न्यूयॉर्क।
लैटिन अमेरिका की राजनीति एक बार फिर वैश्विक कूटनीति के केंद्र में है। वेनेजुएला में सत्ता, लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप को लेकर बढ़ते तनाव के बीच स्पेन ने बड़ा कूटनीतिक कदम उठाते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका और वेनेजुएला के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश की है। यह पेशकश ऐसे समय आई है, जब कराकस पर अमेरिकी हमले, वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी और संभावित निर्वासन को लेकर दोनों देशों के रिश्ते बेहद तनावपूर्ण दौर से गुजर रहे हैं।
एएफपी समाचार एजेंसी के मुताबिक, मैड्रिड से जारी एक आधिकारिक बयान में स्पेन के विदेश मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा है कि स्पेन तनाव कम करने और सभी पक्षों से संयम बरतने की अपील करता है। यह बयान केवल औपचारिक नहीं, बल्कि स्पेन की उस व्यापक रणनीति का संकेत है, जिसके तहत वह वेनेजुएला संकट में एक सक्रिय कूटनीतिक भूमिका निभाना चाहता है।
क्यों अहम है स्पेन की पहल?
वेनेजुएला संकट कोई नया मुद्दा नहीं है। बीते एक दशक से देश आर्थिक बदहाली, राजनीतिक ध्रुवीकरण और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से जूझ रहा है। लेकिन 2024 के राष्ट्रपति चुनाव के बाद हालात और विस्फोटक हो गए।
28 जुलाई 2024 को हुए राष्ट्रपति चुनाव में वेनेजुएला की राष्ट्रीय चुनाव परिषद (CNE) ने निकोलस मादुरो को विजेता घोषित किया। हालांकि, इस घोषणा के साथ ही विवाद खड़ा हो गया। चुनाव आयोग ने मतदान केंद्रों के अनुसार विस्तृत नतीजे जारी नहीं किए और इसका कारण कथित साइबर हमलों को बताया। विपक्ष ने इस फैसले को सिरे से खारिज कर दिया और चुनाव में धांधली का आरोप लगाया।
यहीं से अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया तेज हो गई। स्पेन उन देशों में शामिल है, जिसने इन चुनावी नतीजों को मान्यता देने से इनकार कर दिया। यही नहीं, चुनाव के बाद विपक्षी उम्मीदवार गोंज़ालेज़ उरुतिया को देश छोड़ना पड़ा और उन्होंने मैड्रिड में शरण ली।
अमेरिका–वेनेजुएला टकराव और बढ़ता संकट
चुनाव विवाद के बाद अमेरिका और वेनेजुएला के रिश्ते और बिगड़ गए। कराकस पर अमेरिकी सैन्य कार्रवाई, मादुरो की गिरफ्तारी और निर्वासन की अटकलों ने हालात को सीधे टकराव की ओर धकेल दिया। इस टकराव का असर सिर्फ वेनेजुएला तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरे लैटिन अमेरिका और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर भी पड़ सकता है।
ऐसे में स्पेन की मध्यस्थता की पेशकश को एक कूटनीतिक सेफ्टी वाल्व के रूप में देखा जा रहा है—एक ऐसा प्रयास, जो टकराव को खुले संघर्ष में बदलने से रोक सकता है
स्पेन का ऐतिहासिक और मानवीय संदर्भ
स्पेन का वेनेजुएला से रिश्ता सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और मानवीय भी है। स्पेन के विदेश मंत्रालय के बयान में यह बात विशेष रूप से रेखांकित की गई कि स्पेन पहले ही हजारों वेनेजुएलावासियों को शरण दे चुका है, जिन्हें राजनीतिक कारणों से अपना देश छोड़ना पड़ा।
बयान में कहा गया,“स्पेन आगे भी उन वेनेजुएलावासियों को शरण देता रहेगा, जिन्हें मजबूरी में देश छोड़ना पड़ा है। साथ ही, हम वेनेजुएला के लिए एक लोकतांत्रिक, संवाद-आधारित और शांतिपूर्ण समाधान खोजने में मदद करने के लिए तैयार हैं।”
यह रुख स्पेन को उन कुछ यूरोपीय देशों में खड़ा करता है, जो सिर्फ बयानबाज़ी नहीं, बल्कि व्यावहारिक हस्तक्षेप की बात कर रहे हैं।
लोकतंत्र बनाम स्थिरता की बहस
वेनेजुएला संकट में एक बड़ा सवाल हमेशा से रहा है—लोकतंत्र बनाम स्थिरता। मादुरो सरकार अपने समर्थकों के लिए संप्रभुता और स्थिरता का प्रतीक है, जबकि विपक्ष और पश्चिमी देश इसे लोकतांत्रिक मूल्यों से समझौता मानते हैं।
स्पेन की पहल इस बहस में एक तीसरा रास्ता सुझाती है—जहां न तो सैन्य दबाव को समाधान माना जाए और न ही विवादित चुनावी नतीजों को चुपचाप स्वीकार किया जाए। संवाद, मध्यस्थता और अंतरराष्ट्रीय निगरानी के ज़रिये समाधान तलाशने की यह कोशिश अगर सफल होती है, तो यह भविष्य के कई अंतरराष्ट्रीय संकटों के लिए मिसाल बन सकती है।
क्या मानेगा अमेरिका? क्या मानेगा कराकस?
सबसे बड़ा सवाल यही है। अमेरिका अब तक मादुरो सरकार पर सख्त रुख अपनाता रहा है, जबकि कराकस किसी भी बाहरी दबाव को अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है। ऐसे में स्पेन जैसे देश की भूमिका पुल बनाने वाली हो सकती है—जो दोनों पक्षों से बात करने की क्षमता रखता है।
हालांकि, यह राह आसान नहीं है। यदि मध्यस्थता विफल होती है, तो संकट और गहराने की आशंका है। लेकिन यदि बातचीत की मेज़ सजती है, तो यह वेनेजुएला के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए राहत की खबर हो सकती है।
कूटनीति की अंतिम उम्मीद?
वेनेजुएला आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां हर कदम का असर सीमाओं से बाहर तक जाएगा। स्पेन की मध्यस्थता की पेशकश एक संकेत है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब टकराव नहीं, समाधान की भाषा बोलना चाहता है।
यह पहल सफल होगी या नहीं, यह आने वाले हफ्तों में तय होगा। लेकिन इतना तय है कि यदि संवाद का यह अवसर गंवाया गया, तो वेनेजुएला संकट एक और लंबी और दर्दनाक कहानी में बदल सकता है—जिसका खामियाजा सिर्फ एक देश नहीं, पूरी दुनिया भुगतेगी।






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