गुलाम कादिर, नागपुर (महाराष्ट्र)
मुक्केबाजी की दुनिया में जब दस्ताने आपस में टकराते हैं, तो आवाज़ सिर्फ रिंग तक नहीं रहती, बल्कि वह इतिहास के पन्नों पर अपनी धमक छोड़ती है। नागपुर की 24वर्षीय बेटी अल्फिया पठान इसी गूंज का नाम है। आज जब अल्फिया अपनी शुरुआती बाधाओं को याद करती हैं, तो उनके चेहरे पर एक मासूम मुस्कान तैर जाती है।
उन्हें याद है वो दिन, जब उन्होंने अपने अब्बा अकरम पठान से बॉक्सिंग सीखने की ज़िद की थी। एक रूढ़िवादी समाज और बेटियों की सुरक्षा को लेकर फिक्रमंद पिता ने पहले तो साफ इनकार कर दिया, लेकिन बेटी की आँखों में जो जुनून था, उसने बाप के कलेजे को पिघला दिया। अब्बा मान तो गए, लेकिन एक शर्त पर— "मैदान में जो भी होगा, मेरी आँखों के सामने होगा।"
वह दिन है और आज का दिन, अल्फिया ने न केवल नागपुर और महाराष्ट्र का मान बढ़ाया, बल्कि विश्व पटल पर तिरंगा लहराकर यह साबित कर दिया कि अगर हौसले फौलादी हों, तो हर मिथक को तोड़ा जा सकता है।
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अल्फिया की कहानी किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि इस फौलादी मुक्केबाज के भीतर की आग एक सिनेमाई पर्दे से ही जली थी। अल्फिया का भाई शाकिब पठान पहले से मुक्केबाजी कर रहा था। वह अपने भाई को रिंग में लड़ते देख बेचैन हो उठती थीं।
उसी दौर में प्रियंका चोपड़ा की फिल्म 'मैरी कॉम' रिलीज़ हुई। उस फिल्म ने अल्फिया के भीतर सोई हुई बॉक्सर को जगा दिया। मनकापुर स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में लड़कियों को बॉक्सिंग करते देख उनकी दिलचस्पी जुनून में बदल गई। हालांकि, रास्ता कांटों भरा था। परिवार और समाज की परंपराएं आड़े आ रही थीं, लेकिन अल्फिया ने 'भीख' माँगने से लेकर ज़िद करने तक हर जतन किया, ताकि उन्हें रिंग में उतरने की इजाज़त मिल जाए।

81किग्रा वर्ग में खेलने वाली अल्फिया पठान को उनके मुक्केबाज़ी के अंदाज़ के कारण 'नागपुर की ड्रीम गर्ल' और 'भारतीय मुक्केबाज़ी का नया फौलाद' कहा जाता है। उन्होंने पोलैंड के कैलिस में आयोजित एआईबीए (AIBA) युवा विश्व मुक्केबाजी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीतकर दुनिया को अपनी ताकत का अहसास कराया।
फाइनल मुकाबले में उनके सामने यूरोपीय चैंपियन मोल्दोवा की डारिया कोज़ोरेज़ जैसी मजबूत दावेदार थी। लेकिन अल्फिया उस दिन किसी और ही मिट्टी की बनी थीं। पूरे 5-0के अंतर से उन्होंने डारिया को धूल चटा दी।
मैच के दौरान जो भी स्क्रीन पर नज़रें टिकाए बैठा था, उसने देखा कि अल्फिया ने एक पल के लिए भी मैच से नियंत्रण नहीं खोया। उनकी फुर्ती, सटीक मुक्के और प्रतिद्वंद्वी की कमजोरी को भांपने की कला ने उन्हें विश्व विजेता बना दिया।

अल्फिया की शख्सियत के दो पहलू हैं। जब वह रिंग से बाहर होती हैं, तो उनका चेहरा एक बच्चे की तरह जिज्ञासु और मासूम होता है, जिसे बिरयानी खाना पसंद है और खाली वक्त में ड्रॉइंग करना भाता है।
लेकिन जैसे ही वह रिंग के भीतर कदम रखती हैं, उनका चेहरा खौफनाक दृढ़ संकल्प में बदल जाता है। वह कहती हैं, "रिंग में मैं भावहीन रहती हूँ क्योंकि बॉक्सिंग ने मुझे अपने रवैये को नियंत्रित करना सिखाया है।" उनके पहले दिन के कोच गणेश पुरोहित बताते हैं कि अल्फिया एक मुकम्मल एथलीट हैं। उनमें ताकत है, गति है और सबसे बढ़कर, उनमें हार को स्वीकार न करने वाला जज्बा है।

अल्फिया के सफर में उनके पिता का साथ किसी ढाल की तरह रहा है। जो पिता पहले मुक्केबाजी के खिलाफ थे, आज वे अपनी बेटी के हर दौरे पर उसके साथ साये की तरह चलते हैं। जब महाराष्ट्र पुलिस ने अल्फिया को सम्मानित किया, तो पिता की आँखों में जो चमक और मुस्कान थी, वह अल्फिया के लिए किसी भी स्वर्ण पदक से बड़ी थी।
अल्फिया के करियर में सर्बिया का जूनियर महिला राष्ट्रीय कप 2018मील का पत्थर साबित हुआ, जहाँ उन्होंने रजत पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी आमद दर्ज कराई। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2019में एशियाई जूनियर बॉक्सिंग चैंपियनशिप में कजाकिस्तान की खिलाड़ी को हराकर उन्होंने स्वर्ण पदक जीता और देश की सबसे सफल मुक्केबाजों की सूची में अपना नाम लिखवा लिया।
एक तरफ जहाँ वह निकहत ज़रीन और मैरी कॉम जैसी दिग्गजों का सम्मान करती हैं, वहीं उनके भीतर एक मीठी शिकायत भी है। वह कहती हैं, "मैडम मैरी कॉम और निकहत की बॉक्सिंग पर तो सब बात करते हैं, लेकिन मेरे जैसे और भी मुक्केबाज हैं जो खामोशी से देश का नाम रोशन कर रहे हैं।" उनकी निकहत ज़रीन के साथ गहरी दोस्ती है और सोशल मीडिया पर उनकी तस्वीरें खेल भावना की मिसाल पेश करती हैं।
अल्फिया पठान का जन्म 18 फरवरी 2003 को हुआ और मात्र 14 साल की उम्र से उन्होंने दस्ताने पहन लिए थे। हर हफ्ते 28 घंटे का कड़ा प्रशिक्षण और गरीबी से उपजी चुनौतियां उनके इरादों को और मजबूत करती गईं। आज वह केवल एक बॉक्सर नहीं हैं, बल्कि उन हज़ारों लड़कियों के लिए प्रेरणा हैं जो रूढ़ियों को तोड़कर अपने सपनों के आसमान में उड़ना चाहती हैं।
नागपुर की यह बेटी रिंग में जब पंच मारती है, तो वह केवल प्रतिद्वंद्वी को नहीं लगता, बल्कि उन सदियों पुराने मिथकों पर भी चोट करता है जो कहते हैं कि लड़कियां मुक्केबाज नहीं बन सकतीं। भविष्य में ओलंपिक की बुलंदियों को छूने के संकल्प के साथ अल्फिया पठान अब भारतीय खेल जगत का वो चमकता हुआ सितारा हैं, जिसकी चमक आने वाले दशकों तक फीकी नहीं पड़ेगी।