शहीद रफीक अहमद की बेटी की शादी में पहुंचा पिता का ‘बीएसएफ परिवार’

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 09-10-2026
Father’s ‘BSF family’ attends daughter’s wedding; memories of martyr Rafiq Ahmed bring tears to eyes.
Father’s ‘BSF family’ attends daughter’s wedding; memories of martyr Rafiq Ahmed bring tears to eyes.

 

ओनिका माहेश्वरी/ नई दिल्ली  
 
कुछ रिश्ते खून के नहीं होते, लेकिन उनकी गहराई किसी पारिवारिक रिश्ते से कम भी नहीं होती। कुछ बंधन समय, दूरी और यहां तक कि मौत की सीमा को भी पार कर जाते हैं। जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के सीमावर्ती कर्नाह के गाबरा इलाके में ऐसा ही एक भावुक दृश्य देखने को मिला, जब शहीद रफीक अहमद की बेटी की शादी के मौके पर उनका बीएसएफ परिवार उनके घर पहुंचा।

साल 2007 में शिलांग में देश की सेवा करते हुए शहीद हुए रफीक अहमद आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन करीब दो दशक बाद उनकी बेटी की शादी के अवसर पर 31 बीएसएफ के अधिकारियों और जवानों ने उनके परिवार के दरवाजे पर पहुंचकर यह साबित कर दिया कि एक सैनिक के जाने के साथ उसके प्रति सम्मान और उसके परिवार के प्रति जिम्मेदारी खत्म नहीं होती।
 
 
बेटी की शादी में पिता की कमी, लेकिन बीएसएफ परिवार का साथ

बेटी की शादी हर पिता के लिए जिंदगी के सबसे यादगार पलों में से एक होती है। बेटी के हाथ पीले होते देखना, उसके सिर पर हाथ रखना, उसे नई जिंदगी की दहलीज तक पहुंचाना इन सपनों में एक पिता की भावनाएं जुड़ी होती हैं। लेकिन रफीक अहमद की बेटी के लिए यह खास दिन एक ऐसी कमी के साथ आया, जिसे कोई पूरी तरह भर नहीं सकता था। शादी के इस महत्वपूर्ण अवसर पर उसके पिता उसके साथ नहीं थे। करीब 19 साल पहले देश के लिए सर्वोच्च बलिदान देने वाले रफीक अहमद की याद इस खुशी के मौके पर स्वाभाविक रूप से परिवार के साथ थी।
 
इसी भावुक क्षण में बीएसएफ के वरिष्ठ अधिकारी और जवान गाबरा पहुंचे। वे केवल मेहमान बनकर नहीं आए थे, बल्कि उस परिवार के लिए उस रिश्ते को फिर से महसूस कराने आए थे, जो वर्दी के साथ बना था और शहादत के बाद भी कायम रहा। बीएसएफ अधिकारियों और जवानों ने परिवार से मुलाकात की, बेटी को शादी का उपहार दिया और विवाह समारोह से जुड़े विभिन्न इंतजामों में सहयोग किया। उनके इस स्नेह और सहयोग ने शादी की खुशियों के बीच शहीद पिता की अनुपस्थिति से पैदा हुई खामोशी को कुछ हद तक अपनत्व से भर दिया।
 
 
 
 
‘आप अकेले नहीं हैं’: बिना कहे कह गया यह रिश्ता

बीएसएफ की यह पहल महज उपहार देने या शादी में शामिल होने तक सीमित नहीं थी। यह एक ऐसा संदेश था, जिसे शब्दों की जरूरत नहीं थी। संदेश था “आपके पिता हमें आज भी याद हैं और उनका परिवार हमारे लिए आज भी अपना है।” रफीक अहमद ने देश की सेवा करते हुए अपने प्राण न्योछावर किए थे। उनके बलिदान के वर्षों बाद भी उनके साथी जवानों ने उनके परिवार को अपनेपन का एहसास कराया। यही वह मानवीय रिश्ता है, जो एक सैनिक की वर्दी से निकलकर परिवार और समाज तक पहुंचता है। शादी के मौके पर बीएसएफ की मौजूदगी ने परिवार को यह भरोसा दिया कि रफीक अहमद की याद केवल किसी सरकारी रिकॉर्ड, स्मारक या श्रद्धांजलि तक सीमित नहीं है। वे आज भी अपने साथियों की स्मृतियों में जीवित हैं।
 
सीमावर्ती गांव में दिखी सुरक्षा बलों और लोगों की दिल से जुड़ी तस्वीर

गाबरा जैसे सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बलों और स्थानीय लोगों के रिश्ते की अपनी एक अलग संवेदनशीलता होती है। यहां जवान केवल सीमा की सुरक्षा नहीं करते, बल्कि मुश्किल वक्त में स्थानीय लोगों के साथ खड़े भी दिखाई देते हैं। स्थानीय लोगों ने बीएसएफ की इस पहल की सराहना करते हुए कहा कि किसी शहीद के परिवार के सुख-दुख में शामिल होना सुरक्षा बलों और आम लोगों के बीच विश्वास और भाईचारे को मजबूत करता है।
 
लोगों का कहना था कि मुश्किल परिस्थितियों, आपात स्थितियों, आगजनी या अन्य जरूरतों के समय भी सेना, बीएसएफ और पुलिस ने स्थानीय आबादी का साथ दिया है। वहीं, किसी परिवार के जीवन के महत्वपूर्ण अवसर पर उनके घर पहुंचना इस रिश्ते का एक और मानवीय पहलू सामने लाता है। यह तस्वीर बताती है कि सीमा पर तैनात जवान और सीमावर्ती गांवों में रहने वाले लोग केवल ड्यूटी और सुरक्षा के रिश्ते से नहीं जुड़े होते। उनके बीच भरोसे, सहयोग और इंसानियत का रिश्ता भी बनता है।
 
 
 
शहादत के बाद भी परिवार को नहीं भूलता ‘वर्दी वाला परिवार’

एक जवान जब देश की सेवा में भर्ती होता है तो वह केवल एक नौकरी नहीं चुनता। वह एक ऐसा परिवार भी पाता है, जिसके सदस्य अलग-अलग जगहों पर तैनात होते हुए भी एक-दूसरे के सुख-दुख के भागीदार बनते हैं। रफीक अहमद के लिए भी बीएसएफ ऐसा ही परिवार था। उनकी शहादत के लगभग दो दशक बाद उनकी बेटी की शादी में बीएसएफ के जवानों की मौजूदगी ने इस रिश्ते की मजबूती को सामने रखा। वक्त बीत गया, पीढ़ियां आगे बढ़ीं, लेकिन एक साथी की शहादत की स्मृति धुंधली नहीं हुई। यह पहल उन तमाम शहीद परिवारों के लिए भी एक उम्मीद का संदेश है, जिन्होंने अपने किसी प्रियजन को देश के लिए खोया है कि उनका बलिदान केवल उस दिन याद नहीं किया जाता, जब उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। उनके परिवार की खुशियों और जरूरतों में भी देश और उनके साथी उनके साथ खड़े रह सकते हैं।
 
एक बेटी की नई शुरुआत में पिता की याद के साथ मिला अपनापन

शादी के इस अवसर पर रफीक अहमद की बेटी ने जिंदगी के एक नए अध्याय की शुरुआत की। पिता की कमी शायद हमेशा उसके जीवन का एक भावुक हिस्सा रहेगी, लेकिन इस विशेष दिन पर बीएसएफ परिवार की मौजूदगी ने उसे यह एहसास जरूर कराया कि उसके पिता का परिवार कितना बड़ा था। किसी बेटी के विवाह में पिता की जगह कोई नहीं ले सकता। न कोई उस खालीपन को पूरी तरह भर सकता है। लेकिन जब पिता के साथी उसी अपनत्व से उसके पास खड़े हों, तो वह साथ अपने आप में बहुत मायने रखता है। बीएसएफ के जवानों का यह कदम शायद इसी भावना की सबसे खूबसूरत अभिव्यक्ति था।
 
कर्नाह ने देखा इंसानियत और भाईचारे का एक खूबसूरत उदाहरण

रफीक अहमद की कहानी सिर्फ एक सैनिक की शहादत की कहानी नहीं है। यह उस रिश्ते की कहानी भी है, जो वर्दी, सीमाओं और समय से आगे निकल जाता है। एक तरफ एक बेटी अपने पिता के बिना विवाह के मंडप तक पहुंची, तो दूसरी तरफ उसके पिता के साथी उसके साथ खड़े नजर आए। इस दृश्य में शहादत का सम्मान भी था, परिवार के प्रति जिम्मेदारी भी और इंसानियत की गर्माहट भी।
 
गाबरा के लोगों ने 31 बीएसएफ के इस प्रयास को विश्वास, सम्मान और भाईचारे की सकारात्मक मिसाल बताया। उनके मुताबिक, ऐसे कदम स्थानीय लोगों के मन में यह भरोसा और मजबूत करते हैं कि सुरक्षा बल केवल सुरक्षा देने वाली संस्था नहीं, बल्कि जरूरत के समय समाज के साथ खड़ा होने वाला मानवीय चेहरा भी हैं। रफीक अहमद आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी बहादुरी और बलिदान उनके परिवार, उनके साथियों और उनके गांव की यादों में जिंदा है। उनकी बेटी की शादी का यह अवसर एक बार फिर यह संदेश दे गया कि शहीद की जिंदगी भले समाप्त हो जाए, लेकिन उसकी कहानी, उसका सम्मान और उसके परिवार से जुड़ा रिश्ता कभी खत्म नहीं होता।
 
कभी-कभी एक छोटा-सा उपहार, किसी घर तक पहुंचने वाला कदम और कुछ आत्मीय शब्द वर्षों पुराने रिश्ते को फिर से जीवंत कर देते हैं। गाबरा में भी कुछ ऐसा ही हुआ जहां एक बेटी की शादी में उसके दिवंगत पिता की गैरमौजूदगी के बीच उनका ‘बीएसएफ परिवार’ मौजूद था। और शायद यही सच्ची श्रद्धांजलि है। शहीद को याद करना ही नहीं, बल्कि उसके अपनों को भी अपना मानकर उनके सुख-दुख में साथ खड़ा होना।