मिट्टी से सपने गढ़ती हैं दीपिका पाल, संघर्ष से बनाई पहचान

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 19-10-2026
Deepika Pal crafts dreams from clay; she carved out an identity through struggle.
Deepika Pal crafts dreams from clay; she carved out an identity through struggle.

 

सुदीप शर्मा चौधरी और आरिफुल इस्लाम / गुवाहाटी

वह केवल मिट्टी से मूर्तियां नहीं गढ़तीं, बल्कि अपने सपनों को भी आकार देती हैं। उनके स्पर्श से बेजान सामग्रियांमिट्टी, फाइबरग्लास और सीमेंटमानो जीवित हो उठती हैं। चाहे वह मां दुर्गा की प्रतिमा हो, मां बासंती की या फिर अन्य देवी-देवताओं की, उनकी हर मूर्ति में उनकी कलात्मक भावना, कड़ी मेहनत और जीवन के लंबे संघर्ष की झलक साफ दिखाई देती है।

वह गुवाहाटी के पांडू की रहने वाली दीपिका पाल हैं, जो पिछले करीब 12 वर्षों से इस कला को अपने पेशे के रूप में अपनाए हुए हैं। उनके लिए यह शिल्प सिर्फ आजीविका कमाने का जरिया नहीं है, बल्कि यह उनके परिवार की विरासत, उनके पिता की याद और अपनी खुद की एक अलग पहचान बनाने के लिए किया गया उनका एक लंबा संघर्ष है।

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दीपिका का परिवार लंबे समय से मूर्ति कला से जुड़ा रहा है। बचपन में पढ़ाई के साथ-साथ वह अपने परिवार के अन्य सदस्यों और खासकर अपने पिता को मूर्तियां बनाते हुए बहुत करीब से देखती थीं।

उन्होंने देखा कि कैसे धीरे-धीरे मिट्टी एक आकार लेती है और उससे देवी का मुखमंडल उभर कर सामने आता है। उस समय उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि यह कला एक दिन उनका पेशा बन जाएगी। हालांकि, जिंदगी कई बार इंसान को ऐसे फैसले लेने पर मजबूर कर देती है, जिनकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की होती।

दीपिका तीन बहनों में से एक हैं और उनका कोई भाई नहीं है। जब उनके अचानक पिता का निधन हुआ, तो पूरे परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। एक तरफ घर चलाने का बोझ और दूसरी तरफ एक अनिश्चित भविष्य, ऐसी विकट परिस्थिति में उन्होंने सब कुछ संभालने का बीड़ा उठाया। इसी चुनौतीपूर्ण दौर में उन्होंने अपने पिता की विरासत और उनके हुनर को संभाल लिया।

'आवाज़-द वॉयस' के साथ एक खास बातचीत में दीपिका पाल बताती हैं, "मैं मां दुर्गा की मूर्तियां बनाने को अपना सौभाग्य मानती हूँ। पिता के निधन के बाद परिवार का भरण-पोषण करने के लिए मैंने उनके पेशे को चुना, जो हमारे परिवार की भी विरासत थी। बचपन में मैं कभी-कभी अपने पिता और दादाजी को काम करते देखती थी और कभी-कभी पिता की मदद भी कर देती थी। मैंने इसी तरह यह कला सीखी।"

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वह आगे कहती हैं, "मूर्ति बनाने का काम आमतौर पर पुरुष करते हैं। मैंने सोचा कि अगर पुरुष यह कर सकते हैं, तो महिलाएं क्यों नहीं? इसी सोच ने मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। बचपन से ही मेरा सपना मूर्तियां बनाने का था। अगर मैं इस पारिवारिक परंपरा को आगे न बढ़ाती, तो शायद मेरे पिता के साथ ही यह परंपरा भी समाप्त हो जाती। मुझे इस बात पर बहुत गर्व है कि इस नेक काम के जरिए मैं अपने पिता का नाम जिंदा रख पाई हूं।"

एक महिला होने के नाते, मूर्ति कला की इस पुरुष-प्रधान दुनिया में अपनी जगह बनाए रखने के लिए उन्हें लगातार संघर्ष करना पड़ा। उन्हें अपने पिता के पुराने ग्राहकों के पास दोबारा जाना पड़ा और उनका भरोसा फिर से जीतना पड़ा।

अपनी कला के बल पर उन्होंने यह साबित कर दिया कि मूर्ति कला का किसी लिंग से कोई वास्ता नहीं होता। धीरे-धीरे उनके काम की चर्चा दूर-दूर तक फैल गई और लोग दूर-दराज के इलाकों से उनकी गढ़ी हुई मूर्तियां खरीदने आने लगे। हालांकि शुरुआत में उन्हें अपने पिता के संबंधों और पहचान का सहारा मिला, लेकिन आज दीपिका पाल ने अपनी खुद की एक अलग और मजबूत पहचान बना ली है।

घर-परिवार की जिम्मेदारियों को निभाने के अपने इस संघर्ष के दौरान उन्हें अपनी शादीशुदा जिंदगी में भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी। मां दुर्गा की तरह उन्होंने हर कठिनाई का डटकर मुकाबला किया और अपने परिवार की रक्षा की।

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वह आज भी अपने परिवार की जिम्मेदारियों और अपनी कला के प्रति अटूट प्रेम के बीच बेहतरीन तालमेल बिठाते हुए आगे बढ़ रही हैं। वर्तमान में उन्होंने एक स्थानीय क्लब के दुर्गा पूजा पंडाल को किराए पर लेकर वहीं अपनी कार्यशाला (वर्कशॉप) बनाई है। मिट्टी, पुआल, बांस, रंगों और विभिन्न औजारों से भरी यह कार्यशाला आज उनके जीवन की सबसे अहम जगहों में से एक है।

समय के साथ दीपिका की बनाई मूर्तियों की मांग भी लगातार बढ़ रही है। वह बताती हैं कि उन्होंने असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के आवास पर बासंती पूजा के लिए भी मूर्ति गढ़ी थी, जिसके सामने मुख्यमंत्री ने खुद प्रार्थना की थी।

दुर्गा पूजा के सीजन में उनका काम और अधिक बढ़ जाता है। देवी के चेहरे का आकार, आंखों के भाव और आभूषणों की सजावट—इन सभी बारीकियों पर दीपिका बहुत ध्यान देती हैं। उनके लिए हर मूर्ति एक नए सपने जैसी है। जैसा कि वह खुद कहती हैं, "देवी की मूर्ति बनाना मेरे लिए सिर्फ एक पेशा नहीं है, बल्कि ऐसा लगता है जैसे मैं अपने किसी सपने को सच कर रही हूँ।"

अपनी कार्य-प्रणाली के बारे में बताते हुए दीपिका कहती हैं, "मूर्तियां बनाने के लिए बांस, लकड़ी, पुआल और मिट्टी की जरूरत होती है। चूंकि यह शहरी इलाका है, इसलिए सारी सामग्रियां बाहर से मंगवानी पड़ती हैं। मुझे बाहर से कारीगरों को भी काम पर रखना पड़ता है। साल की शुरुआत में मैं सबसे पहले भगवान गणेश की मूर्तियां बनाती हूं। इसके बाद मानसा पूजा, विश्वकर्मा पूजा, गणेश चतुर्थी, दुर्गा पूजा और काली पूजा तक मेरा काम बिना रुके लगातार चलता रहता है। मैं रास पूर्णिमा के लिए भी मूर्तियां बनाती हूँ।"

ग्राहकों के भरोसे के बारे में बात करते हुए वह बताती हैं, "लोगों का मेरे पिता पर बहुत अधिक भरोसा था। जब मैंने काम शुरू किया, तो उनके पुराने ग्राहक मुझसे पूछते थे,'क्या तुम यह कर पाओगे?' मैं पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती थी कि मैं कर सकती हूँ। धीरे-धीरे जब लोगों ने मेरा काम देखा, तो उन्हें वह पसंद आया और उनका भरोसा लौट आया। आज हमारे स्थानीय ग्राहकों के अलावा बाहर के इलाकों से भी काफी संख्या में लोग मूर्तियां लेने आते हैं।"

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उनकी प्रतिबद्धता केवल कला तक सीमित नहीं है, बल्कि पर्यावरण के प्रति भी उतनी ही गहरी है। वह मूर्तियों को बनाने में पर्यावरण के अनुकूल (इको-फ्रेंडली) रंगों और सामग्रियों के इस्तेमाल पर हमेशा जोर देती हैं। नदियां, धाराओं और जल स्रोतों में मूर्तियों के विसर्जन से होने वाले प्रदूषण को कम करने के प्रति वह हमेशा सचेत रहती हैं।

देवी विसर्जन के पलों को याद करते हुए वह भावुक हो जाती हैं और कहती हैं, "विसर्जन का समय मेरे लिए बहुत दर्दनाक होता है। मुझे ऐसा महसूस होता है जैसे मेरी अपनी मां मुझसे दूर जा रही हैं। जिस तरह एक मां बहुत प्यार और दुलार से अपने बच्चे का पालन-पोषण करती है, ठीक उसी तरह मैं भी हर मूर्ति को बहुत संजोकर और स्नेह के साथ बनाती हूँ।"

शायद दीपिका के इन तमाम संघर्षों का सबसे बड़ा इनाम उनकी छोटी बेटी की एक मासूम सी बात में छिपा है। एक दिन उस बच्ची ने उनसे कहा था, "मां, मैं भी बिल्कुल आपकी तरह मूर्तियां बनाऊंगी।" बस उसी एक वाक्य ने दीपिका के इतने लंबे संघर्ष को एक नया और गहरा अर्थ दे दिया है।

जो कला कभी उनके पिता के हाथों से उनके हाथों में आई थी, वह शायद आने वाले समय में उनकी बेटी के हाथों में भी पहुंच जाए। मिट्टी से सपने गढ़ने की यह अनूठी परंपरा इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रह सकती है।

इसलिए, दीपिका की यह कहानी केवल एक महिला द्वारा मूर्तियां बनाने की कहानी भर नहीं है। यह दृढ़ संकल्प और आत्मनिर्भरता की एक मिसाल है; उस स्त्री की गाथा है जिसने पिता को खोने के बाद दुख के आगे घुटने नहीं टेके और पुरुषों के वर्चस्व वाले इस क्षेत्र में धैर्य के साथ अपने परिवार की बागडोर संभाली।

यह उस इंसान की कहानी है जिसने पितृसत्तात्मक सोच को चुनौती दी और अपनी काबीलियत से समाज में एक मुकाम हासिल किया। वह भले ही दूसरों के लिए देवी की मूर्तियां गढ़ती हैं, लेकिन उनका खुद का जीवन किसी जीवंत दुर्गा गाथा से कम नहीं है,एक ऐसा सफर जिसमें संघर्ष, बाधाएं और अंधेरा तो था, लेकिन अंत में जीत का दैदीप्यमान प्रकाश भी है।