एसबीआई सिक्योरिटीज: कच्चा तेल $20-25 सस्ता हुआ तो बाजार की मुश्किलें दूर

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  onikamaheshwari | Date 29-10-2026
Indian market challenges could go away at click of moment if crude falls by USD 20–25: SBI Securities
Indian market challenges could go away at click of moment if crude falls by USD 20–25: SBI Securities

 

नई दिल्ली 

SBI सिक्योरिटीज में फंडामेंटल रिसर्च के प्रमुख सनी अग्रवाल ने कहा कि अगर कच्चे तेल की कीमतों में 20-25 डॉलर प्रति बैरल की कमी आती है, तो भारतीय शेयर बाजारों के सामने मौजूद चुनौतियां पल भर में दूर हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि इक्विटी (शेयर बाजार) पर हालिया दबाव का मुख्य कारण घरेलू आर्थिक कमजोरी नहीं, बल्कि बाहरी कारक हैं। ANI के साथ एक विशेष बातचीत में, अग्रवाल ने कहा कि भारत के घरेलू आर्थिक संकेतक मजबूत बने हुए हैं। क्रेडिट ग्रोथ, वाहनों की बिक्री और उपभोक्ता खर्च अर्थव्यवस्था को सहारा दे रहे हैं। हालांकि, कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और रुपये की गिरावट ने महंगाई का दबाव बढ़ा दिया है, जिसका असर निवेशकों की धारणा पर पड़ा है। अग्रवाल ने कहा, "ये चुनौतियां घरेलू होने के बजाय वैश्विक स्तर की हैं, और ये पल भर में दूर हो सकती हैं।"
 
उन्होंने बताया कि पिछले 6-7 महीनों में कच्चे तेल की कीमतों में 60 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जबकि पिछले एक साल में रुपया लगभग 10 प्रतिशत कमजोर हुआ है। भारत अपनी जरूरत का 85 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है, जिससे अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। अग्रवाल के अनुसार, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट बाजार की स्थिति को भारत के पक्ष में बदल सकती है। अगर कीमतें 100 डॉलर या 90 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आती हैं, तो इससे अल्पावधि से मध्यम अवधि में भारतीय शेयर बाजार को सहारा मिल सकता है। हालांकि, अगर अमेरिका-ईरान संघर्ष बढ़ता है और कच्चे तेल की कीमतें 140-150 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच जाती हैं, तो बाजार में और गिरावट (करेक्शन) देखने को मिल सकती है।
 
उन्होंने कम बारिश के असर का भी जिक्र किया और बताया कि देश में दीर्घकालिक औसत की तुलना में 15 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसका असर रबी फसलों की बुआई और पैदावार पर पड़ सकता है, खासकर उन इलाकों में जहां जलाशयों में पानी का स्तर कम है। इन बाहरी दबावों के बावजूद, अग्रवाल ने कहा कि घरेलू अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में बनी हुई है। सिस्टमैटिक क्रेडिट ग्रोथ 17-18 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है, जबकि दोपहिया और यात्री वाहनों की बिक्री भी काफी अच्छी रही है।
 
उन्होंने यह भी कहा कि ज्वेलरी और हॉस्पिटैलिटी जैसे 'कंज्यूमर डिस्क्रिशनरी' (गैर-जरूरी लेकिन इच्छा पर आधारित) क्षेत्रों में खर्च में सुस्ती के कोई संकेत नहीं दिखे हैं। मार्केट वैल्यूएशन पर अग्रवाल ने कहा कि निफ्टी 50 अपने एक साल के अनुमानित मुनाफे (फॉरवर्ड अर्निंग्स) के लगभग 16-17 गुना पर ट्रेड कर रहा है, जो इसके 10 साल के औसत (20 गुना) से कम है। उन्होंने कहा कि मौजूदा स्तर पर वैल्यूएशन न तो बहुत महंगे हैं और न ही सस्ते। उन्होंने निवेशकों को सलाह दी कि वे कंपनियों के वैल्यूएशन के साथ-साथ उनकी कमाई में होने वाली बढ़ोतरी (अर्निंग्स ग्रोथ) का भी आकलन करें।
 
उन्होंने केवल बेंचमार्क इंडेक्स पर ध्यान देने के बजाय, 'बॉटम-अप' (हर कंपनी को अलग से परखने वाली) अप्रोच अपनाकर स्टॉक चुनने की सलाह दी। अग्रवाल के अनुसार, पिछले दो वर्षों में कुछ स्मॉल-कैप और मिड-कैप कंपनियों ने अपने स्टॉक की कीमतों और कमाई, दोनों में 20-25 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है।
 
अग्रवाल ने आगे बताया कि NSE 500 में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) की हिस्सेदारी घटकर 16.2 प्रतिशत रह गई है, जो पिछले 17 वर्षों का सबसे निचला स्तर है। वहीं, घरेलू म्यूचुअल फंडों की हिस्सेदारी 12.2 प्रतिशत के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गई है।
उन्होंने कहा कि रुपये की स्थिर चाल, और कैपिटल गेन्स टैक्स तथा सिक्योरिटीज ट्रांजैक्शन टैक्स (STT) में संभावित कटौती से विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय इक्विटी बाजार और अधिक आकर्षक बन सकता है।