सूखी पत्तियों से बनेगा खाना पकाने का ईंधन, IIT बॉम्बे की अनोखी तकनीक तैयार

Story by  ओनिका माहेश्वरी | Published by  onikamaheshwari | Date 31-03-2026
Cooking Fuel to Be Produced from Dry Leaves: IIT Bombay Develops Unique Technology
Cooking Fuel to Be Produced from Dry Leaves: IIT Bombay Develops Unique Technology

 

मुंबई, महाराष्ट्र

देश में लगातार बढ़ती एलपीजी (रसोई गैस) की कीमतों और संभावित कमी की आशंकाओं के बीच एक बड़ी राहत देने वाली खबर सामने आई है। Indian Institute of Technology Bombay (IIT बॉम्बे) के वैज्ञानिकों ने एक स्वदेशी तकनीक विकसित की है, जिसके जरिए सूखी पत्तियों को खाना पकाने के ईंधन में बदला जा सकता है। यह तकनीक न केवल सस्ती है, बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी मानी जा रही है।

करीब एक दशक की लंबी रिसर्च के बाद तैयार हुई इस तकनीक का नेतृत्व केमिकल इंजीनियरिंग विभाग के प्रोफेसर Sanjay Mahajani ने किया। इस परियोजना की शुरुआत वर्ष 2014 में हुई थी, जिसका उद्देश्य पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम करना और ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों के लिए एक टिकाऊ विकल्प तैयार करना था।

इस तकनीक को ‘बायोमास गैसीफिकेशन’ कहा जाता है, जिसमें सूखी पत्तियों और अन्य जैविक कचरे को नियंत्रित प्रक्रिया के तहत जलाकर गैस में परिवर्तित किया जाता है। इस गैस का उपयोग सीधे खाना पकाने के लिए किया जा सकता है। खास बात यह है कि इस प्रक्रिया में धुआं बेहद कम निकलता है, जिससे यह पारंपरिक लकड़ी या कोयले के मुकाबले अधिक सुरक्षित और पर्यावरण हितैषी बनती है।

प्रोफेसर महाजनी के अनुसार, भारत में हर साल बड़ी मात्रा में सूखी पत्तियां और जैविक कचरा बेकार चला जाता है या फिर उसे जलाकर प्रदूषण बढ़ाया जाता है। नई तकनीक इस कचरे को उपयोगी संसाधन में बदलने का काम करेगी। इससे न केवल ऊर्जा का वैकल्पिक स्रोत मिलेगा, बल्कि वायु प्रदूषण की समस्या को भी कम किया जा सकेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक खासतौर पर उन क्षेत्रों के लिए बेहद फायदेमंद साबित हो सकती है, जहां एलपीजी की पहुंच सीमित है या कीमतें लोगों की पहुंच से बाहर हैं। ग्रामीण इलाकों में इसे आसानी से अपनाया जा सकता है, जिससे महिलाओं को पारंपरिक चूल्हों के धुएं से राहत मिलेगी और स्वास्थ्य पर सकारात्मक असर पड़ेगा।

IIT बॉम्बे की यह पहल ‘मेक इन इंडिया’ और आत्मनिर्भर भारत के विजन को भी मजबूत करती है। स्वदेशी तकनीक होने के कारण इसकी लागत अपेक्षाकृत कम है और इसे स्थानीय स्तर पर विकसित व लागू किया जा सकता है।

फिलहाल इस तकनीक का परीक्षण सफलतापूर्वक किया जा चुका है और इसे व्यावसायिक स्तर पर लागू करने की दिशा में काम जारी है। आने वाले समय में यदि यह बड़े पैमाने पर अपनाई जाती है, तो यह देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभा सकती है।

कुल मिलाकर, IIT बॉम्बे की यह खोज न केवल ईंधन संकट का समाधान पेश करती है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की दिशा में भी एक मजबूत कदम साबित हो सकती है।