सूफी नजरिए को लेकर जामिया कुलपति मजहर आसिफ के समर्थन में उतरे बुद्धिजीवी

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 07-05-2026
Intellectuals come out in support of Jamia Vice-Chancellor Mazhar Asif regarding his Sufi perspective.
Intellectuals come out in support of Jamia Vice-Chancellor Mazhar Asif regarding his Sufi perspective.

 

आवाज द वाॅयस/नई दिल्ली

जामिया मिल्लिया इस्लामिया के कुलपति प्रोफेसर मज़हर आसिफ इन दिनों चर्चा के केंद्र में हैं। उनके एक हालिया बयान को लेकर सोशल मीडिया पर काफी शोर मचा हुआ है। इसी पृष्ठभूमि में 'मुस्लिम इंटेलेक्चुअल फ्रंट' (MIF) ने एक बड़ी ऑनलाइन बैठक की। इस बैठक का मकसद प्रोफेसर आसिफ के खिलाफ चलाए जा रहे संगठित अभियान का जवाब देना और उनके साथ एकजुटता दिखाना था। इसमें देश भर के जाने-माने शिक्षाविद, शोधकर्ता और बुद्धिजीवी शामिल हुए। सभी ने एक स्वर में कहा कि प्रोफेसर आसिफ पर किए जा रहे हमले दरअसल ज्ञान और संवाद की परंपरा पर हमला हैं।

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विवाद का असली सच और सूफी नजरिया

पूरे विवाद की जड़ प्रोफेसर मज़हर आसिफ का वह बयान है जिसमें उन्होंने कहा कि "सभी भारतीयों का डीएनए महादेव से जुड़ा हुआ है"। सोशल मीडिया पर इस बयान के छोटे-छोटे हिस्से काटकर वायरल किए गए। वक्ताओं ने कहा कि इसे सिर्फ विज्ञान या जीव विज्ञान के तराजू पर तौलना बहुत ही सतही सोच है। असल में यह एक सांस्कृतिक और दार्शनिक रूपक है। प्रोफेसर आसिफ सूफीवाद के गहरे जानकार हैं। सूफी परंपरा में ऐसी प्रतीकात्मक भाषा का इस्तेमाल हमेशा से होता आया है।

बुद्धिजीवियों ने तर्क दिया कि कबीर, अमीर खुसरो और बुल्लेशाह जैसे महान संतों ने हमेशा ऐसी ही भाषा में बात की। उन्होंने भारत की साझी विरासत और सामूहिक सभ्यता की बात की। जब प्रोफेसर आसिफ 'डीएनए' शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो वे खून के रिश्तों से ज्यादा रूहानी और सांस्कृतिक जुड़ाव की बात कर रहे होते हैं।

वे यह कहना चाह रहे हैं कि हम सब एक ही मिट्टी और एक ही सभ्यता की संतान हैं। इसे विवाद बनाना बौद्धिक ईमानदारी के खिलाफ है। सोशल मीडिया की भीड़ अक्सर बिना संदर्भ समझे किसी को भी निशाना बनाने लगती है। बैठक में इसे बेहद खतरनाक रुझान बताया गया।

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति और अल्पसंख्यकों के हक

प्रोफेसर मज़हर आसिफ का कद सिर्फ एक कुलपति के तौर पर नहीं है। वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020की मसौदा समिति के सदस्य भी रहे हैं। बैठक में उनके इस योगदान को विशेष रूप से याद किया गया। उन्होंने शिक्षा नीति बनाते समय अल्पसंख्यक समुदायों और उनकी भाषाओं के लिए मजबूती से आवाज उठाई। उनके प्रयासों का ही नतीजा है कि नई शिक्षा नीति में उर्दू और अरबी जैसी भाषाओं को सम्मानजनक स्थान मिला है। उन्होंने समावेशी शिक्षा की वकालत की।

प्रोफेसर आसिफ ने मदरसों के आधुनिकीकरण और उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में भी काम किया। उनका मानना है कि मदरसे के छात्रों को भी वही अवसर मिलने चाहिए जो आधुनिक स्कूलों के बच्चों को मिलते हैं। उन्होंने अल्पसंख्यक भाषाओं के संरक्षण के लिए जो नीतियां बनवाईं, वे आने वाले दशकों तक अपना असर दिखाएंगी। ऐसे व्यक्ति पर केवल एक बयान के आधार पर सवाल उठाना उनके दशकों के शोध और सेवा का अपमान है।

जामिया में बदलाव की नई बयार

प्रोफेसर मज़हर आसिफ के कुलपति बनने के बाद जामिया मिल्लिया इस्लामिया में प्रशासनिक स्तर पर बड़े सुधार हुए हैं। बैठक में मौजूद वक्ताओं ने बताया कि उन्होंने सबसे पहले कर्मचारियों और शिक्षकों की समस्याओं पर ध्यान दिया। जामिया में कई अस्थायी कर्मचारी वर्षों से वेतन की अनिश्चितता से जूझ रहे थे। प्रोफेसर आसिफ ने आते ही उनकी फाइलें निपटाईं। अब सैकड़ों कर्मचारियों को समय पर नियमित वेतन मिल रहा है। यह उनकी मानवीय संवेदनशीलता का उदाहरण है।

शिक्षकों की पदोन्नति का मामला भी वर्षों से लटका हुआ था। कई योग्य शिक्षक अपनी बारी का इंतजार करते-करते हताश हो रहे थे। कुलपति ने इसे प्राथमिकता दी और पदोन्नति की प्रक्रिया को सुचारू बनाया। इससे विश्वविद्यालय के शैक्षणिक माहौल में सकारात्मक ऊर्जा आई है। प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ी है और फाइलों के निस्तारण में तेजी आई है। कैंपस में अब पहले से ज्यादा अनुशासन और शांति दिखाई देती है। वे केवल ऑफिस में बैठने वाले अधिकारी नहीं हैं। उन्हें अक्सर सफाईकर्मियों या मालियों के साथ खड़े होकर बात करते देखा जा सकता है।

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शोध और अकादमिक उत्कृष्टता पर जोर

जामिया जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के लिए शोध (Research) सबसे महत्वपूर्ण है। प्रोफेसर आसिफ खुद एक बड़े शोधकर्ता हैं। उन्होंने सूफीवाद और भारतीय इतिहास पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है। कुलपति के रूप में उन्होंने विभिन्न विभागों में स्थायी नियुक्तियों को बढ़ावा दिया है। वे जानते हैं कि बिना स्थायी और योग्य शिक्षकों के कोई भी संस्थान तरक्की नहीं कर सकता। नई शिक्षा नीति को जमीन पर उतारने के लिए उन्होंने पाठ्यक्रम में जरूरी बदलाव किए हैं।

वक्ताओं ने कहा कि उनके नेतृत्व में जामिया एक सुनहरे युग की तरफ बढ़ रहा है। उन्होंने छात्रों के लिए बहुआयामी अवसर पैदा किए हैं। रिसर्च फेलोशिप और लैब की सुविधाओं को बेहतर बनाने पर उनका पूरा ध्यान है। उनके काम करने की शैली बहुत ही सरल और जमीन से जुड़ी है। वे छात्रों की छोटी-छोटी समस्याओं को भी व्यक्तिगत रूप से सुनते हैं। यही वजह है कि जामिया की रैंकिंग और प्रतिष्ठा में लगातार सुधार हो रहा है।

विरोध के पीछे छिपे व्यक्तिगत स्वार्थ

बैठक में इस बात पर भी चर्चा हुई कि आखिर कुछ लोग उनका विरोध क्यों कर रहे हैं। बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह विरोध वैचारिक कम और व्यक्तिगत ज्यादा है। कुछ तत्व पुराने ढर्रे पर चल रहे थे और वे सुधारों से डरे हुए हैं। जब कोई ईमानदार और गतिशील नेतृत्व आता है, तो कई लोगों के निजी हित प्रभावित होते हैं। ऐसे ही लोग अब सोशल मीडिया का सहारा लेकर दुष्प्रचार कर रहे हैं। वे ईर्ष्या और पुरानी मानसिकता के वशीभूत होकर जामिया की प्रगति में बाधा डालना चाहते हैं।

जेएनयू के डॉ. शहबाज़ आमिल और जामिया के डॉ. ज़ुल्फ़िकार अली अंसारी जैसे विद्वानों ने साफ कहा कि मतभेद होना गलत नहीं है। लेकिन मतभेद तर्क और शोध पर आधारित होने चाहिए। ट्रोलिंग और गलतबयानी करना बौद्धिक पतन की निशानी है। किसी विद्वान के व्यक्तिगत चरित्र पर हमला करना हमारे समाज की स्वस्थ परंपरा के खिलाफ है। अगर शैक्षणिक संस्थानों में राजनीति और प्रोपेगेंडा का बोलबाला हो गया, तो देश का बहुत बड़ा नुकसान होगा।

समाज और बौद्धिक वर्ग के लिए संदेश

मुस्लिम इंटेलेक्चुअल फ्रंट ने अपने घोषणापत्र में साफ किया कि वे प्रोफेसर आसिफ के साथ मजबूती से खड़े हैं। उन्होंने मांग की कि सोशल मीडिया पर होने वाली ऐसी संगठित ट्रोलिंग को रोकने के लिए कड़े कदम उठाए जाने चाहिए। बुद्धिजीवियों को अब खामोश नहीं रहना चाहिए। उन्हें खुलकर ऐसे लोगों का समर्थन करना चाहिए जो शिक्षा और राष्ट्रीय एकता के लिए काम कर रहे हैं। प्रोफेसर आसिफ का बयान दरअसल भारत की साझी रूह का बयान है।

यह बैठक एक चेतावनी भी थी कि अगर आज हम चुप रहे, तो कल कोई भी विद्वान खुलकर अपनी बात नहीं रख पाएगा। हमें संवाद और धैर्य की संस्कृति को बचाना होगा। प्रोफेसर मज़हर आसिफ पर आघात दरअसल हमारी साझा विरासत पर आघात है। बैठक का समापन इस संकल्प के साथ हुआ कि ज्ञान और सच्चाई की इस लड़ाई में पूरा बौद्धिक समुदाय एकजुट रहेगा। जामिया की प्रगति को कोई भी नकारात्मक अभियान रोक नहीं पाएगा। अंततः जीत सच्चाई और सेवा भाव की ही होगी।