नई दिल्ली।
हिंदी सिनेमा में अपनी अलग पहचान बनाने वाले अभिनेता मनोज बाजपेयी ने बॉलीवुड की कार्यशैली और कलाकारों के साथ होने वाले व्यवहार पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों को एक खास छवि में बांध देने की प्रवृत्ति ने कई प्रतिभाशाली लोगों के करियर को नुकसान पहुंचाया है। अनेक कलाकार ऐसे रहे, जिनकी प्रतिभा को उचित अवसर और पहचान नहीं मिली। वे धीरे-धीरे गुमनामी में खो गए।
मनोज बाजपेयी इन दिनों अपनी नई नेटफ्लिक्स फिल्म गजब रात के प्रचार में व्यस्त हैं। इसी दौरान उन्होंने अभिनेत्री दिव्या दत्ता और श्रद्धा दास के साथ जूम को दिए एक साक्षात्कार में हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के अनुभव साझा किए। उन्होंने कहा कि बॉलीवुड की छवि ऐसी रही है, जहां कई बार बेहतरीन प्रतिभाओं को उनकी क्षमता के अनुरूप अवसर देने के बजाय सीमित भूमिकाओं में बांध दिया जाता है।
मनोज बाजपेयी ने कहा कि कलाकारों को एक ही तरह की भूमिकाओं में सीमित कर देना इंडस्ट्री की बड़ी समस्या है। उनके मुताबिक, इस रवैये के कारण कई प्रतिभाशाली कलाकारों के हुनर का सही इस्तेमाल नहीं हो पाया। उन्होंने कहा कि फिल्म सेट पर कलाकारों के साथ किए जाने वाले व्यवहार, उन्हें दी जाने वाली भूमिकाओं और उनके प्रति अपनाए जाने वाले नजरिये ने कई लोगों को निराश किया।
अभिनेता के शब्दों में, इंडस्ट्री ने कई बेहतरीन प्रतिभाओं को इस तरह नुकसान पहुंचाया कि वे बिना किसी पहचान के धीरे-धीरे गुमनामी में खो गईं। उन्होंने बॉलीवुड की इस प्रवृत्ति को उसकी खराब प्रतिष्ठा और नकारात्मक कर्मों से जोड़ते हुए कहा कि कलाकारों की प्रतिभा को दबाने का यह सिलसिला लंबे समय से चला आ रहा है।
मनोज बाजपेयी को भी अपनी प्रतिभा के पूरे इस्तेमाल का इंतजार
मनोज बाजपेयी ने यह भी स्वीकार किया कि वह खुद को इस समस्या से पूरी तरह अलग नहीं मानते। उनके अनुसार, फिल्म निर्माताओं ने अब तक उनकी अभिनय क्षमता के लगभग 25प्रतिशत हिस्से का ही इस्तेमाल किया है। यानी उन्हें लगता है कि एक अभिनेता के रूप में उनके भीतर अभी भी बहुत कुछ ऐसा है, जिसे पर्दे पर सामने लाया जाना बाकी है।
हालांकि, उन्होंने इस बात को लेकर किसी तरह की कड़वाहट जाहिर नहीं की। उन्होंने इसे एक कलाकार की स्वाभाविक बेचैनी और लगातार बेहतर काम करने की इच्छा के रूप में देखा। इतने वर्षों तक अभिनय करने के बाद भी उनके भीतर नई भूमिकाएं निभाने और अपनी क्षमताओं को साबित करने की भूख बनी हुई है।
मनोज बाजपेयी ने अपने करियर में कई यादगार किरदार निभाए हैं। सत्या जैसी फिल्म से उन्हें व्यापक पहचान मिली और उन्होंने अपने अभिनय के दम पर हिंदी सिनेमा में एक मजबूत जगह बनाई। इसके बावजूद उनका मानना है कि कलाकार की क्षमता किसी एक फिल्म, किरदार या स्थापित छवि तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
उनकी यह टिप्पणी फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों को मिलने वाले अवसरों और उनकी वास्तविक प्रतिभा के इस्तेमाल को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को सामने लाती है।
दिव्या दत्ता ने 'सपोर्टिंग एक्टर' के ठप्पे पर उठाए सवाल
साक्षात्कार में अभिनेत्री दिव्या दत्ता ने भी फिल्म इंडस्ट्री में कलाकारों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटने की परंपरा पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि उन्हें 'सपोर्टिंग एक्टर' या 'कैरेक्टर एक्टर' कहे जाने से असहजता होती है।
दिव्या दत्ता के मुताबिक, ऐसे लेबल कई बार कलाकार की वास्तविक क्षमता को समझने की कोशिश किए बिना लगा दिए जाते हैं। एक बार किसी कलाकार को किसी खास श्रेणी में रख दिया जाए, तो वही पहचान उसके लिए आगे बढ़ने की सीमा बन सकती है।
उन्होंने अपने अभिनय करियर का उदाहरण देते हुए कहा कि वह अलग-अलग फिल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं भी निभा चुकी हैं और मुख्य भूमिकाओं में भी नजर आई हैं। हाल ही में उन्होंने सीरीज चिरैया में भी बड़े स्तर पर अपनी अभिनय क्षमता का प्रदर्शन किया।
दिव्या का कहना था कि किसी कलाकार को केवल एक श्रेणी में सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। कलाकार अपने आप में संपूर्ण अभिनेता होते हैं। वह कहानी में जिस भी भूमिका में नजर आएं, उस भूमिका को प्रभावशाली बनाने और दर्शकों से जोड़ने में उनकी अहम भूमिका होती है।
उनकी यह बात उन कलाकारों की समस्या को सामने लाती है, जिन्हें प्रतिभा और अनुभव होने के बावजूद लंबे समय तक सहायक भूमिकाओं तक सीमित कर दिया जाता है।
फिल्म इंडस्ट्री की पुरानी पदानुक्रम व्यवस्था पर भी निशाना
मनोज बाजपेयी ने दिव्या दत्ता की बात से सहमति जताते हुए कहा कि कलाकारों को अलग-अलग दर्जों में बांटने की प्रवृत्ति फिल्म इंडस्ट्री में गहराई तक जमी हुई है। उन्होंने इसे ऐसी पदानुक्रम व्यवस्था से जोड़ा, जिसमें मुख्य अभिनेता, चरित्र अभिनेता और सहायक कलाकारों के बीच स्पष्ट अंतर बनाया जाता है।
उनके मुताबिक, यह सोच लगभग औपनिवेशिक मानसिकता की तरह काम करती है, जहां हर व्यक्ति को एक निश्चित दर्जे में रखने की कोशिश की जाती है। कलाकारों की प्रतिभा और योगदान को स्वतंत्र रूप से देखने के बजाय उन्हें पहले से तय श्रेणियों के आधार पर आंका जाता है।
मनोज बाजपेयी ने कहा कि उन्होंने अपने करियर में इस व्यवस्था का सामना किया है और इससे बाहर निकलने के लिए कई व्यक्तिगत संघर्ष भी किए हैं। हालांकि, उन्हें लगता है कि अब इस सोच की पकड़ धीरे-धीरे कमजोर हो रही है।
बदलाव की यह प्रक्रिया कलाकारों के लिए नए अवसर पैदा कर सकती है। जब फिल्म निर्माता किसी कलाकार को केवल उसकी पुरानी छवि के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी वास्तविक क्षमता के आधार पर भूमिकाएं देने लगेंगे, तो कहानियों और किरदारों में भी अधिक विविधता देखने को मिल सकती है।
ओटीटी प्लेटफॉर्म ने बदली कलाकारों की स्थिति
मनोज बाजपेयी और दिव्या दत्ता दोनों ने डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म यानी ओटीटी को फिल्म इंडस्ट्री में बदलाव का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। मनोज के अनुसार, पहले फिल्मों में सहायक भूमिकाएं निभाने वाले कलाकारों को अक्सर उतना महत्व नहीं मिलता था, जितना मिलना चाहिए। लेकिन अब कई निर्माता पूरी कास्ट के साथ बेहतर और अधिक संतुलित व्यवहार करने की कोशिश करते हैं।
ओटीटी प्लेटफॉर्म के विस्तार ने कलाकारों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। वेब सीरीज और डिजिटल फिल्मों में कई बार ऐसे किरदार देखने को मिलते हैं, जिन्हें पारंपरिक हिंदी सिनेमा में पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती थी। इससे कलाकारों को अपनी अभिनय क्षमता के अलग-अलग पहलुओं को सामने लाने का मौका मिला है।
मनोज बाजपेयी का मानना है कि डिजिटल माध्यमों ने दर्शकों के देखने और कहानियों को समझने के तरीके में भी बदलाव किया है। अब दर्शक केवल मुख्य अभिनेता पर ध्यान नहीं देते, बल्कि कहानी के दूसरे किरदारों, उनके व्यवहार और घटनाक्रम की बारीकियों पर भी चर्चा करते हैं।
उन्होंने एक जिला मजिस्ट्रेट के परिवार के साथ बैठकर एक शो देखने का अनुभव साझा किया। उस परिवार की ओर से किरदारों और कहानी की कमजोरियों को जिस गहराई से समझा गया, उससे वह प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि इस तरह की घरेलू चर्चाओं और दर्शकों की प्रतिक्रियाओं को वह कई पेशेवर समीक्षाओं से भी अधिक महत्व देते हैं।
प्रतिभा को पहचानने की जरूरत
मनोज बाजपेयी और दिव्या दत्ता की टिप्पणियां हिंदी सिनेमा की एक पुरानी समस्या की ओर ध्यान खींचती हैं। किसी कलाकार को उसकी क्षमता के बजाय एक निश्चित छवि में बांध देना न केवल उसके करियर को सीमित कर सकता है, बल्कि फिल्मों में उपलब्ध प्रतिभा का पूरा लाभ उठाने के अवसर भी कम कर देता है।
ओटीटी के विस्तार से इस व्यवस्था में बदलाव के संकेत जरूर दिखाई दे रहे हैं, लेकिन कलाकारों को समान अवसर देने और उनकी प्रतिभा का सम्मान करने की जरूरत अब भी बनी हुई है।
मनोज बाजपेयी की बात का सार यही है कि किसी कलाकार की वास्तविक क्षमता को कुछ भूमिकाओं या स्थापित पहचान के आधार पर नहीं आंका जाना चाहिए। हिंदी सिनेमा में प्रतिभा की कमी नहीं है। जरूरत इस बात की है कि कलाकारों को अपनी पूरी क्षमता दिखाने का अवसर मिले और उन्हें उन सीमाओं में कैद न किया जाए, जिन्हें इंडस्ट्री ने उनके लिए तय कर रखा है।