कराकुल टोपीः कश्मीरी संस्कृति और परंपरा का अनूठा प्रतीक

Story by  राकेश चौरासिया | Published by  [email protected] • 1 Months ago
कराकुल टोपीः कश्मीरी संस्कृति और परंपरा का एक अनूठा प्रतीक

श्रीनगर. कश्मीर के लोगों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली पारंपरिक टोपी को स्थानीय भाषा में कराकुल के नाम से जाना जाता है. कश्मीर की शाही टोपी मानी जाने वाली, यह कश्मीरियों के लिए सम्मान का प्रतीक है.

कराकुल शब्द भेड़ की ‘कराकुल’ नस्ल से आया है, जो मध्य या पश्चिमी एशिया की मूल निवासी है. जैसा कि नाम से पता चलता है, यह टोपी भेड़ और बकरियों के ऊन से बनाई जाती है. कराकुल मेमने की खाल से बनी यह टोपी कश्मीर में बहुत लोकप्रिय है. इस फर में एक नरम, घुंघराली बनावट, एक मखमली एहसास और चमक होती है.

चमड़े की गुणवत्ता के आधार पर एक टोपी की कीमत 6,000 रुपये से लेकर 30,000 रुपये तक होती है. विशेषज्ञों के अनुसार, कराकुल ने उज्बेकिस्तान के बुखारा से मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक अपना रास्ता बनाया और अंततः कश्मीरी संस्कृति का एक अभिन्न अंग बन गया.

यह देखा गया है कि ज्यादातर मुख्यधारा के राजनेता कराकुल टोपी पहनना पसंद करते हैं. एक कश्मीरी दूल्हे के लिए अपनी दुल्हन के ससुराल आने का इंतजार करते हुए अपनी दस्तार को उतारना और उसकी जगह कराकुल टोपी पहनना भी आम बात है.

श्रीनगर के नवां बाजार इलाके में मशहूर दुकान ‘जॉन केप हाउस’ इसी अनोखी टोपी की 125 साल पुरानी दुकान है. मुजफ्फर जॉन अब इन टोपियों की चैथी पीढ़ी के निर्माता हैं. परे बताते हैं कि इस विशेष टोपी की तीन मूल शैलियाँ हैं. पहली जिन्ना शैली, दूसरी अफगान कराकुल और तीसरी रूसी कराकुल.

मुजफ्फर का कहना है कि उनकी दुकान में बनी टोपियां मुहम्मद अली जिन्ना और वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समेत कई प्रमुख हस्तियों ने पहनी हैं. उन्होंने कहा, ‘‘मेरे दादाजी ने 1944 में जिन्ना के लिए एक कराकुल टोपी बनाई थी, उनके पिता ने 1984 में राजीव गांधी के लिए एक कराकुल टोपी बनाई थी और मैंने 2014 में डॉ फारूक अब्दुल्ला, उमर अब्दुल्ला, मीरवाइज, गुलाम नबी आजाद और अन्य लोगों के लिए कराकुल टोपी बनाई थी. इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए भी बनाया है.’’ भले ही टोपी की इस खास शैली का चलन कम हो रहा हो, लेकिन अब वर्तमान पीढ़ी इसे पहनने में काफी रुचि ले रही है.