नई दिल्ली
दिल्ली उच्च न्यायालय ने 2020 के उत्तर-पूर्वी दिल्ली दंगों के दौरान 22 वर्षीय मोनीश की हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए पांच लोगों की अपीलें खारिज कर दी हैं। अदालत ने दंगा करने और गैर-इरादतन हत्या (जो हत्या की श्रेणी में नहीं आती) के लिए उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। न्यायमूर्ति मधु जैन ने 27 अक्टूबर को सुनाए गए फैसले में अमन कश्यप, देवेंद्र कुमार, प्रदीप राय, आशीष उर्फ गोली और अरुण कुमार की दोषसिद्धि को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 148 और धारा 304 (भाग-I) के तहत, धारा 149 के साथ मिलाकर बरकरार रखा। इन पांचों लोगों ने कड़कड़डूमा कोर्ट स्थित उत्तर-पूर्वी जिले के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश-03 द्वारा 30 नवंबर, 2024 को दिए गए फैसले और उसके बाद 13 जनवरी, 2025 को सुनाई गई सजा के आदेश को चुनौती दी थी।
ट्रायल कोर्ट ने उन्हें IPC की धारा 148 के तहत एक साल की साधारण कैद और IPC की धारा 304 (भाग-I) के तहत सात साल की कठोर कैद की सजा सुनाई थी, साथ ही 30,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया था। अदालत ने निर्देश दिया कि ये सभी सजाएं एक साथ चलेंगी। यह मामला 25 फरवरी, 2020 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुई सांप्रदायिक हिंसा के दौरान की एक घटना से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, चांद बाग में पीर बाबा मजार के पास, बृजपुरी के निकट एक भीड़ ने मोनीश का पीछा किया और उस पर हमला किया। इसके बाद उसे गुरु तेग बहादुर अस्पताल ले जाया गया, जहां चोटों के कारण उसकी मौत हो गई।
पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, उसकी मौत किसी भारी वस्तु की चोट से दिमाग में आई गंभीर चोटों के कारण लगे 'शॉक' (सदमे) की वजह से हुई थी। अभियोजन पक्ष ने चश्मदीदों की गवाही पर भरोसा किया, जिनमें पुलिसकर्मी भी शामिल थे। उन्होंने बताया कि उन्होंने पीड़ित का पीछा होते और उस पर हमला होते देखा था। पुलिस के एक गवाह, कांस्टेबल पीयूष ने इन पांचों दोषियों की पहचान की और बताया कि वे भीड़ में सबसे आगे थे। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि ये लोग भीड़ को पीड़ित पर हमला करने के लिए उकसा रहे थे। हालांकि, अपीलकर्ताओं ने पहचान संबंधी सबूतों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। उन्होंने गवाहों के बयानों में विसंगतियों की ओर इशारा किया और कहा कि कोई 'टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड' (पहचान परेड) नहीं कराई गई थी। उन्होंने पुलिस गवाहों के बयान दर्ज करने में हुई देरी, कथित हमलावरों की पहचान बताने वाली उस समय की लिखित रिपोर्टों की कमी, और घटना स्थल को लेकर मौजूद विसंगतियों पर भी ध्यान दिलाया।
बचाव पक्ष ने आगे तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा है कि जानलेवा चोटें पहुंचाने में प्रत्येक अपीलकर्ता की क्या भूमिका थी। उन्होंने कहा कि सबूत उन शर्तों को पूरा नहीं करते जो किसी को दोषी ठहराने के लिए जरूरी होती हैं।
इन आपत्तियों पर विचार करते हुए, उच्च न्यायालय ने चश्मदीद गवाहों के बयानों, मेडिकल सबूतों और उन परिस्थितियों का परीक्षण किया, जिनमें पीड़ित पर हमला किया गया था।
अदालत ने कहा कि पुलिस गवाहों के बयान दर्ज करने में हुई देरी का आकलन मामले की परिस्थितियों के आधार पर किया जाना चाहिए। इसमें यह तथ्य भी शामिल है कि दंगों से जुड़े कई मामलों की जांच एक साथ चल रही थी। अदालत ने माना कि केवल देरी होने भर से गवाहों द्वारा बताई गई घटना पर अविश्वास नहीं किया जा सकता, और न ही इससे यह साबित होता है कि अपीलकर्ताओं को झूठा फंसाया गया है।
अदालत ने घटना स्थल को लेकर मौजूद विसंगतियों, और अस्पताल के सीसीटीवी फुटेज तथा कॉल-डिटेल रिकॉर्ड के साक्ष्य मूल्य पर भी विचार किया। अदालत ने पाया कि अस्पताल के फुटेज का इस्तेमाल घायल व्यक्ति की पहचान करने के लिए किया गया था, न कि यह साबित करने के लिए कि हमले में अपीलकर्ता शामिल थे। अदालत ने आगे कहा कि कॉल-डिटेल रिकॉर्ड से किसी मोबाइल डिवाइस की अनुमानित लोकेशन का पता तो चल सकता है, लेकिन इससे यह जरूरी नहीं कि किसी खास समय पर उसके उपयोगकर्ता की सटीक भौतिक स्थिति का भी पता चले। अदालत ने कहा कि किसी अपीलकर्ता को ठीक उसी जगह पर मौजूद दिखाने वाले इलेक्ट्रॉनिक सबूतों का न होना, चश्मदीद गवाहों की विश्वसनीय गवाही को गलत साबित करने के लिए काफी नहीं है।
फैसले में जांच प्रक्रिया में रही कमियों को स्वीकार किया गया, लेकिन यह भी कहा गया कि ऐसी चूक होने का मतलब यह नहीं है कि अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को ही खारिज कर दिया जाए, खासकर तब जब अन्य सबूत अपराध को साबित करते हों।