नाना पाटेकर का निधन, अब कश्मीर के बच्चों के अधूरे सपनों का क्या होगा ?

Story by  मलिक असगर हाशमी | Published by  [email protected] | Date 08-10-2026
Nana Patekar has passed away; what will now become of the unfulfilled dreams of the children of Kashmir?Nana Patekar with his son Malhar at the NAAM office in Pune.
Nana Patekar has passed away; what will now become of the unfulfilled dreams of the children of Kashmir?Nana Patekar with his son Malhar at the NAAM office in Pune.

 

मलिक असगर हाशमी/ नई दिल्ली

दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर का गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 को 75 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। गोवा स्थित उनके आवास पर वह गंभीर हालत में मिले थे। उन्हें मणिपाल अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने सुबह करीब 5:20 बजे उन्हें मृत घोषित किया। अस्पताल के अनुसार, उन्हें बचाने के लिए करीब 45 मिनट तक सीपीआर दिया गया, लेकिन उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर की पुष्टि उनके बेटे मल्हार पाटेकर की ओर से भी हुई है।

नाना पाटेकर का जाना सिर्फ बॉलीवुड और मराठी सिनेमा के लिए बड़ा नुकसान नहीं है। उनके व्यक्तित्व का एक ऐसा पक्ष भी था जो पर्दे से बाहर दिखाई देता था। किसानों की मदद से लेकर शिक्षा और ग्रामीण विकास तक, वह सामाजिक कामों से जुड़े रहे। कश्मीर के दूरदराज इलाकों में बच्चों की शिक्षा और स्थानीय परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने की उनकी कोशिश इसी सोच का हिस्सा थी। उनके निधन के साथ यह सवाल भी सामने है कि उनके संगठन का कश्मीर अभियान अब किस दिशा में आगे बढ़ेगा।

कश्मीर के एक गांव में पुनर्निर्मित स्कूल का उद्घाटन करते हुए बच्चे और NAAM के सीईओ गणेश थोरात मौजूद थे।

नाना पाटेकर को हिंदी सिनेमा में ‘प्रहार’, ‘क्रांतिवीर’, ‘परिंदा’, ‘अब तक छप्पन’ और दूसरी फिल्मों में यादगार भूमिकाओं के लिए जाना जाता है। मराठी सिनेमा में भी उनका प्रभाव गहरा रहा। लेकिन उनकी पहचान केवल एक अभिनेता की नहीं थी। 2015 में उन्होंने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ नाम फाउंडेशन की शुरुआत की थी। संगठन का शुरुआती उद्देश्य महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित इलाकों में किसानों और उनके परिवारों की मदद करना था। नाम फाउंडेशन की आधिकारिक वेबसाइट पर भी नाना पाटेकर को संस्थापक और चेयरमैन के रूप में दर्ज किया गया है।

समय के साथ इस पहल का दायरा बढ़ा। कश्मीर भी इसी विस्तार का हिस्सा बना। यहां नाना पाटेकर और नाम फाउंडेशन ने भारतीय सेना के साथ मिलकर नियंत्रण रेखा के नजदीक रहने वाले बच्चों की शिक्षा और ग्रामीण विकास पर काम शुरू किया। इस अभियान की शुरुआत उत्तरी कश्मीर के गग्गर हिल इलाके से हुई। नाम फाउंडेशन और सेना के सहयोग से गग्गर हिल प्राइमरी स्कूल का पुनर्निर्माण किया गया। बच्चों को पढ़ाई की सामग्री और वर्दी उपलब्ध कराई गई। नाम फाउंडेशन और सेना की इस पहल का उल्लेख पहले प्रकाशित रिपोर्टों में भी हुआ है। https://www.hindi.awazthevoice.in

यह इलाका पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर की ओर जाने वाली नियंत्रण रेखा के बेहद करीब है। ऐसे क्षेत्रों में शिक्षा केवल स्कूल की चारदीवारी तक सीमित विषय नहीं है। यहां बेहतर स्कूल का मतलब बच्चों के लिए सुरक्षित वातावरण, नियमित पढ़ाई और भविष्य की नई संभावना भी है। मल्हार पाटेकर के अनुसार, गग्गर हिल प्राइमरी स्कूल का व्यापक नवीनीकरण इसी उद्देश्य से किया गया था कि स्थानीय बच्चों को बेहतर, सुरक्षित और सुविधाजनक शिक्षण वातावरण मिल सके। https://www.hindi.awazthevoice.in

नाम फाउंडेशन की योजना केवल स्कूलों की मरम्मत तक सीमित नहीं थी। संस्था स्थानीय युवाओं को रोजगार से जोड़ने की दिशा में भी काम कर रही थी। कुपवाड़ा जिले के बोनियार इलाके में सेना के सहयोग से एक व्यावसायिक केंद्र विकसित करने की योजना बनाई गई। यहां युवाओं को आतिथ्य सत्कार, बेकरी, सूचना प्रौद्योगिकी और सिलाई जैसे कौशल सिखाने की तैयारी थी। उद्देश्य साफ था। स्थानीय युवाओं को ऐसा हुनर मिले जिससे वे नौकरी तलाश सकें या अपना छोटा कारोबार शुरू कर सकें।

नाम फाउंडेशन के लिए इस अभियान को देखने वाले गणेश थोरात ने शिक्षा को सामाजिक बदलाव का सबसे प्रभावी माध्यम बताया था। उनका कहना था कि बेहतर शैक्षिक वातावरण बच्चों को सही दिशा देने में मदद करता है। उनकी योजना में स्थानीय लोगों की भागीदारी भी महत्वपूर्ण थी। विचार यह था कि शुरुआती मदद के बाद स्थानीय समुदाय खुद इन परियोजनाओं की निगरानी और देखभाल कर सके।

गणेश थोरात पिछले करीब दो वर्षों से गग्गर हिल प्राइमरी स्कूल और आसपास के गांवों के विकास से जुड़े काम देख रहे थे। उनके अनुसार, गांवों में लोगों का व्यवहार बेहद आत्मीय रहा। उन्होंने अपने अनुभव में बताया कि स्थानीय लोगों ने उन्हें कभी बाहरी व्यक्ति की तरह महसूस नहीं होने दिया। अलग राज्य, जाति या धर्म की दूरी के बजाय उन्हें स्थानीय लोगों से अपनापन मिला।

इस अभियान का असर आसपास के इलाकों में भी दिखाई देने लगा। थोरात के अनुसार, कई पंचायतों ने अपने गांवों में भी इसी तरह के विकास कार्यों के लिए नाम फाउंडेशन से संपर्क किया। उन्हें 14 आवेदन मिलने की बात कही गई थी। संस्था ने कुछ स्कूलों में शौचालयों के निर्माण पर भी जोर दिया। इसका सीधा संबंध छात्राओं की शिक्षा से था। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल में पर्याप्त और सुरक्षित शौचालय की सुविधा नहीं होना कई बार लड़कियों की पढ़ाई के रास्ते में बड़ी बाधा बन जाता है।

कश्मीर में नाम फाउंडेशन की योजना बारामूला तक विस्तार करने की भी थी। इसके बाद धीरे धीरे दूसरे इलाकों तक पहुंच बनाने की बात कही गई थी। इस काम के लिए कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी यानी सीएसआर फंड से सहयोग जुटाने की योजना भी बनाई गई थी। उद्देश्य था कि स्कूलों के बुनियादी ढांचे का पुनर्निर्माण हो और स्थानीय बच्चों को बेहतर शिक्षा मिल सके।

नाना पाटेकर का कश्मीर से यह जुड़ाव अचानक नहीं था। उनके जीवन में भारतीय सेना से जुड़ी एक अलग कहानी भी रही है। नाना ने सार्वजनिक रूप से बताया था कि 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उन्होंने भारतीय सेना के साथ स्वैच्छिक सेवा की थी। इसी अनुभव ने घाटी के साथ उनका भावनात्मक रिश्ता मजबूत किया। उनके अनुसार, उन्होंने कुपवाड़ा, बारामूला और सोपोर जैसे इलाकों में सेना के साथ समय बिताया था।

नाना पाटेकर सेना की मराठा लाइट इन्फैंट्री से भी जुड़े रहे थे। उनके सैन्य अनुभव का उल्लेख उनकी सार्वजनिक जीवन की कहानियों में कई बार हुआ है। कारगिल युद्ध के समय तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस की अनुमति से उन्होंने सेना के साथ सेवा की थी। हालांकि वह सीधे लड़ाकू भूमिका में शामिल नहीं हुए थे। उन्होंने सेना की क्विक रिएक्शन टीम के साथ समय बिताने की बात बताई थी।

नाना के लिए सेना के प्रति सम्मान केवल शब्दों तक सीमित नहीं था। उन्होंने कई मौकों पर सैनिकों और पुलिसकर्मियों के प्रति सम्मान व्यक्त किया। एक टीवी कार्यक्रम में उन्होंने कहा था कि जब वह ड्यूटी पर तैनात किसी पुलिसकर्मी को देखते हैं तो कई बार अपनी गाड़ी रोककर उनका हालचाल पूछते हैं। उनके मुताबिक, ऐसे छोटे व्यवहार से ड्यूटी पर मौजूद जवानों को भी अपनापन महसूस होता है।

उनका सामाजिक नजरिया महाराष्ट्र में भी लंबे समय से दिखाई देता रहा। नाम फाउंडेशन की शुरुआत किसानों की परेशानी को देखते हुए हुई थी। संगठन ने सूखा प्रभावित इलाकों में जल संरक्षण, जल भंडारण और ग्रामीण विकास से जुड़े काम किए। नाम फाउंडेशन के आधिकारिक रिकॉर्ड में संस्था के किसान कल्याण से जुड़े काम और नाना पाटेकर की भूमिका दर्ज है

नाना ने एक इंटरव्यू में बताया था कि शुरुआत के दिनों में उन्होंने किसान परिवारों की मदद के लिए बड़ी रकम जुटाई थी। उनका अनुभव था कि केवल आर्थिक सहायता देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। किसानों की आत्महत्या के पीछे पानी की कमी, खेती का संकट और ग्रामीण अर्थव्यवस्था जैसी समस्याएं थीं। इसलिए उन्होंने राहत के साथ दीर्घकालिक विकास पर ध्यान देने की कोशिश की।

यही सोच बाद में कश्मीर के अभियान में भी दिखाई दी। यहां केवल स्कूलों की इमारतें ठीक करने की बात नहीं थी। बच्चों की पढ़ाई, परिवारों की आर्थिक स्थिति और युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने की योजना साथ रखी गई थी।

नाना पाटेकर के निधन के बाद उनके इस काम को याद करना इसलिए जरूरी है क्योंकि अभिनेता की लोकप्रियता अक्सर उनकी फिल्मों तक सीमित कर दी जाती है। लेकिन उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा कैमरे से बाहर भी था। किसानों के बीच काम करना, ग्रामीण क्षेत्रों में पानी और शिक्षा की समस्या पर ध्यान देना और कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में बच्चों के लिए बेहतर स्कूल की कोशिश करना उसी व्यापक सोच का हिस्सा था।

कश्मीर में गग्गर हिल प्राइमरी स्कूल का पुनर्निर्माण इस अभियान का एक ठोस उदाहरण बना। सेना और नाम फाउंडेशन की साझेदारी से हुए इस काम का उद्देश्य स्थानीय बच्चों को बेहतर शिक्षा देना था। पहले प्रकाशित रिपोर्ट में भी इस स्कूल के नवीनीकरण और छात्रों को अध्ययन सामग्री उपलब्ध कराने की जानकारी दी गई थी। https://www.hindi.awazthevoice.in

नाना पाटेकर अब नहीं हैं। लेकिन सवाल यह है कि उनके बाद उनके सपनों का यह काम कितनी दूर जाएगा। किसी भी सामाजिक अभियान की असली परीक्षा उसके संस्थापक की मौजूदगी के बाद होती है। अगर स्थानीय समुदाय, सेना, नाम फाउंडेशन और सहयोगी संस्थाएं इस पहल को आगे बढ़ाती हैं तो सीमावर्ती गांवों के बच्चों के लिए इसका महत्व और बढ़ सकता है।

नाना की फिल्मों में अक्सर उनका किरदार व्यवस्था, संघर्ष और इंसानी कमजोरी से लड़ता दिखाई देता था। असल जिंदगी में भी उन्होंने कुछ ऐसे ही मोर्चे चुने। फर्क इतना था कि इस बार सामने कोई फिल्मी खलनायक नहीं था। सामने था किसान का संकट, गांव की गरीबी, पानी की कमी, शिक्षा की असुविधा और सीमावर्ती इलाके के बच्चों का सीमित भविष्य।

शायद यही वजह है कि नाना पाटेकर की विदाई के समय उनके अभिनय के साथ उनके सामाजिक कामों को याद करना भी जरूरी है। एक अभिनेता के रूप में उन्होंने दर्शकों पर असर छोड़ा। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उन्होंने उन इलाकों तक पहुंचने की कोशिश की जहां कैमरों की रोशनी कम पहुंचती है।

कश्मीर के गग्गर हिल से महाराष्ट्र के विदर्भ तक उनकी सामाजिक यात्रा का संदेश सीधा था। बदलाव केवल बड़े भाषणों से नहीं आता। कभी एक स्कूल की मरम्मत से आता है। कभी एक बच्चे को किताब देने से। कभी किसी युवा को हुनर सिखाने से। और कभी किसी गांव को यह भरोसा देने से कि वह अकेला नहीं है।

नाना पाटेकर का निधन भारतीय सिनेमा के लिए एक बड़ी क्षति है। लेकिन कश्मीर के दूरदराज गांवों में शिक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए शुरू हुई उनकी पहल उनके सार्वजनिक जीवन की ऐसी विरासत है, जिसे उनके प्रशंसक और सहयोगी आगे बढ़ा सकते हैं।