नई दिल्ली
आजकल के पतझड़ के आखिर में हैलोवीन का माहौल देखने को मिलता है, जिसमें कृत्रिम मकड़ी के जाले, चमकते हुए 'जैक-ओ-लैंटर्न' (कद्दू से बने लालटेन) और मिठाइयों की कतारें नजर आती हैं। हैलोवीन को आमतौर पर तरह-तरह की वेशभूषा, सजावट, उत्सव और मिठाइयों के आदान-प्रदान से जोड़ा जाता है, जबकि इसकी ऐतिहासिक जड़ें मौसमी रीति-रिवाजों और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हैं। आज जब बच्चे किसी पड़ोसी के दरवाजे पर दस्तक देते हैं, तो वे एक ऐसी परंपरा का हिस्सा बन रहे होते हैं जो कई सदियों से विकसित होती आ रही है। यह प्रथा पड़ोसियों को एक-दूसरे से जुड़ने, आने वालों का स्वागत करने और हैलोवीन के सालाना जश्न के दौरान छोटे-छोटे उपहार बांटने का मौका देती है।
क्या आपने कभी सोचा है कि ये पुरानी परंपराएं आज के आधुनिक "ट्रिक-ऑर-ट्रीट" (trick-or-treat) में कैसे बदल गईं? आज के "ट्रिक-ऑर-ट्रीट" की शुरुआत यूरोप और उत्तरी अमेरिका के अलग-अलग हिस्सों में प्रचलित कई रीति-रिवाजों से हुई है। हैलोवीन, जिसे 'ऑल हैलोज़ ईव' (All Hallows’ Eve) भी कहा जाता है, 31 अक्टूबर को मनाया जाता है। समय के साथ, यह त्योहार वेशभूषा, अलाव, लालटेन और सामुदायिक समारोहों से जुड़ गया। ये रीति-रिवाज उन मौसमी परंपराओं के साथ विकसित हुए, जो पतझड़ से सर्दियों के मौसम में बदलाव का संकेत देती थीं।
हैलोवीन से जुड़ी एक प्रथा थी तरह-तरह के भेष बदलना, जिसे कुछ इलाकों में "गाइजिंग" (guising) कहा जाता था। युवा लोग घरों में जाते थे, गाने गाते थे या चुटकुले सुनाते थे, जिसके बदले में उन्हें सेब या सिक्के जैसे छोटे उपहार मिलते थे। वेशभूषा पहनने की यह परंपरा समय के साथ विकसित होती गई; आज के जश्न में बच्चे और बड़े अक्सर काल्पनिक पात्रों, सुपरहीरो, चुड़ैलों और अन्य किरदारों का रूप धारण करते हैं।
हैलोवीन में शरारत करने की परंपरा भी शामिल रही है। पुराने समय में, युवा लोग तरह-तरह की शरारतें करते थे, जैसे बगीचे के गेट को दूसरी जगह रख देना, दरवाज़े के हैंडल को आपस में बांध देना या खिड़कियों पर साबुन लगा देना। उत्तरी अमेरिका में, सामुदायिक समारोहों में धीरे-धीरे व्यवस्थित गतिविधियां और मिठाइयां बांटने का चलन शामिल हो गया। 20वीं सदी की शुरुआत में, बच्चों का मिठाइयों के लिए घरों में जाना काफी लोकप्रिय हो गया, जिससे "ट्रिक ऑर ट्रीट!" (Trick or treat!) वाली आधुनिक परंपरा की नींव पड़ी।
हैलोवीन की एक और जानी-मानी परंपरा कद्दू को काटकर लालटेन बनाना है। इससे पहले कि कद्दू इस त्योहार की मुख्य पहचान बनते, ब्रिटिश द्वीपों के कुछ हिस्सों में लोग शलजम और अन्य कंद-मूल वाली सब्जियों को काटकर उनमें चेहरे बनाते थे और लालटेन की तरह इस्तेमाल करते थे। यह प्रथा उत्तरी अमेरिका तक पहुंची, जहां कद्दू अपने बड़े आकार और आसानी से काटे जा सकने वाले गुणों के कारण एक लोकप्रिय विकल्प बन गए। आज, हैलोवीन के मौके पर नक्काशीदार कद्दू, बाहरी रोशनी और सजावट आम बात है। जिन घरों में ऐसी सजावट होती है, वे अक्सर यह दर्शाते हैं कि वे इस उत्सव में शामिल हैं और मिठाइयाँ लेने आने वाले बच्चों का स्वागत करने के लिए तैयार हैं।
अगले दिन, 1 नवंबर को पश्चिमी ईसाई परंपरा में 'ऑल सेंट्स डे' (All Saints’ Day) के रूप में मनाया जाता है। यह दिन संतों के सम्मान में मनाया जाता है, जिसमें चर्च में प्रार्थना सभाएँ और अन्य धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। यह 'ऑलहैलोटाइड' (Allhallowtide) का हिस्सा है—तीन दिनों का एक ऐसा समय, जिसमें 31 अक्टूबर को 'ऑल हैलोज़ ईव' (All Hallows’ Eve), 1 नवंबर को 'ऑल सेंट्स डे' और 2 नवंबर को 'ऑल सोल्स डे' (All Souls’ Day) शामिल होते हैं।
आखिरी दिन, 'ऑल सोल्स डे', दिवंगत लोगों को याद करने और उनकी आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना करने के लिए समर्पित है। इस मौके से जुड़ी एक पुरानी प्रथा 'सोलिंग' (souling) थी, जो मध्ययुगीन यूरोप के कुछ हिस्सों में प्रचलित थी। इसमें लोग (बच्चे भी शामिल होते थे) घरों में जाते थे और उन्हें 'सोल केक' (soul cakes) मिलते थे—ये छोटे, मीठे और मसालेदार बिस्कुट होते थे, जिन पर कभी-कभी क्रॉस का निशान भी बना होता था। बदले में, वे उस घर के दिवंगत सदस्यों के लिए प्रार्थना करते थे।
समय के साथ, आने वालों को खाना देने की यह प्रथा उन परंपराओं का हिस्सा बन गई, जिनसे आज का 'घर-घर जाकर हैलोवीन मनाने' का चलन विकसित हुआ है। जहाँ पहले 'सोल केक' दिए जाते थे, वहीं आज के समय में चॉकलेट, मिठाइयाँ और अन्य पैकेटबंद चीजें दी जाती हैं। छोटे-छोटे उपहारों का आदान-प्रदान आज भी इस परंपरा का एक अहम हिस्सा है।
'ऑल सोल्स डे' परिवारों द्वारा अपनों को याद करने से भी जुड़ा है। कई समुदायों में लोग कब्रिस्तान जाते हैं, कब्रों की साफ-सफाई करते हैं, मोमबत्तियाँ जलाते हैं और अपने दिवंगत रिश्तेदारों के लिए प्रार्थना करते हैं। इन परंपराओं के जरिए परिवारों को अपने प्रियजनों को याद करने और अपने पारिवारिक इतिहास से जुड़े रहने का मौका मिलता है।
हैलोवीन, 'ऑल सेंट्स डे' और 'ऑल सोल्स डे' मिलकर एक ऐसी परंपराओं की श्रृंखला बनाते हैं, जिनके अपने अलग-अलग उद्देश्य हैं। हैलोवीन में तरह-तरह की वेशभूषा (कॉस्ट्यूम), सजावट और सामुदायिक गतिविधियाँ होती हैं; 'ऑल सेंट्स डे' संतों के सम्मान में मनाया जाता है; और 'ऑल सोल्स डे' दिवंगत लोगों को याद करने पर केंद्रित है।
हालाँकि आज के हैलोवीन को अक्सर व्यावसायिक उत्सवों, शानदार वेशभूषा और मिठाइयों से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसकी परंपराओं में पुरानी धार्मिक और लोक मान्यताओं की झलक मिलती है। मौसमी रीति-रिवाजों, लोगों के बीच आपसी लेन-देन और दिवंगत लोगों के लिए की जाने वाली प्रार्थनाओं से शुरू हुई यह परंपरा सदियों के सफर के बाद आज एक ऐसे उत्सव में बदल गई है, जो पड़ोसियों को एक-दूसरे के करीब लाता है।