डिजिटल एंग्जायटी क्या है? EXPERT ने बताया इससे बचने का सही तरीका

Story by  अर्सला खान | Published by  [email protected] | Date 11-03-2026
What is digital anxiety? Experts explain the right way to deal with it. Show alternatives
What is digital anxiety? Experts explain the right way to deal with it. Show alternatives

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में मोबाइल फोन, लैपटॉप और सोशल मीडिया हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। सुबह उठते ही फोन देखना और रात को सोने से पहले तक स्क्रीन पर समय बिताना अब आम बात हो गई है। लेकिन यही डिजिटल दुनिया कई लोगों के लिए तनाव और बेचैनी की वजह भी बन रही है। इसी स्थिति को मनोविज्ञान की भाषा में डिजिटल एंग्जायटी कहा जाता है।
 
डिजिटल एंग्जायटी दरअसल वह मानसिक स्थिति है, जब व्यक्ति लगातार ऑनलाइन रहने, नोटिफिकेशन देखने या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने के दबाव के कारण तनाव महसूस करने लगता है। कई बार लोग बिना किसी जरूरी कारण के भी बार बार फोन चेक करते रहते हैं। अगर इंटरनेट धीमा हो जाए, फोन दूर रह जाए या किसी मैसेज का तुरंत जवाब न मिले तो मन में बेचैनी पैदा होने लगती है। यही डिजिटल एंग्जायटी का संकेत माना जाता है।
 
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में यह समस्या तेजी से बढ़ी है। खासकर युवाओं और कामकाजी लोगों में इसका असर ज्यादा देखने को मिल रहा है। लगातार स्क्रीन पर रहने से दिमाग को आराम नहीं मिल पाता और धीरे धीरे यह आदत मानसिक थकान में बदल जाती है।
 
साइकोलॉजिस्ट Shuchi Goel के अनुसार डिजिटल एंग्जायटी केवल फोन की लत नहीं है, बल्कि यह मन की एक ऐसी स्थिति है जिसमें व्यक्ति खुद को डिजिटल दुनिया से अलग नहीं कर पाता। उनका कहना है कि जब व्यक्ति को हर समय ऑनलाइन रहने की जरूरत महसूस होने लगे या सोशल मीडिया पर दूसरों की जिंदगी देखकर खुद को कमतर समझने लगे, तो यह चिंता का विषय हो सकता है।
 
उनके मुताबिक सोशल मीडिया पर लगातार तुलना करने की प्रवृत्ति भी डिजिटल एंग्जायटी को बढ़ाती है। लोग दूसरों की सफलताओं और खुशियों को देखकर अपनी जिंदगी को उससे जोड़कर देखने लगते हैं। इससे आत्मविश्वास पर असर पड़ता है और मन में असंतोष या चिंता पैदा हो सकती है।
 
डिजिटल एंग्जायटी के कुछ सामान्य संकेत भी होते हैं। जैसे बिना वजह बार बार फोन चेक करना, नोटिफिकेशन न आने पर भी बेचैनी महसूस होना, सोशल मीडिया पर ज्यादा समय बिताने के बाद थकान या उदासी महसूस होना, या फिर डिजिटल डिवाइस से दूर रहने पर असहज लगना। कई बार यह स्थिति नींद पर भी असर डालती है और व्यक्ति देर रात तक स्क्रीन के सामने जागता रहता है।
 
इससे बचने के लिए मनोवैज्ञानिक कुछ आसान लेकिन असरदार उपाय बताते हैं। सबसे पहला कदम है डिजिटल समय को सीमित करना। दिन का एक तय समय तय करना चाहिए जब फोन या सोशल मीडिया का इस्तेमाल किया जाए। बाकी समय खुद को ऑफलाइन गतिविधियों में व्यस्त रखना बेहतर होता है।
 
Shuchi Goel सलाह देती हैं कि दिन में कुछ समय के लिए डिजिटल डिटॉक्स करना बेहद जरूरी है। इसका मतलब है कुछ घंटों के लिए फोन और इंटरनेट से दूरी बनाना। इस दौरान किताब पढ़ना, टहलना, परिवार के साथ समय बिताना या कोई रचनात्मक काम करना मानसिक स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद होता है।
 
इसके अलावा सोने से कम से कम एक घंटे पहले मोबाइल फोन से दूरी बनाना भी जरूरी माना जाता है। इससे दिमाग को आराम मिलता है और नींद की गुणवत्ता बेहतर होती है।
 
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि डिजिटल दुनिया को पूरी तरह छोड़ना संभव नहीं है, लेकिन उसके इस्तेमाल में संतुलन जरूर बनाया जा सकता है। अगर व्यक्ति अपने समय और ध्यान को सही तरीके से नियंत्रित करे तो डिजिटल एंग्जायटी से काफी हद तक बचा जा सकता है।
 
दरअसल तकनीक इंसान की सुविधा के लिए बनाई गई है, लेकिन जब वही तकनीक मन पर हावी होने लगे तो रुककर सोचने की जरूरत होती है। संतुलित डिजिटल जीवन ही मानसिक शांति का सबसे आसान रास्ता बन सकता है।