आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
फिल्म निर्देशक इम्तियाज अली जब भी अखबार देखते तो उनके मन में विस्थापन और तबाही की सुर्खियों को विभाजन की अपनी कहानी से जोड़ने की इच्छा होती। उन्होंने अपने इसी दृष्टिकोण को "मैं वापस आऊंगा" में साकार किया है। यह फिल्म अतीत से वर्तमान तक, और भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर दुनिया के बाकी हिस्सों तक फैले घटनाक्रम को एक सूत्र में पिरोती है।
इम्तियाज अली ने ‘पीटीआई-भाषा’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा, ‘‘मैं लगातार ऐसी खबरें पढ़ रहा था कि कहीं तबाही मची है, कहीं युद्ध छिड़ा हुआ है और बड़ी संख्या में लोग घर-बार छोड़ने को मजबूर होकर शरणार्थी बन रहे हैं तथा अस्तित्व के संकट का सामना कर रहे हैं... यह सब देखकर मेरे मन में बार-बार यही ख्याल आता था कि विभाजन के समय भी ठीक ऐसा ही हुआ था।’’
निर्देशक ने मंगलवार को अपना 55वां जन्मदिन मनाया। उनके लिए जन्मदिन का सबसे बड़ा उपहार संभवतः इस फिल्म को मिल रही प्रतिक्रिया है। इस फिल्म में नसीरुद्दीन शाह, दिलजीत दोसांझ, वेदांग रैना और शरवरी मुख्य भूमिकाओं में है। दर्शकों, खासकर युवाओं का शांत होकर बैठना और कहानी से जुड़ाव महसूस करना इस बात को दर्शाता है कि 95 वर्षीय एक व्यक्ति द्वारा सीमा के उस पार छूट गए अपने प्रेम को याद करने की यह कहानी उन्हें गहराई से छू रही है।
फिल्म की कहानी बुजुर्ग (शाह) द्वारा अपने पोते (दोसांझ) को सुनाई गई अतीत की यादों के जरिए आगे बढ़ती है, जिसके सहारे पोता विभाजन के दर्द और दशकों पुराने उस अमर प्रेम की कहानी को समझने की कोशिश करता है।
फिल्म के अंत में जब कलाकारों और तकनीकी टीम के नाम पर्दे पर आते हैं तब युद्ध, बमबारी और हिंसा की समकालीन घटनाओं की खबरों के दृश्य दिखाए जाते हैं। दुनिया भर से विभिन्न समुदायों और जातियों के विस्थापित लोगों की झलकियां भी सामने आती हैं। साथ ही, इन सबके बीच मुस्कुराते हुए बच्चों के दृश्य आशा का संदेश भी देते हैं।