राजौरी (जम्मू-कश्मीर)
जम्मू-कश्मीर के राजौरी जिला के सुंदरबनी क्षेत्र में जैविक खेती ने न केवल पर्यावरण के लिहाज़ से सकारात्मक बदलाव लाया है, बल्कि इस सीमावर्ती इलाके को एक मजबूत आर्थिक केंद्र में भी तब्दील कर दिया है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों से दूर, प्राकृतिक और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को अपनाकर स्थानीय किसान अब बेहतर आय और स्थिर रोज़गार हासिल कर रहे हैं।
जिला कृषि अधिकारी राजेश वर्मा के अनुसार, सरकार जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने पर विशेष ज़ोर दे रही है। उन्होंने बताया,“हम टिकाऊ और जैविक कृषि पर अधिक ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए विशेष योजनाएं चलाई जा रही हैं। जैविक खेती के क्लस्टर चिन्हित किए गए हैं और उन्हें बढ़ावा दिया जा रहा है। बाजार में जैविक उत्पादों की भारी मांग है और सरकार किसानों को इस दिशा में प्रेरित कर रही है।”
स्थानीय किसान इस बदलाव को अपनी ज़िंदगी में आए बड़े मोड़ के रूप में देख रहे हैं। किसान मीनू ने बताया कि जैविक खेती आसान नहीं है, लेकिन मेहनत का फल अब साफ़ दिख रहा है।“हम अपने खेत में पूरी तरह जैविक सब्ज़ियां उगाते हैं। अभी फूलगोभी, मूली और मौसमी सब्ज़ियां लगा रहे हैं। गर्मियों में पानी की भारी किल्लत थी, तब सिर पर पानी ढोकर फसलों की सिंचाई करनी पड़ती थी। अब पानी की व्यवस्था हो गई है। यही हमारी आजीविका का एकमात्र साधन है और पूरा परिवार खेत में काम करता है।”
सुंदरबनी फल एवं सब्ज़ी संघ के अध्यक्ष अजय गुप्ता का कहना है कि यह क्षेत्र पिछले 35–40 वर्षों से मेहनती किसानों के लिए जाना जाता है।“यहां की कृषि उपज बहुत अच्छी है। सुंदरबनी एक बड़ी मंडी बन चुकी है, जहां से सब्ज़ियां जिले के दूर-दराज़ इलाकों तक भेजी जाती हैं। हज़ारों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से खेती से जुड़े हुए हैं।”
एक अन्य किसान मिंटू शर्मा ने बताया कि अब खेती केवल अनाज तक सीमित नहीं रह गई है।“पहले हम सिर्फ खाद्यान्न उगाते थे, लेकिन अब सब्ज़ियों की खेती भी कर रहे हैं। फूलगोभी और दूसरी मौसमी सब्ज़ियां दूर-दराज़ के इलाकों तक सप्लाई की जा रही हैं। इससे हमारी आमदनी बढ़ी है।”
विशेषज्ञों के मुताबिक, सुंदरबनी में जैविक खेती का विस्तार पर्यावरण संरक्षण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था—दोनों के लिए वरदान साबित हो रहा है। रसायन-मुक्त उत्पादों की बढ़ती मांग ने किसानों की आय बढ़ाई है और इस सीमावर्ती क्षेत्र को आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे बढ़ाया है। यह मॉडल आने वाले समय में जम्मू-कश्मीर के अन्य जिलों के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।






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