आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
उच्चतम न्यायालय ने राजस्थान के दौसा जिले में बस में हुए विस्फोट के लगभग तीन दशक पुराने मामले में मंगलवार को एक दोषी को सुनाई गई फांसी की सजा रद्द कर दी और मामले की नए सिरे से सुनवाई के लिए नामित अदालत को निर्देश दिया।
शीर्ष अदालत ने इस मामले में आजीवन कारावास की सजा पाए एक अन्य दोषी को बरी कर दिया और छह आरोपियों को बरी किए जाने के राजस्थान उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील भी खारिज कर दी।
न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने वर्ष 2019 में राजस्थान उच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें दोषी अब्दुल हमीद की फांसी की सजा बरकरार रखी गई थी। पीठ ने कहा कि मुकदमे के दौरान उसे अपने वकील से प्रभावी कानूनी सहायता नहीं मिल सकी थी।
पीठ ने 22 मई, 1996 को आगरा से बीकानेर जा रही एक बस में हुए विस्फोट की घटना के बाद बीते लंबे समय को ध्यान में रखते हुए निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा नामित अदालत में नए सिरे से की जाए। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस सुनवाई को एक वर्ष के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाना चाहिए।
उच्चतम न्यायालय ने कहा कि पेशे से चिकित्सक हमीद को अपनी पसंद का वकील रखने की अनुमति होगी और मामले की सुनवाई ऐसे वरिष्ठ न्यायाधीश करेंगे, जिन्हें सत्र न्यायालय के मुकदमों की सुनवाई का पर्याप्त अनुभव हो।
पीठ ने इसके अलावा निचली अदालत से आजीवन कारावास की सजा पाए पप्पू उर्फ सलीम को बरी कर दिया और छह आरोपियों को बरी किए जाने के उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ राज्य सरकार की अपील खारिज कर दी।