किशोर सिंह सोलंकी/ अजमेर
अजमेर को आमतौर पर ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह और सूफी परंपरा के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी ख्वाजा नगरी में एक ऐसी धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा भी करीब एक सदी से चली आ रही है, जो राजस्थान की विविधता की खूबसूरत तस्वीर पेश करती है। शहर में हर साल बंगाली समाज की ओर से दुर्गा पूजा का आयोजन होता है। इस दौरान बंगाली धर्मशाला में मां दुर्गा की पूजा के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। खास बात यह है कि इस आयोजन में केवल बंगाली समाज ही नहीं, बल्कि अलग अलग समुदायों और धर्मों के लोग भी उत्साह से शामिल होते हैं।
इस वर्ष अजमेर में बंगाली समाज 99वां सार्वजनिक दुर्गा पूजा महोत्सव मनाने जा रहा है। आयोजन को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। बंगाली धर्मशाला में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा तैयार की जा रही है। प्रतिमा का निर्माण पारंपरिक तरीके से हो रहा है। इसमें बांस, सूखी घास, मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रतिमा का वजन करीब साढ़े चार क्विंटल यानी लगभग 450 किलोग्राम रहने का अनुमान है।
अजमेर की दुर्गा पूजा की सबसे खास पहचान इसकी पर्यावरण अनुकूल प्रतिमा है। यहां मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने में प्लास्टर ऑफ पेरिस और रासायनिक रंगों से बचने की कोशिश की जाती है। मूर्तिकार प्राकृतिक सामग्री का इस्तेमाल करते हैं। पहले बांस और सूखी घास से प्रतिमा का ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद उस पर चिकनी मिट्टी की परत चढ़ाई जाती है। धीरे धीरे मिट्टी से मां दुर्गा का चेहरा और शरीर का स्वरूप उभरने लगता है। मिट्टी सूखने के बाद प्रतिमा पर प्राकृतिक रंग लगाए जाते हैं। इसके बाद आभूषण, वस्त्र और अन्य सजावटी सामग्री से मां दुर्गा को अंतिम रूप दिया जाता है।
इस प्रतिमा के निर्माण की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। कोलकाता का कुंडू परिवार पिछले तीन पीढ़ियों से अजमेर आकर मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार कर रहा है। परिवार के कारीगरों के लिए यह केवल रोजी रोटी का काम नहीं है।
वे इसे आस्था और परंपरा से जुड़ा कार्य मानते हैं। मूर्तिकार तरुण कुंडू के मुताबिक प्रतिमा तैयार करते समय मिट्टी के साथ उनका रिश्ता लगातार गहरा होता जाता है। उनके लिए मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार करना एक धार्मिक जिम्मेदारी भी है।
तरुण कुंडू बताते हैं कि प्रतिमा बनाने में मिट्टी और प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल किया जाता है। घास और बांस प्रतिमा को मजबूत आधार देते हैं। इसके बाद मिट्टी से उसका स्वरूप तैयार किया जाता है।
प्राकृतिक रंगों में वह चमक भले न हो जो रासायनिक रंगों में दिखाई देती है, लेकिन इससे प्रतिमा का रूप अधिक सहज और जीवंत नजर आता है। मिट्टी को भारतीय धार्मिक परंपरा में भी पवित्र माना गया है। यही कारण है कि पारंपरिक मूर्ति निर्माण की यह विधि आज भी अपनी जगह बनाए हुए है।
प्रतिमा तैयार होते समय बंगाली धर्मशाला का माहौल भी बदल जाता है। कारीगर घंटों तक मां दुर्गा की प्रतिमा को आकार देते हैं। चेहरे की बनावट से लेकर आंखों की रेखा तक हर काम बेहद सावधानी से किया जाता है। मूर्तिकारों का कहना है कि प्रतिमा पर रंग चढ़ने के साथ ही मां दुर्गा का चेहरा जीवंत दिखाई देने लगता है। पूजा शुरू होने से पहले प्रतिमा को पूरी तरह सजाया जाएगा।
अजमेर में दुर्गा पूजा केवल पूजा और धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। यह शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान का भी हिस्सा बन चुकी है। बंगाली समाज के अध्यक्ष देवाशीष के अनुसार, राजस्थान में रहने वाले बंगाली परिवार लंबे समय से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। अजमेर में स्थापित बंगाली धर्मशाला इस आयोजन का प्रमुख केंद्र है। यहां दुर्गा पूजा के दौरान बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। खास बात यह है कि इनमें राजस्थान के स्थानीय परिवारों की संख्या भी काफी रहती है।
यही वजह है कि अजमेर की दुर्गा पूजा में बंगाली और राजस्थानी संस्कृति का सुंदर मेल देखने को मिलता है। बंगाली समाज की परंपराएं यहां स्थानीय समाज के साथ मिलकर एक अलग रंग लेती हैं। मां दुर्गा की आरती के दौरान पूरा परिसर भक्तिमय हो जाता है। पूजा पंडाल में अलग अलग परिवार साथ आते हैं। लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं। एक दूसरे से मिलते हैं। बच्चों और युवाओं के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं।
पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा भी इस दुर्गा पूजा से जुड़ा हुआ है। बंगाली समाज के अध्यक्ष देवाशीष के अनुसार, पहले अजमेर में प्लास्टर ऑफ पेरिस से बनी प्रतिमाओं का विसर्जन आनासागर में किया जाता था। रासायनिक रंगों और प्लास्टर ऑफ पेरिस के कारण पानी और जलीय जीवों पर असर पड़ने की शिकायतें सामने आईं। मछलियों के मरने की घटनाएं भी चिंता का कारण बनीं। इसके बाद प्रशासन की ओर से प्रतिमा विसर्जन के लिए अलग कुंड की व्यवस्था की गई। हालांकि समाज का कहना है कि विसर्जन स्थल पर साफ सफाई की बेहतर व्यवस्था की जरूरत है।
इसी वजह से बंगाली समाज प्राकृतिक सामग्री से बनी प्रतिमा को प्राथमिकता देता है। उनका मानना है कि मां दुर्गा की पूजा प्रकृति के सम्मान के साथ होनी चाहिए। मिट्टी, बांस, घास और प्राकृतिक रंगों से तैयार प्रतिमा इसी सोच को आगे बढ़ाती है। पर्यावरण अनुकूल दुर्गा पूजा की यह पहल अजमेर के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है।
इस बार दुर्गा पूजा महोत्सव 16 अक्टूबर से शुरू होगा। नवरात्रि के दौरान बंगाली धर्मशाला में कई धार्मिक अनुष्ठान होंगे। संधि पूजा, चंडी पाठ और भोजन प्रसादी प्रमुख कार्यक्रमों में शामिल हैं। इसके अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे। बंगाली समाज की पारंपरिक पूजा पद्धति के साथ स्थानीय लोगों की भागीदारी उत्सव को और खास बनाएगी।
मां दुर्गा को विशेष भोग भी लगाया जाएगा। इसमें खिचड़ी और विभिन्न सब्जियों से तैयार व्यंजन शामिल होंगे। नवमी के दिन प्रतीकात्मक बलि की परंपरा भी निभाई जाएगी। इसके तहत केले की भेंट मां दुर्गा को अर्पित की जाएगी। समाज के लोग इसे सात्विक और प्रतीकात्मक बलि मानते हैं। इस धार्मिक परंपरा के माध्यम से भक्त मां दुर्गा के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
दुर्गा पूजा खत्म होने के बाद विसर्जन का समय भी भावुक करने वाला होता है। जिन हाथों ने कई दिनों तक मिट्टी की प्रतिमा को आकार दिया होता है, वही हाथ विदाई के समय नम हो जाते हैं। मूर्तिकारों के लिए यह पल विशेष रूप से भावुक होता है। उनके अनुसार, प्रतिमा बनाते समय उन्हें लगता है कि मां उनके सामने मौजूद हैं। विसर्जन के समय ऐसा लगता है जैसे परिवार का कोई सदस्य विदा हो रहा हो।
अजमेर में बंगाली समाज की यह परंपरा केवल धार्मिक आयोजन नहीं है। यह प्रवास के बाद अपनी जड़ों से जुड़े रहने की कहानी भी है। बंगाल से राजस्थान आए परिवारों ने यहां अपनी संस्कृति को संभालकर रखा। समय के साथ स्थानीय समाज भी इसका हिस्सा बनता गया। आज अजमेर की दुर्गा पूजा बंगाली समाज के साथ साथ शहर के सांस्कृतिक जीवन का भी हिस्सा है।
इस बार 99वें दुर्गा पूजा महोत्सव के बाद अगले वर्ष आयोजन अपने 100वें पड़ाव पर पहुंचेगा। यानी अजमेर में बंगाली समाज का शताब्दी दुर्गा पूजा महोत्सव मनाया जाएगा। समाज के लोगों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण अवसर होगा। इसकी तैयारियां भी बड़े स्तर पर किए जाने की उम्मीद है।
करीब एक सदी की यह यात्रा बताती है कि परंपराएं केवल एक जगह की संपत्ति नहीं होतीं। वे जहां जाती हैं, वहां के समाज से जुड़कर नया रूप लेती हैं। अजमेर में मां दुर्गा की पूजा इसका जीवंत उदाहरण है। ख्वाजा नगरी में सूफी परंपरा के बीच बंगाली समाज की दुर्गा पूजा धार्मिक सद्भाव, सांस्कृतिक मेल और सामाजिक सहभागिता की अलग तस्वीर पेश करती है। मिट्टी से बनी मां दुर्गा की प्रतिमा इस परंपरा का केंद्र है। लेकिन इसके आसपास जुड़ती लोगों की आस्था, संस्कृति और आपसी भागीदारी ही इसे खास बनाती है।