‘ड्रीम जॉब’ का मिथक: कहीं करियर की दौड़ में जिंदगी तो पीछे नहीं छूट रही?

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 05-10-2026
The myth of the 'dream job': Is life being left behind in the race for a career?
The myth of the 'dream job': Is life being left behind in the race for a career?

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली

 
किसी न किसी मोड़ पर हममें से ज्यादातर लोगों ने काम को लेकर यह सलाह जरूर सुनी होगी कि ‘‘ऐसा काम चुनो जिसे करने में आपको खुशी मिले, फिर वह आपको जिंदगी में कभी बोझ या मजबूरी नहीं लगेगा और काम करना भी आपको काम जैसा महसूस नहीं होगा।’’

‘ड्रीम जॉब’ यानी ऐसी नौकरी का विचार, जिसे हम अपने सपनों के अनुरूप मानते हैं, सुनने में बेहद आकर्षक और प्रेरणादायक लगता है। इससे यह उम्मीद पैदा होती है कि नौकरी सिर्फ रोजी-रोटी का जरिया नहीं, बल्कि जीवन में उद्देश्य, अपनी पहचान और व्यक्तिगत संतुष्टि पाने का भी जरिया हो सकती है। लेकिन एक नौकरी से इन सभी उम्मीदों को जोड़ देना खासकर करियर की शुरुआत करने वाले युवाओं के लिए दबाव का कारण बन सकता है।
 
अगर आपका करियर आपको किसी ‘जुनून’ जैसा महसूस नहीं होता, या समय के साथ आपकी रुचियां बदल जाती हैं और आपका काम आपको पहले जैसा उपयुक्त नहीं लगता, तो ऐसा लग सकता है कि कहीं न कहीं आप ही असफल हो गए हैं।
 
लेकिन करियर और काम को लेकर प्रेरणा पर हुए शोध एक अलग तस्वीर पेश करते हैं। हो सकता है समस्या यह न हो कि हम अपने काम में उद्देश्य तलाशने में नाकाम हो रहे हैं, बल्कि यह हो कि हमें शुरू से यह उम्मीद करना सिखाया गया है कि एक ही नौकरी हमें सब कुछ देगी—जीवन का उद्देश्य, पहचान, आर्थिक सुरक्षा और व्यक्तिगत संतुष्टि।