ग्रीनलैंड पर दावा: क्या अमेरिका फिर जगा रहा है औपनिवेशिक सोच?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 09-02-2026
Claiming Greenland: Is the US reviving colonial thinking?
Claiming Greenland: Is the US reviving colonial thinking?

 

fकनागवल्ली सूर्यनारायणन

ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने की अमेरिका की कोई भी कोशिश केवल एक भू-राजनीतिक निर्णय नहीं होगी, बल्कि यह अंतरराष्ट्रीय कानून, वैश्विक नैतिकता और छोटे देशों की संप्रभुता पर गंभीर प्रहार मानी जाएगी। ऐसा कोई भी कदम संयुक्त राष्ट्र चार्टर के आर्टिकल 2(4) का सीधा उल्लंघन होगा, जो किसी भी देश की क्षेत्रीय अखंडता और राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बल या बल की धमकी के प्रयोग पर रोक लगाता है। 21वीं सदी में इस तरह की कार्रवाई शक्तिशाली देशों की औपनिवेशिक मानसिकता और साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाओं के पुनरुत्थान का संकेत होगी, जिसमें ग्रीनलैंड के स्वदेशी लोगों के अधिकारों और उनके आत्मनिर्णय की अनदेखी शामिल है।

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल में यह दोहराया जाना कि अमेरिका को अपनी “राष्ट्रीय सुरक्षा” के लिए ग्रीनलैंड की आवश्यकता है, ने एक बार फिर इस आर्कटिक द्वीप को वैश्विक बहस के केंद्र में ला दिया है। प्रश्न यह है कि क्या ग्रीनलैंड पर अमेरिकी दावा वास्तव में किसी ठोस रणनीतिक आवश्यकता पर आधारित है या यह शक्ति-प्रदर्शन की राजनीति का हिस्सा है। ग्रीनलैंड का रणनीतिक महत्व नया नहीं है। द्वितीय विश्व युद्ध और शीत युद्ध के दौर से ही यह क्षेत्र सुरक्षा समीकरणों में अहम रहा है, क्योंकि आर्कटिक रूस और उत्तरी अमेरिका के बीच मिसाइलों के लिए सबसे छोटा मार्ग प्रदान करता है। ग्रीनलैंड–आइसलैंड–यूके (GIUK) गैप उत्तरी अटलांटिक का एक अत्यंत महत्वपूर्ण समुद्री क्षेत्र है, जो सैन्य और व्यापारिक दोनों दृष्टियों से संवेदनशील है।

Keflavik Air Base, Iceland, 2025. | Kanagavalli Suryanarayanan.

शीत युद्ध के दौरान अमेरिका ने सोवियत हमलों की प्रारंभिक चेतावनी के लिए अलास्का, कनाडा और ग्रीनलैंड में डिस्टेंट अर्ली वार्निंग (DEW) रडार स्टेशन स्थापित किए थे। इसी क्रम में ग्रीनलैंड के उत्तर में थुले एयर बेस, जिसे अब पिटुफिक स्पेस बेस कहा जाता है, बनाया गया, जो आज भी अमेरिकी रणनीतिक ढांचे का हिस्सा है। हालांकि वर्तमान परिस्थितियां शीत युद्ध से भिन्न हैं। आज बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था उभर रही है और अमेरिकी प्रभुत्व को नई चुनौतियाँ मिल रही हैं। आर्कटिक में रूस और चीन की बढ़ती सक्रियता से वाशिंगटन असहज है, लेकिन इस असहजता का समाधान किसी स्वायत्त क्षेत्र पर कब्ज़ा करना नहीं हो सकता।

हाल के वर्षों में आर्कटिक क्षेत्र में सैन्य गतिविधियां बढ़ी हैं। रूस की परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती, अमेरिका की जवाबी चेतावनियाँ और परमाणु परीक्षण प्रतिबंधों पर नई बयानबाज़ी संकेत देती है कि यह क्षेत्र फिर हथियारों की होड़ का केंद्र बन सकता है। फिर भी वास्तविकता यह है कि GIUK गैप की सुरक्षा ग्रीनलैंड की संप्रभुता पर नियंत्रण से नहीं, बल्कि NATO सहयोगियों के बीच समन्वित निगरानी और समुद्री नियंत्रण से सुनिश्चित होती है। नॉर्वे, आइसलैंड और डेनमार्क जैसे देशों के साथ मजबूत NATO साझेदारी अमेरिकी हितों के लिए अधिक प्रभावी है। ग्रीनलैंड पर कब्ज़े की कोशिश इन सहयोगियों को दूर कर सकती है और NATO के भीतर दरार पैदा कर सकती है।

अमेरिका पहले से ही कनाडा के साथ आर्कटिक क्षेत्र में कानूनी मतभेदों का सामना कर रहा है, खासकर नॉर्थवेस्ट पैसेज की स्थिति को लेकर। ऐसे में ग्रीनलैंड पर दावा डेनमार्क ही नहीं, बल्कि पूरे आर्कटिक समूह — डेनमार्क (ग्रीनलैंड), नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड, आइसलैंड और कनाडा — के बीच अविश्वास बढ़ा सकता है। इससे मिलने वाले किसी भी संभावित रणनीतिक लाभ से अधिक कूटनीतिक और राजनीतिक नुकसान हो सकता है।

यह भी महत्वपूर्ण है कि अमेरिका पहले से ही ग्रीनलैंड में सैन्य उपस्थिति बनाए हुए है। 1951 के अमेरिका-डेनमार्क रक्षा समझौते और उसके बाद के संशोधनों के तहत पिटुफिक स्पेस बेस अमेरिकी सुरक्षा ढांचे का हिस्सा है। हालिया रक्षा सहयोग समझौते भी अमेरिका को पर्याप्त परिचालन स्वतंत्रता देते हैं। ऐसे में यह तर्क कमजोर पड़ता है कि संप्रभु नियंत्रण के बिना अमेरिकी सुरक्षा खतरे में है।

ग्रीनलैंड का इतिहास भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। 1950 के दशक में थुले एयर बेस के विस्तार के लिए इनुघिट समुदाय को जबरन विस्थापित किया गया, उनके घर नष्ट किए गए और उन्हें ऐसे क्षेत्रों में बसाया गया जहाँ उनकी पारंपरिक आजीविका लगभग असंभव थी। 1968 में एक अमेरिकी B-52 विमान दुर्घटना के कारण रेडियोधर्मी प्रदूषण फैला, जिसकी स्मृति आज भी स्थानीय समाज में जीवित है। ये घटनाएँ सैन्य विस्तार के मानवीय और पर्यावरणीय जोखिमों को उजागर करती हैं।

US Army training at Pituffik Space Base, Greenland, May 2023. | Polaris/Newscom

ग्रीनलैंड एक स्वदेशी बहुल क्षेत्र है जिसने लंबे समय तक उपनिवेशवाद का अनुभव किया है। 1979 में होम रूल और 2009 में स्व-शासन की व्यवस्था वहाँ के लोगों के संघर्ष का परिणाम है। उनकी संस्कृति और पहचान स्थानीय पारिस्थितिकी से गहराई से जुड़ी है। बढ़ता सैन्यीकरण पर्यावरण, समुद्री जीवन और पारंपरिक आजीविका पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

ग्रीनलैंड को वैश्विक शक्तियों की प्रतिद्वंद्विता में मोहरा नहीं बनाया जा सकता। अमेरिका के रणनीतिक हित पहले से मौजूद समझौतों और सैन्य व्यवस्थाओं से सुरक्षित हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में बातचीत संभव है, लेकिन अंतिम निर्णय ग्रीनलैंड के लोगों की इच्छा से ही होना चाहिए। “हमारे बिना, हमारे बारे में कुछ नहीं” ,यह स्वदेशी आत्मनिर्णय का मूल सिद्धांत है। ग्रीनलैंड का भविष्य वही लोग तय करें जिनकी भूमि, संस्कृति और जीवन उससे जुड़े हैं, न कि बाहरी शक्तियाँ।

( कनागवल्ली सूर्यनारायणन, भारत की पहली पोलर लॉ स्कॉलर है)

साभार: नैटस्ट्रेट