नयी दिल्ली,
थल सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी रविवार को चार दिवसीय दौरे पर संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) और श्रीलंका के लिए रवाना हो गए। इस दो देशों की यात्रा का उद्देश्य दोनों मित्र राष्ट्रों के साथ भारत के द्विपक्षीय सैन्य सहयोग को और मजबूत करना तथा रणनीतिक समझ को आगे बढ़ाना है।
अपनी यात्रा के पहले चरण में जनरल द्विवेदी 5 और 6 जनवरी को यूएई में रहेंगे। इस दौरान वह वहां के शीर्ष सैन्य नेतृत्व के साथ व्यापक बातचीत करेंगे। इसके अलावा सेना प्रमुख यूएई के प्रमुख सैन्य प्रतिष्ठानों का दौरा करेंगे, जिनमें यूएई नेशनल डिफेंस कॉलेज भी शामिल है। वह वहां तैनात अधिकारियों और जवानों से भी संवाद करेंगे।
भारतीय सेना ने एक बयान में कहा कि ये सभी कार्यक्रम द्विपक्षीय रक्षा सहयोग, पेशेवर सैन्य आदान-प्रदान और दोनों सेनाओं के बीच रणनीतिक समझ को और सुदृढ़ करने की दिशा में अहम हैं। सेना के अनुसार, यह दौरा दोनों देशों की साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है, जिसके तहत आपसी हितों के क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है।
सेना प्रमुख की यह यात्रा ऐसे समय में हो रही है, जब हाल के हफ्तों में यूएई के प्रेसिडेंशियल गार्ड के कमांडर मेजर जनरल अली सैफ हुमैद अलकाबी भारत आए थे। भारत और यूएई के बीच सैन्य सहयोग को दिसंबर 2020 में विशेष गति मिली थी, जब तत्कालीन थल सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे ने यूएई का दौरा किया था। यह किसी भारतीय सेना प्रमुख की यूएई की पहली आधिकारिक यात्रा थी।
यूएई के बाद जनरल द्विवेदी 7 और 8 जनवरी को श्रीलंका का दौरा करेंगे। कोलंबो में वह श्रीलंका के वरिष्ठ राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व से मुलाकात करेंगे, जिनमें रक्षा सचिव और श्रीलंका सेना के कमांडर शामिल हैं। बातचीत के दौरान प्रशिक्षण सहयोग, क्षमता निर्माण और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर चर्चा की जाएगी।
सेना प्रमुख श्रीलंका के डिफेंस सर्विसेज कमांड एंड स्टाफ कॉलेज और बट्टाला स्थित आर्मी वॉर कॉलेज में प्रशिक्षण ले रहे अधिकारियों को भी संबोधित करेंगे। इसके अलावा वह कोलंबो में भारतीय शांति सेना (आईपीकेएफ) के स्मारक पर जाकर श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे। गौरतलब है कि जुलाई 1987 से मार्च 1990 के बीच श्रीलंका में तैनाती के दौरान भारत ने करीब 1,200 सैनिकों को खोया था।
सेना के अनुसार, यह यात्रा हिंद महासागर क्षेत्र और पश्चिम एशिया में मित्र देशों के साथ रक्षा सहयोग, आपसी विश्वास और सैन्य समन्वय को और मजबूत करने की भारत की प्रतिबद्धता को दोहराती है।