धरोहर संरक्षण में डिजिटलीकरण की अहम भूमिका: प्रो. प्रसाद

Story by  एटीवी | Published by  [email protected] | Date 04-08-2026
Digitization plays a crucial role in heritage conservation: Prof. Prasad
Digitization plays a crucial role in heritage conservation: Prof. Prasad

 

हैदराबाद।

मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय (MANUU) के सैयद हमीद लाइब्रेरी में सोमवार से "अभिलेखीय संग्रहों का डिजिटलीकरण एवं संरक्षण" विषय पर पांच दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का शुभारंभ हुआ। 3 से 7 अगस्त 2026 तक आयोजित इस कार्यशाला का आयोजन जामिया हमदर्द, नई दिल्ली और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA), नई दिल्ली के सहयोग से किया जा रहा है। कार्यशाला को भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR) का सहयोग प्राप्त है।

उद्घाटन समारोह में मुख्य वक्ता के रूप में भारतीय सांख्यिकी संस्थान (आईएसआई), बेंगलुरु के डॉक्टरल रिसर्च एंड ट्रेनिंग सेंटर (DRTC) के पूर्व प्रोफेसर प्रो. ए.आर.डी. प्रसाद ने कहा कि दुनिया में कोई भी चीज स्थायी नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं, युद्धों और असहिष्णु विचारधाराओं के कारण मानवता ने इतिहास में असंख्य बहुमूल्य पुस्तकें, पांडुलिपियां और साहित्यिक धरोहरें खो दी हैं। ऐसे में डिजिटलीकरण और संरक्षण की प्रक्रिया हमारी सांस्कृतिक एवं बौद्धिक विरासत को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी माध्यम बन चुकी है।

प्रो. प्रसाद ने कहा कि पुस्तकालयों ने नई तकनीकों को हमेशा खुले मन से अपनाया है। दुनिया के अधिकांश डिजिटल पुस्तकालयों की शुरुआत भी लाइब्रेरी संस्थानों ने ही की थी। उन्होंने कहा कि पुस्तकालयाध्यक्षों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण और सराहनीय है, क्योंकि उन्होंने ज्ञान के संरक्षण और उसके व्यापक प्रसार में ऐतिहासिक भूमिका निभाई है।

उर्दू भाषा पर अपने विचार रखते हुए प्रो. प्रसाद ने कहा कि उर्दू और हिंदी अलग-अलग भाषाएं नहीं हैं। दोनों भाषाओं का व्याकरण लगभग पूरी तरह समान है और उनकी लगभग 80 प्रतिशत शब्दावली भी एक जैसी है। उन्होंने कहा कि उर्दू में फ़ारसी शब्दों का प्रयोग उसकी भाषायी सुंदरता, काव्यात्मकता और संगीतात्मक प्रभाव को और समृद्ध बनाता है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सैयद ऐनुल हसन ने कहा कि पुस्तकालय समाज की साझा बौद्धिक संपत्ति होते हैं। प्रत्येक पाठक का पुस्तकालय पर समान अधिकार है और किसी भी व्यक्ति को ज्ञान तक पहुंचने से रोका नहीं जा सकता। उन्होंने कहा कि पुस्तकों के प्रति लगाव व्यक्ति की रुचि और अध्ययन के जुनून पर निर्भर करता है। इस अवसर पर कुलपति ने विश्वविद्यालय की पत्रिका 'अल-कलम' का भी विमोचन किया।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के संरक्षण एवं सांस्कृतिक अभिलेखागार विभाग के प्रमुख प्रो. अचल पंड्या ने डिजिटलीकरण के लाभ और चुनौतियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि डिजिटल अभिलेख तैयार करना जितना आवश्यक है, उनका सुरक्षित प्रबंधन और दीर्घकालिक संरक्षण उतना ही चुनौतीपूर्ण कार्य है। इसलिए डिजिटल डेटा के संरक्षण के लिए आधुनिक तकनीकों और सतर्कता की आवश्यकता है।

विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार प्रो. इश्तियाक अहमद ने कहा कि केवल अपनी विरासत का डिजिटलीकरण करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका व्यवस्थित संरक्षण भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह कार्यशाला प्रतिभागियों को अभिलेखीय सामग्री के डिजिटलीकरण, संरक्षण और आधुनिक तकनीकों की व्यावहारिक जानकारी प्रदान करेगी।

कार्यक्रम की शुरुआत सैयद हमीद लाइब्रेरी के मानद निदेशक प्रो. पी. फ़ज़ुल रहमान के स्वागत भाषण से हुई। कार्यशाला निदेशक एवं जामिया हमदर्द के विश्वविद्यालय पुस्तकालयाध्यक्ष डॉ. अख्तर परवेज ने कार्यशाला के उद्देश्यों और विभिन्न तकनीकी सत्रों की जानकारी दी। इस अवसर पर वरिष्ठ पुस्तकालय विशेषज्ञों को उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी किया गया।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. फैसल मुस्तफा, प्रभारी पुस्तकालयाध्यक्ष, ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया, जबकि डॉ. मोहम्मद आदिल खान, उप पुस्तकालयाध्यक्ष ने कार्यक्रम का संचालन किया। यह कार्यशाला अभिलेखीय धरोहरों के संरक्षण और डिजिटल भविष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल मानी जा रही है।