शंपि चक्रवर्ती पुरकायस्थ
शीतकाल में मकालु अभियान का मतलब हर कदम पर मृत्यु का खतरा है। प्रचंड तूफ़ान, असहनीय ठंड, ऑक्सीजन की गंभीर कमी,इन सबके साथ यह पर्वत शीतकाल में लगभग अजेय माना जाता है। इन भयानक चुनौतियों को चुनौती देते हुए चंदननगर की ‘पर्वतकन्या’ पियाली बसाक मकालु बेस कैंप तक पहुँच गई हैं। उम्र 36 वर्ष। पेशे से सरकारी स्कूल की प्राथमिक शिक्षिका। लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान,वह एक अदम्य सपनों वाली पर्वतारोही हैं।

मकालु, विश्व का पाँचवाँ सबसे ऊँचा शिखर, 8,863 मीटर ऊँचा है। यह नेपाल और चीन की सीमा पर महालांगुर हिमालय श्रृंखला में स्थित है। शीतकालीन मकालु पर दुनिया में केवल कुछ ही पर्वतारोही कदम रख पाए हैं। यदि पियाली सफल होती हैं, तो वह दुनिया की पहली महिला होंगी जो शीतकाल में मकालु शिखर पर पहुँचेंगी-एक अद्वितीय इतिहास रचेगी।
15 दिसंबर को चंदननगर की यह साहसी बंगाली मकालु अभियान के लिए रवाना हुईं। अब वह बेस कैंप में हैं। फोन पर उनके कांपते हुए स्वर से स्थिति की भयावहता महसूस होती है। “यहाँ तापमान माइनस 50 डिग्री सेल्सियस है। 140 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तूफ़ान बह रहा है,” पियाली बताती हैं। तीव्र ठंड में नाक, मुँह और गला जल रहे हैं। खांसी और गले की तकलीफ उनके साथी हैं, फिर भी वह दांतों में दांत काट कर लड़ाई जारी रख रही हैं। कारण केवल एक—शीतकालीन मकालु विजय।
इस समय पियाली और उनके साथी लगभग 17,000 फीट ऊँचाई पर हैं। जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ेगी, स्थिति और भयावह होगी। ऑक्सीजन की कमी बढ़ेगी, तापमान और गिरेगा। बेस कैंप से ही मार्ग खोजने का काम शुरू हो गया है। स्विट्ज़रलैंड से नियमित मौसम रिपोर्ट ली जा रही है। पियाली के अनुसार, “लगभग 10 दिन यदि मौसम अनुकूल रहा, तभी हम शिखर के लिए प्रयास करेंगे।”
शीतकालीन मकालु बेस कैंप तक पहुँचना ही कठिन परीक्षा थी। नौ घंटे तक पत्थरों पर छलांग लगाते हुए चलना पड़ा। मजबूत बर्फ में लोहे के क्रैम्पन भी फंस नहीं रहे थे। थोड़ी सी लापरवाही में खाई में गिरने का खतरा था। गर्मियों में भी जहां पर्यटक नहीं जाना चाहते, वहीं शीतकालीन अभियान—सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
इस अभियान में पियाली के साथ कुल सात लोग हैं,दो कुक और शेरपा समेत। शानु शेरपा के नेतृत्व में अभियान चल रहा है। आमतौर पर मकालु को चार कैम्प में बांट कर आरोहण किया जाता है। बेस कैंप में एक महीने का राशन साथ लाया गया है। लेकिन प्रकृति से लड़ाई के साथ-साथ पियाली की लड़ाई आर्थिक रूप से भी है। इस शिखर विजय की कुल लागत लगभग 25 लाख रुपये है, जिसमें एजेंसी को 9 लाख देने हैं। पूरी राशि ऋण लेकर जुटाई गई है। घर का दस्तावेज़ गिरवी रखकर यह सपना पूरा कर रही हैं।
दरअसल, ऋण का बोझ पियाली के लिए नया नहीं है। पिछले छह अभियानों की लागत भी उन्होंने बैंक ऋण लेकर पूरी की थी। कुछ साल पहले माता-पिता को खो दिया। एकमात्र बहन तमाली हैदराबाद में रहती हैं। स्कूल का काम और आगामी अभियानों की तैयारी उनका जीवन हैं। तैयारी का बड़ा हिस्सा आर्थिक चिंता में बीतता है।
पियाली छह साल की उम्र में माता-पिता के हाथ पकड़ कर ट्रेकिंग शुरू कर चुकी थीं। आज उन्होंने एवरेस्ट, अन्नपूर्णा, धौलागिरी सहित हिमालय के 8,000 मीटर से ऊँचे छह शिखरों पर कदम रखा है—कई बार बिना ऑक्सीजन के। उनके सपनों की सूची में कंचनजंघा भी शामिल है। इसी पर्वत मार्ग पर बंगाल की एक और साहसी महिला, छंदा गाएन, अपने जीवन की अंतिम यात्रा कर चुकी हैं। छंदा के प्रति गहरी श्रद्धा पियाली की बातों में बार-बार झलकती है।
भारतीय सेना और नेपाली सेना की संयुक्त अभियानों में उनके साहस और पर्वतारोहण कौशल को मान्यता मिली है। कर्नल और विभिन्न माउंटेनियरिंग संस्थाओं के प्रमुखों ने उन्हें सम्मानित किया है। फिर भी स्पॉन्सरशिप पाना आसान नहीं था। कुछ संस्थाएँ और बैंक उनके साथ खड़े हुए।
अविवाहित पियाली स्पष्ट कहती हैं, “मेरा पहला प्यार पर्वत है। हिमालय में ही मुझे शांति मिलती है। चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ हों, मैं बार-बार वहाँ लौटूँगी।”आज मकालु की बर्फ से ढकी ढलानों पर खड़ी चंदननगर की यह ‘पर्वतकन्या’ अपने शब्दों को वास्तविकता में बदल रही हैं। इतिहास उनकी प्रतीक्षा कर रहा है।