आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
एक नई वैज्ञानिक स्टडी में यह सामने आया है कि अधिक वसा युक्त आहार (हाई-फैट डाइट) लिवर को सिर्फ चर्बी से भरने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि लिवर कैंसर के खतरे को भी चुपचाप बढ़ा देता है। अमेरिका के मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के शोधकर्ताओं के अनुसार, लंबे समय तक हाई-फैट डाइट लेने से लिवर की कोशिकाएं अपने सामान्य कामकाज को छोड़कर एक तरह की “सर्वाइवल मोड” में चली जाती हैं, जो आगे चलकर कैंसर के लिए ज़मीन तैयार करती है।
शोध में बताया गया कि जब लिवर कोशिकाएं लगातार चयापचय तनाव का सामना करती हैं, तो वे पूरी तरह विकसित अवस्था में रहने के बजाय एक अपरिपक्व, स्टेम-सेल जैसी स्थिति में लौट जाती हैं। यह बदलाव उन्हें कठिन परिस्थितियों में जीवित रहने में मदद करता है, लेकिन इसी प्रक्रिया के दौरान कैंसर बनने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। यही कारण है कि फैटी लिवर रोग अक्सर लिवर कैंसर से पहले देखा जाता है।
इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों को हाई-फैट डाइट दी और सिंगल-सेल आरएनए सीक्वेंसिंग तकनीक के जरिए लिवर कोशिकाओं में होने वाले बदलावों का विश्लेषण किया। उन्होंने पाया कि शुरुआती चरण में कोशिकाएं ऐसे जीन सक्रिय कर देती हैं, जो उन्हें मरने से बचाते हैं, जबकि लिवर के सामान्य कार्यों से जुड़े जीन धीरे-धीरे निष्क्रिय हो जाते हैं। समय के साथ यह असंतुलन गंभीर रूप ले लेता है और कैंसर का खतरा बढ़ जाता है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि अपरिपक्व अवस्था में मौजूद लिवर कोशिकाएं किसी भी हानिकारक म्यूटेशन के बाद तेजी से कैंसर कोशिकाओं में बदल सकती हैं। अध्ययन में कुछ ऐसे जीन और ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर्स की भी पहचान की गई है, जो भविष्य में दवाओं के लिए संभावित लक्ष्य बन सकते हैं।
मानव रोगियों के लिवर सैंपल्स में भी ऐसे ही पैटर्न पाए गए, जिससे यह साफ हुआ कि यह प्रक्रिया इंसानों में भी लंबे समय में, लगभग 20 वर्षों के दौरान, विकसित हो सकती है। वैज्ञानिक अब यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या डाइट में सुधार या वजन घटाने की दवाओं से इन नुकसानों को पलटा जा सकता है।