ग्लोबल यील्ड और जियोपॉलिटिकल जोखिम से रुपये पर दबाव: अखिल मित्तल

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 09-10-2026
Rupee to remain under pressure as high global yields, geopolitical risks drive outflows: Akhil Mittal
Rupee to remain under pressure as high global yields, geopolitical risks drive outflows: Akhil Mittal

 

नई दिल्ली

टाटा एसेट मैनेजमेंट में फिक्स्ड इनकम के सीनियर फंड मैनेजर अखिल मित्तल ने ANI को बताया कि जब तक ग्लोबल इंटरेस्ट रेट कम नहीं होते और जियोपॉलिटिकल तनाव कम नहीं होते, तब तक रुपया दबाव में रहने की संभावना है और विदेशी निवेशकों का पैसा भारतीय बाजारों में वापस नहीं आ सकता है। उन्होंने इस ट्रेंड का कारण ग्लोबल कैपिटल फ्लो का अमेरिका की ओर शिफ्ट होना बताया।
 
मित्तल ने कहा कि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ऊंची ब्याज दरों के कारण निवेशक भारत जैसे जोखिम भरे बाजारों से अपना पैसा निकाल रहे हैं, जिससे ग्लोबल फाइनेंशियल स्थितियों में बदलाव के बिना विदेशी निवेश की निकासी (outflows) में लगातार बदलाव मुश्किल हो रहा है। मित्तल ने कहा, "पश्चिमी देशों में ब्याज दरों और यील्ड (yields) का महत्व बना रहना चाहिए। जब ​​तक ग्लोबल स्तर पर, खासकर विकसित देशों में, ये दरें ऊंची बनी रहेंगी, तब तक यह मानना ​​मुश्किल है कि भारत जैसी जोखिम वाली संपत्तियों में निवेश का प्रवाह (flows) जल्द ही वापस आएगा।"
 
उन्होंने विदेशी पूंजी की वापसी के लिए ईरान-अमेरिका युद्ध से जुड़े जियोपॉलिटिकल तनाव के समाधान और पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं में ब्याज दरों और बॉन्ड यील्ड में अधिक स्थिरता को मुख्य शर्तें बताया। मित्तल ने कहा कि रुपये की चाल मुख्य रूप से कैपिटल फ्लो से तय हो रही है, क्योंकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं में ऊंची ब्याज दरों के कारण विदेशी निवेशक भारत से पैसा निकालकर दूसरे आकर्षक बाजारों में लगा रहे हैं।
 
उन्होंने कहा कि ग्लोबल ब्याज दर के नजरिए में बदलाव से करेंसी पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है, "लेकिन तब तक, मुझे लगता है कि रुपया दबाव में रहेगा।"
उन्होंने आगे कहा कि फॉरेन करेंसी नॉन-रेसिडेंट (FCNR) डिपॉजिट के जरिए आने वाला पैसा भारत की तत्काल डॉलर की जरूरतों को पूरा कर सकता है, लेकिन जब तक ग्लोबल यील्ड ऊंची बनी रहेगी और जियोपॉलिटिकल तनाव और कच्चे तेल की चिंताएं बनी रहेंगी, तब तक यह लगातार हो रही निकासी (outflows) की भरपाई नहीं कर पाएगा।
 
उन्हें उम्मीद है कि रुपये की मूल दिशा गिरावट (depreciation) की ओर बनी रहेगी, हालांकि 1-2 प्रतिशत की अल्पकालिक रिकवरी और गिरावट हो सकती है। हालांकि, उन्होंने कहा कि लगभग दो दशकों में पहली बार करेंसी 'रियल इफेक्टिव एक्सचेंज रेट' (REER) के आधार पर उचित मूल्यांकन (fair valuation) के करीब है, जिससे कुछ बुनियादी समर्थन मिल रहा है। इक्विटी की बात करें तो मित्तल ने कहा कि विदेशी निवेशकों की बिकवाली के बावजूद भारतीय बाजार मध्यम से लंबी अवधि में आकर्षक बने हुए हैं। उन्होंने कहा कि नेट फॉरेन पोर्टफोलियो इन्वेस्टर (FPI) इक्विटी फ्लो नेगेटिव हो गया है - एक ऐसा ट्रेंड जो 2015 के बाद से नहीं देखा गया - लेकिन उन्होंने कहा कि भारत का ग्रोथ आउटलुक बना हुआ है।
 
उन्होंने कहा, "पॉलिसी में स्थिरता, कंट्रोल में रहने वाली महंगाई और फिस्कल स्थिति - ये सभी चीजें सही हैं।" उन्होंने कच्चे तेल की कीमतें और रुपये की चाल को मुख्य मैक्रो-इकोनॉमिक चुनौतियां बताया। उन्होंने कहा कि लॉन्ग-टर्म इन्वेस्टर्स भारतीय मार्केट में अपनी होल्डिंग बनाए रख सकते हैं और निवेश बढ़ा सकते हैं, लेकिन उन्होंने चेतावनी दी कि शॉर्ट-टर्म में उतार-चढ़ाव बना रहेगा; लगातार एकतरफा रैली के बजाय तेज उतार-चढ़ाव की संभावना है।
 
आईटी स्टॉक्स पर मित्तल ने कहा कि यह सेक्टर तुलनात्मक रूप से सस्ता लग रहा है और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और AI निवेश से जुड़ी अनिश्चितता के खिलाफ एक बचाव (हेज) का काम कर सकता है, जिससे जैसे-जैसे ये चिंताएं बढ़ेंगी, खरीदार आकर्षित हो सकते हैं। उन्होंने कहा, "जब तक AI फ्लो और AI निवेश को लेकर अनिश्चितता बढ़ती रहेगी, भारतीय आईटी सेक्टर एक स्वाभाविक बचाव (नेचुरल हेज) प्रदान करेगा और इसलिए, हमें खरीदार देखने को मिलेंगे।"