरोपों में बदलाव या नए आरोप जोड़े जा सकें, लेकिन किसी भी पक्ष को ऐसा बदलाव मांगने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है, क्योंकि यह शक्ति पूरी तरह से अदालत के पास है। अदालत ने यह आदेश 29 अक्टूबर को दिया। यह आदेश CBI द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 216 के तहत दायर एक आवेदन पर आया था, जिसमें 30 जुलाई 2026 को तय किए गए आरोपों में संशोधन की मांग की गई थी।
 
CBI ने कपिल वधावन और धीरज वधावन के खिलाफ IPC की धारा 409 के तहत आरोप तय करने की मांग की थी। इसके अलावा, एजेंसी ने वधावन बंधुओं और सह-आरोपी S.M.N. नकवी के खिलाफ IPC की धारा 467 के तहत आरोप लगाने, और संबंधित आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 120B (आपराधिक साजिश) के तहत आरोप जोड़ने की भी मांग की थी। एजेंसी ने मामले के सभी आरोपियों के खिलाफ IPC की धारा 120B के तहत आपराधिक साजिश का आरोप लगाने, सह-आरोपी अजय नवान्दार के खिलाफ अतिरिक्त आरोप जोड़ने, और पहले दिए गए आदेश की कुछ टिप्पणियों पर स्पष्टीकरण देने की भी मांग की थी।
 
CBI की ओर से पेश विशेष लोक अभियोजक अनुपम एस. शर्मा ने तर्क दिया कि CrPC की धारा 216 अदालत को यह अधिकार देती है कि वह फैसला सुनाए जाने से पहले किसी भी चरण में आरोपों में बदलाव कर सकती है या नए आरोप जोड़ सकती है। उन्होंने कहा कि इससे आरोपियों को कोई नुकसान नहीं होगा, क्योंकि सबूत दर्ज करने की प्रक्रिया अभी हाल ही में शुरू हुई है और अब तक केवल औपचारिक गवाहों से ही पूछताछ की गई है। सीबीआई ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 19 अगस्त के आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें पक्षों को कानून के अनुसार निचली अदालत (ट्रायल कोर्ट) के समक्ष उचित कानूनी उपाय अपनाने की छूट दी गई थी।
 
इस आवेदन का विरोध करते हुए, कपिल वधावन और धीरज वधावन की ओर से पेश वकीलों, नागेश बहल और विशाल गौरव ने तर्क दिया कि सीबीआई उन मुद्दों को फिर से खोलना चाहती है, जिन पर अदालत पहले ही 30 जुलाई के अपने विस्तृत आदेश में विचार कर चुकी है और फैसला सुना चुकी है। बचाव पक्ष ने दलील दी कि यह आवेदन किसी लिपिकीय (clerical) या टाइपिंग संबंधी गलती को सुधारने के लिए नहीं है, बल्कि यह पहले दिए गए निष्कर्षों पर फिर से विचार करने जैसा है। उन्होंने तर्क दिया कि किसी न्यायिक फैसले से सीबीआई की असहमति को कोई अनजाने में हुई गलती नहीं माना जा सकता, और एजेंसी धारा 216 CrPC की आड़ में आदेश की समीक्षा करने की कोशिश कर रही है।
 
बचाव पक्ष ने प्रस्तावित अतिरिक्त आरोपों का भी विरोध किया। उन्होंने कहा कि सीबीआई ने रिकॉर्ड पर कोई नया सबूत पेश नहीं किया है, और धारा 467 IPC के तहत प्रस्तावित आरोप न तो चार्जशीट में शामिल थे और न ही आरोप तय करने (framing of charges) के दौरान हुई बहस में इनका जिक्र किया गया था। बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि 'लगातार चल रही साजिश' (continuing conspiracy) की अवधारणा के आधार पर, मामले में शामिल हर आरोपी को हर अपराध के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। उन्होंने आगे कहा कि दिल्ली उच्च न्यायालय ने सीबीआई को सभी आरोपियों के खिलाफ आरोपों से जुड़े पूरे आदेश को फिर से खोलने की अनुमति नहीं दी थी।
 
अजय नवान्दार की ओर से पेश वकील हेमंत शाह ने विशेष रूप से तर्क दिया कि सीबीआई का आवेदन केवल स्पष्टीकरण मांगने या किसी लिपिकीय चूक को सुधारने के लिए नहीं है, बल्कि यह उन मुद्दों को फिर से खोलने का प्रयास है, जिन पर 30 जुलाई के आदेश में पहले ही विस्तार से बहस हो चुकी है और फैसला दिया जा चुका है। उन्होंने कहा कि धारा 216 CrPC एक ऐसा प्रावधान है जो अदालत को किसी वास्तविक चूक को सुधारने, या सबूतों के दौरान सामने आई सामग्री के आधार पर आरोपों में बदलाव करने या नए आरोप जोड़ने का अधिकार देता है। लेकिन, यह प्रावधान किसी ऐसे पक्ष को राहत नहीं देता जो आरोपों पर अदालत के आदेश से असंतुष्ट हो।
 
शाह ने आगे तर्क दिया कि आपराधिक अदालत के पास अपने ही आदेश की समीक्षा करने या उसे वापस लेने (recall) की कोई अंतर्निहित शक्ति (inherent power) नहीं है, और धारा 362 CrPC के तहत केवल लिपिकीय या गणितीय गलतियों को ही सुधारा जा सकता है। उन्होंने तर्क दिया कि CBI असल में पिछले निष्कर्षों को पूरी तरह से फिर से लिखने की कोशिश कर रही थी, जो कि मंजूर नहीं किया जा सकता। बचाव पक्ष ने यह भी दलील दी कि हाई कोर्ट ने CBI को सभी आरोपियों के खिलाफ आरोपों के आदेश को फिर से खोलने की छूट नहीं दी थी। साथ ही, एजेंसी उन अपराधों को शामिल करके अपने मामले को मजबूत करने की कोशिश नहीं कर सकती, जिन्हें पिछली सुनवाई के दौरान नहीं उठाया गया था।
 
अतिरिक्त आरोप जोड़ने की CBI की मांग को खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा कि उसने अपने 30 जुलाई के आदेश में साफ तौर पर यह माना था कि कपिल वधावन और धीरज वधावन के खिलाफ IPC की धारा 409 के तहत अपराध नहीं बनता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वधावन बंधुओं या नवांदर के खिलाफ IPC की धारा 206 और 424 के तहत अपराध साबित करने के लिए कोई सबूत या गवाहों के बयान मौजूद नहीं हैं। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि IPC की धारा 120B के तहत आपराधिक साजिश से जुड़े आरोप पहले ही आरोपियों के खिलाफ तय किए जा चुके हैं।