आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
पृथ्वी पर मौजूद सबसे समृद्ध जैव विविधता में से कुछ समुद्र में पाई जाती है। प्रवाल भित्तियों और मैंग्रोव के जंगलों से लेकर गहरे समुद्र तक, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र अनगिनत प्रजातियों को सहारा देते हैं, तटीय समुदायों का आधार हैं, जलवायु को नियंत्रित करने में मदद करते हैं और वैश्विक खाद्य सुरक्षा की नींव को मजबूत करते हैं।
लेकिन मछली पकड़ने, प्राकृतिक आवासों के नष्ट होने, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन का दबाव इन तंत्रों पर लगातार बढ़ रहा है।
इसकी प्रतिक्रिया में दुनिया के देशों ने 2030 तक विश्व के कम-से-कम 30 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र के संरक्षण का एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य अपनाया है, जिसे ‘30x30’ के नाम से जाना जाता है। इस लक्ष्य के तहत दुनिया भर में समुद्री संरक्षण का दायरा बढ़ा है, खासकर समुद्री संरक्षित क्षेत्रों (मरीन प्रोटेक्टेड एरिया) के रूप में।
लेकिन सवाल यह है कि किसी क्षेत्र को संरक्षित घोषित करने के बाद क्या होता है?
दशकों के अनुभव बताते हैं कि प्रभावी समुद्री संरक्षण के लिए स्पष्ट नियम-कानून, नियमित निगरानी, पर्याप्त वित्तीय संसाधन और स्थानीय सरकारों, उद्योगों तथा समुदायों के साथ सार्थक सहयोग जरूरी है। इनके अभाव में ये क्षेत्र केवल कागजों पर संरक्षित रह जाते हैं। नक्शे पर खींची गई सीमाओं से आगे उनका कोई वास्तविक असर नहीं होता और अत्यधिक मछली पकड़ने समेत अन्य खतरों का दबाव समुद्री जीवन पर बना रहता है।
हमारे नेतृत्व में तैयार की गई दो नयी रिपोर्ट आज समुद्री संरक्षण की वास्तविक स्थिति और समुद्र के 30 प्रतिशत हिस्से के संरक्षण के लक्ष्य को हासिल करने के लिए आवश्यक कदमों का एक महत्वपूर्ण आकलन प्रस्तुत करती हैं। इनमें एक रिपोर्ट ‘ओरेगन स्टेट यूनिवर्सिटी’ की है जबकि दूसरी ‘स्मिथसोनियन ट्रॉपिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट’ की है।