सूरत (गुजरात)
सूरत के न्यू सिविल अस्पताल में स्थित हीमोफीलिया देखभाल केंद्र, हीमोफीलिया से पीड़ित मरीज़ों के लिए एक बड़ी जीवनरेखा बनकर उभर रहा है। यह केंद्र पूरे भारत से आने वाले सैकड़ों मरीज़ों को मुफ्त और आधुनिक इलाज मुहैया करा रहा है।
2015 में स्थापित इस केंद्र में अब तक 650 से ज़्यादा मरीज़ों का रजिस्ट्रेशन हो चुका है। यह केंद्र अब जटिल प्रक्रियाओं, जिनमें जोड़ों की बड़ी सर्जरी भी शामिल है, के लिए एक प्रमुख केंद्र बनता जा रहा है। इलाज के लिए न केवल गुजरात, बल्कि दूसरे राज्यों से भी मरीज़ सूरत आ रहे हैं।
हीमोफीलिया एक आनुवंशिक विकार है जो खून के थक्के जमने की क्षमता को प्रभावित करता है। अगर इसका इलाज न किया जाए, तो यह गंभीर विकलांगता का कारण बन सकता है। सूरत केंद्र में मरीज़ों को व्यापक देखभाल मिलती है, जिसमें मुफ्त 'फैक्टर थेरेपी', जांच सेवाएं, फिजियोथेरेपी और सर्जिकल हस्तक्षेप शामिल हैं। इससे मरीज़ों को समय पर इलाज मिलता है और उनके जीवन की गुणवत्ता में सुधार होता है।
मरीज़ों के परिवारों ने इस केंद्र में मिलने वाली सेवाओं की सुलभता की सराहना की है। एक मरीज़ की मां ने बताया कि उनका बच्चा पिछले 16 सालों से यहां इलाज करवा रहा है। उन्होंने इस केंद्र की इस बात के लिए तारीफ की कि यह 24 घंटे खुला रहता है, जिससे मरीज़ किसी भी समय आकर इलाज करवा सकते हैं।
बिहार से आए एक अन्य मरीज़ ने बताया कि निजी अस्पतालों में इलाज का खर्च उठाना बहुत मुश्किल होता है, खासकर महंगे 'क्लॉटिंग फैक्टर' (खून के थक्के जमाने वाले तत्व) का खर्च। उन्होंने इस केंद्र में मिलने वाली मुफ्त सेवाओं के लिए आभार व्यक्त किया।
अस्पताल के डॉक्टरों और अधिकारियों ने समय पर इलाज के महत्व पर ज़ोर दिया। सिविल सुपरिटेंडेंट धरित्री परमार ने कहा कि इलाज में देरी से विकलांगता हो सकती है और मरीज़ की स्वतंत्र रूप से जीवन जीने की क्षमता प्रभावित हो सकती है। वहीं, समय पर 'क्लॉटिंग फैक्टर' मिलने से मरीज़ों की जीवनशैली में काफी सुधार होता है।
अस्पताल के अधिकारियों ने हीमोफीलिया के इलाज में आने वाले भारी खर्च का भी ज़िक्र किया। रेजिडेंट मेडिकल ऑफिसर केतन नायक ने बताया कि इस केंद्र के संचालन में औसतन हर साल 4-5 करोड़ रुपये का खर्च आता है, जिसका वहन गुजरात सरकार करती है।
उन्होंने आगे कहा कि क्लॉटिंग फैक्टर्स, जो सर्जरी के लिए बहुत ज़रूरी होते हैं, उन्हें गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (GeM) के ज़रिए केंद्रीय स्तर पर खरीदा जाता है, और एक मरीज़ के इलाज पर कभी-कभी 70 लाख रुपये से लेकर 2 करोड़ रुपये तक का खर्च आ सकता है।
हीमोफीलिया केयर सेंटर के अधिकारियों ने बताया कि कई मरीज़ जो चलने-फिरने में गंभीर दिक्कतों के साथ आते हैं, वे इलाज के बाद फिर से चल पाते हैं, जबकि उन्हें कहीं और बताया गया था कि उन्हें अपनी इस बीमारी के साथ ही जीना होगा।
मुफ़्त इलाज और सरकारी मदद से, सूरत धीरे-धीरे हीमोफीलिया के मरीज़ों के लिए उम्मीद की किरण बनता जा रहा है, जिन्हें पहले किफायती इलाज तक सीमित पहुँच ही मिल पाती थी।