Bengal's electoral equations have changed after the SIR, with both the Trinamool and BJP likely to be affected.
आवाज द वॉयस/नई दिल्ली
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के बीच विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत 90.83 लाख से अधिक नाम हटा दिए गए हैं, जिससे कई सीट का गणित बदल गया है। इससे तृणमूल कांग्रेस तथा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दोनों के लिए नयी अनिश्चितताएं पैदा हो गई हैं।
राज्य के कुल मतदाताओं की संख्या 7.66 करोड़ से घटकर 6.77 करोड़ रह गई है, लिहाजा दोनों प्रमुख दलों को इस महीने दो चरण में होने वाले चुनाव अलग परिस्थितियों में लड़ने होंगे। इस बार परिस्थितियां 2021 के चुनाव की तुलना में काफी अलग हैं, जिनमें ममता बनर्जी की जीत हुई थी।
सबसे ज्यादा असर उन जिलों में पड़ा है, जो लंबे समय से बंगाल की सत्ता तय करते रहे हैं। इनमें अल्पसंख्यक बहुल क्षेत्र और दक्षिण बंगाल 2011 से तृणमूल कांग्रेस के गढ़ रहे हैं। दूसरी ओर उत्तर 24 परगना, नदिया और उत्तर बंगाल के कुछ हिस्सों में मतुआ-शरणार्थी क्षेत्र में 2019 के बाद भाजपा मजबूत हुई।
हालांकि, इसका राजनीतिक असर हर जगह समान नहीं है। दक्षिण बंगाल में तृणमूल की पकड़ कुछ कमजोर होती दिख रही है, जबकि उत्तर बंगाल और जंगलमहल में भाजपा अब भी मजबूत है। लेकिन भाजपा का सबसे अहम सामाजिक आधार—मतुआ वोट—अब पहले जैसा सुरक्षित नहीं दिख रहा।
तृणमूल कांग्रेस के गढ़ माने जाने वाले जिलों उत्तर और दक्षिण 24 परगना, मुर्शिदाबाद, नदिया, मालदा, हुगली, हावड़ा, उत्तर दिनाजपुर और पूर्व बर्धमान में कुल मिलाकर करीब 66.6 लाख नाम हटाए गए हैं, जो राज्य में हटाए गए नामों का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा है। इन जिलों में 294 में से 178 विधानसभा क्षेत्र आते हैं।
साथ ही, मतुआ बहुल 55 सीट पर भी एसआईआर का बड़ा असर पड़ा है, जिससे भाजपा के भरोसेमंद वोट बैंक में अस्थिरता आई है।
बांग्लादेश सीमा से लगे जिलों में सबसे ज्यादा बदलाव देखने को मिला है, जहां नागरिकता और प्रवासन लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक मुद्दा रहे हैं।