ईरान युद्ध में नेतन्याहू की रणनीति : राजनीतिक लाभ और बढ़ते जोखिम

Story by  PTI | Published by  [email protected] | Date 02-04-2026
Netanyahu's Strategy in the Iran War: Political Gains and Rising Risks
Netanyahu's Strategy in the Iran War: Political Gains and Rising Risks

 

आवाज द वॉयस/नई दिल्ली 

 
 बेंजामिन नेतन्याहू के लिए ईरान के साथ जारी युद्ध सैन्य कार्रवाई से कहीं अधिक एक रणनीतिक और राजनीतिक दांव बन गया है। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच संघर्ष का यह दूसरा महीना है और शुरुआती सफलताओं के बावजूद अब इसकी दिशा जटिल होती जा रही है।

विश्लेषण के अनुसार, अमेरिका और इजराइल के बीच रणनीतिक मतभेद इस स्थिति का एक प्रमुख कारण हैं। अमेरिका लंबे समय से फारस की खाड़ी में संतुलन बनाए रखने की नीति पर चलता रहा है, जो 1980 के “कार्टर सिद्धांत” पर आधारित है। इस नीति का उद्देश्य क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना और तेल आपूर्ति को सुरक्षित रखना रहा है। इसी कारण, अमेरिका ने दशकों तक ईरान को खतरा मानने के बावजूद उसके खिलाफ प्रत्यक्ष बड़े सैन्य अभियान से परहेज किया।
 
इसके विपरीत, इजराइल के लिए ईरान एक प्रत्यक्ष सुरक्षा चुनौती है। ईरान तथाकथित “एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस” का प्रमुख हिस्सा है, जिसमें सीरिया, हिज़्बुल्ला, हूती और हमास जैसे समूह शामिल हैं। ये समूह इजराइल के खिलाफ प्रतिरोध को समर्थन देते रहे हैं। अक्टूबर 2023 में हमास के हमलों के बाद नेतन्याहू सरकार ने अपनी उस रणनीति को तेज किया, जिसके तहत दुश्मन की सैन्य और नेतृत्व क्षमता को लगातार कमजोर किया जाता है।
 
इजराइल ने इसी रणनीति के तहत हमास और हिज़्बुल्ला पर कड़े हमले किए और अब वह ईरान को भी निशाना बना रहा है। इसमें शीर्ष नेताओं की हत्या और बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाना शामिल है। इस रणनीति से अल्पकालिक सैन्य सफलता तो मिल रही है, लेकिन इसके मानवीय और कूटनीतिक दुष्परिणाम भी सामने आ रहे हैं।
 
यह युद्ध नेतन्याहू के लिए घरेलू राजनीति में भी अहम है। आगामी चुनावों से पहले वह खुद को मजबूत नेता के रूप में पेश कर सकते हैं, खासकर 2023 के हमास हमलों से छवि को हुए नुकसान के बाद। यदि वह यह दिखाने में सफल रहते हैं कि उनकी सरकार ने इजराइल के दुश्मनों को कमजोर किया है, तो इससे उन्हें चुनावी लाभ मिल सकता है।