आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
‘इंडो-पैसिफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क फॉर प्रॉस्पेरिटी’ (आईपीईएफ) की प्रासंगिकता अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक व्यापार रणनीति के तहत कम हो रही है। आर्थिक शोध संस्थान जीटीआरआई ने मंगलवार को यह बात कही।
आईपीईएफ भारत, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया सहित 14 देशों का समूह है। इसकी शुरुआत 23 मई 2023 को जापान की राजधानी तोक्यो में अमेरिका और अन्य हिंद-प्रशांत साझेदार देशों द्वारा संयुक्त रूप से की गई थी। इसके 14 साझेदार देश 40 प्रतिशत वैश्विक जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) और 28 प्रतिशत वैश्विक माल एवं सेवा व्यापार का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आईपीईएफ को चार स्तंभों पर आधारित बहुपक्षीय सहयोग ढांचे के रूप में संरचित किया गया है। पहला स्तंभ व्यापार है जिसका उद्देश्य डिजिटल व्यापार, श्रम, पर्यावरण एवं नियामकीय प्रथाओं पर नियम विकसित करना है। दूसरा आपूर्ति शृंखला जो लचीलापन, विविधीकरण और संकट प्रतिक्रिया पर केंद्रित है।
वहीं स्वच्छ अर्थव्यवस्था (तीसरा स्तंभ) स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु प्रौद्योगिकियों और टिकाऊ अवसंरचना पर सहयोग को बढ़ावा देती है और निष्पक्ष अर्थव्यवस्था (चौथ स्तंभ) भ्रष्टाचार-रोधी उपायों, कर पारदर्शिता और शासन से संबंधित है।
आपूर्ति शृंखला लचीलापन समझौते पर नवंबर 2023 में हस्ताक्षर किए गए और यह 24 फरवरी 2024 से प्रभावी हुआ जबकि स्वच्छ अर्थव्यवस्था, निष्पक्ष अर्थव्यवस्था एवं व्यापक समझौतों पर सितंबर 2024 में हस्ताक्षर किए गए और वे अक्टूबर 2024 से लागू हुए।
भारत ने चार में से तीन स्तंभों आपूर्ति शृंखला, स्वच्छ अर्थव्यवस्था और निष्पक्ष अर्थव्यवस्था में भाग लिया है, जबकि डिजिटल व्यापार एवं नियामकीय प्रतिबद्धताओं से जुड़ी चिंताओं के कारण वह व्यापार स्तंभ से बाहर रहा है।