ईरान का राजकुमार कैसे बना पन्हाला किले का सादोबा पीर?

Story by  आवाज़ द वॉयस | Published by  [email protected] | Date 17-01-2026
How did an Iranian prince become Sadoba Peer of Panhala Fort?
How did an Iranian prince become Sadoba Peer of Panhala Fort?

 

नितिन सावंत परभणीकर

कोल्हापुर जिले का ऐतिहासिक पन्हाला किले सिर्फ बहादुरी की गाथा सुनाने वाला किला नहीं है, बल्कि यह गंगा-जमुनी तहजीब और हिंदू-मुस्लिम रूहानी विचारों के संगम का गवाह भी है। पन्हाला के ग्राम देवता और सभी धर्मों के लोगों की आस्था का केंद्र हजरत पीर शहादुद्दीन खतालवली का उर्स इन दिनों बड़े उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। 900 साल से भी ज्यादा समय से सामाजिक भाईचारे की विरासत को संजोने वाला यह समारोह महाराष्ट्र में बसी सूफी परंपरा का दर्शन कराता है।

इस उर्स के मौके पर, ईरान से पन्हाला आए इन महान संत और किले पर मौजूद उनकी खास दरगाह के इतिहास और अहमियत को बयां करता यह खास लेख..."इस दुनिया की हर चीज़ फानी (मिटने वाली) है, सिर्फ खुदा की ज़ात ही बाकी रहने वाली है।"(हजरत पीर शहादुद्दीन कत्तालवली उर्फ सादोबा की दरगाह में मौजूद कब्र पर लिखा वाक्य)

कुदरत की दौलत से मालामाल यह भारतीय ज़मीन, बौद्ध-चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाहियान से लेकर अरब से आए कई सूफी संतों तक, सभी को अपनी तरफ खींचती रही है। भारतीय ज़मीन को 'जन्नत' के लफ्ज़ से पुकारना, इस देश के लिए बड़े फक्र की बात है।

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हिंदुस्तान के बारे में अमीर खुसरो कहते हैं,

"हस्त मेरा मौलिद व मावा वत्तन,

किश्वरे हिंद बहिश्ते बर ज़मीन"

(हिंद मेरी जन्मभूमि और हिंद मेरा देश है। और यह ज़मीन पर मौजूद जन्नत है।)

इतना ही नहीं, सूफी संतों ने अपने बसाए शहर को 'जन्नत का शहर' (खुल्ताबाद) नाम देना, यह इस ज़मीन का बड़प्पन तो बताता ही है, साथ ही उस उदार, व्यापक और सबको साथ लेकर चलने वाली नज़र रखने वाले महान सूफियों का दिल कितना बड़ा था, यह भी हमें समझना होगा। वैसे भी किसानों को 'गंवार' समझकर नीचा दिखाने वाले लोग तो इस देश में हैं ही।

पन्हाला किले की सादोबा दरगाह की खूबसूरती

हजारों किलोमीटर का सफर तय करके हिंदुस्तान की ज़मीन और यहां के गरीब अवाम की खिदमत करके, इसी मिट्टी में सुपुर्द-ए-खाक होने वाले कई सूफियों की मज़ारें, दरगाहें और पीर हमें इतिहास के निशान दिखाते हैं। कोल्हापुर की मज़ारें, पीर और दरगाहों की दुनिया में पन्हाला किले की 'सादोबा' दरगाह बरबस ही हमारा ध्यान खींच लेती है।

कोल्हापुर शहर से करीब 20 किमी दूर पन्हाला किले के एंट्री गेट के पास ही यह खूबसूरत और दिलकश दरगाह मौजूद है। यह दरगाह करीब 15 गुंठा इलाके में फैली है और बगल में मौजूद दो ऐतिहासिक तालाबों के बीच में है। उस दौर के हुक्मरान इब्राहिम आदिलशाह के दौर में उनके मुख्य वज़ीर खिज़र खान ने यह दरगाह बनवाई थी। दरगाह के गेट के सामने वाला पराशर तालाब बेहद पुराना माना जाता है। बताया जाता है कि इसका निर्माण बहमनी और शिलाहार राजाओं के दौर में भी हुआ था।

तुर्की नक्काशी और खानदानी मज़ारें

दरगाह की कमान पर लिखा "हजरत पीर शहादुद्दीन कत्तालवली दरगाह पन्हाळा" यह नाम देखते ही हमारा ध्यान खींच लेता है। इस छोटे दरवाजेनुमा कमान से अंदर दाखिल होते ही, बेहद खूबसूरत पत्थरों की नक्काशी वाली कई मज़ारें दिखाई देने लगती हैं। महाराष्ट्र की दूसरी मज़ारों के मुकाबले इन मज़ारों के पत्थरों पर की गई नक्काशी और बनावट काफी अलग है।

ज्यादा जानकारी लेने पर स्थानीय मुसलमानों से पता चला कि वे 'तुर्की' स्टाइल की हैं। इस तरह की नक्काशीदार मज़ारें महाराष्ट्र में और कहीं नहीं हैं। ये मज़ारें मुख्य दरगाह के सामने वाले हिस्से में एक कतार में हैं। मुख्य दरगाह में दाखिल होते ही अंदर कुल तीन मज़ारें हैं। बाएं हाथ की तरफ वाली मुख्य बड़ी मज़ार हजरत शहादुद्दीन कत्ताल वली की है।

बीच वाली छोटी मज़ार उनके बेटे मासूम साहब की है। काफी बरसों बाद हजरत शहादुद्दीन कत्ताल वली को बेटा नसीब हुआ था, लेकिन कम उम्र में ही मासूम साहब का इंतकाल हो गया। मासूम साहब की मज़ार पर सूफी संत शहादुद्दीन कत्ताल वली ने अपने बेटे की मोहब्बत में फारसी भाषा में दिल को छू लेने वाली कविताएं उकेरी हैं। तीसरी मज़ार उनकी पत्नी मांसाहिबा की है।

ईरान से पन्हाला: एक ऐतिहासिक सफर

स्थानीय लोकभाषा में 'सादोबा' (साधु बाबा) के नाम से मशहूर ये सूफी संत ईरान देश के जनजान प्रांत से 12वीं सदी में, यानी करीब 900 साल पहले पूरे परिवार के साथ पन्हाला किले पर आए थे। उनका दौर ई.स. 1376 से 1397 का है। इस दौरान शहादुद्दीन बाबा को बहमनी राजाओं से शाही सुरक्षा मिली।

ई.स. 1347-1527 के दौरान यह किला भले ही बहमनी मुसलमानों की हुकूमत में था, लेकिन स्थानीय किलेदार मराठा (शिर्के) थे। सादोबा बाबा जब पहली बार पन्हाला आए, तो उन्होंने उस इलाके में पहली मुस्लिम बस्ती 'नबीपुर' (नेबापुर) के नाम से बसाई। सादोबा के वालिद ईरान के बादशाह थे। एकेश्वरवाद (तौहीद) के प्रचार के लिए उन्होंने राजपाट और ऐशो-आराम का त्याग कर दिया और महाराष्ट्र आ गए।

मराठा शासन में मिला राजाश्रय

पन्हाला किले पर सादोबा की कब्र पर और आस-पास फारसी भाषा में कई शिलालेख मौजूद हैं। इस दरगाह का निर्माण बीजापुर के बादशाह इब्राहिम आदिलशाह द्वितीय के वज़ीर खिज़र खान की देखरेख में हुआ है। आगे चलकर जब पन्हाला मुगलों के पास गया, तो औरंगजेब के भी दरगाह पर आने के सबूत मिलते हैं।

मराठा शासनकाल में यह दरगाह पन्हाला इलाके का 'ग्राम देवता' बन गई और उर्स को लोकाश्रय और राजाश्रय मिला। छत्रपति शिवाजी महाराज के पोते छत्रपति संभाजी महाराज (द्वितीय) के मंदिर से हर साल उर्स के दौरान सादोबा दरगाह पर गिलाफ (चादर) चढ़ाने की परंपरा है। यह परंपरा आज भी पन्हाला तहसीलदार के जरिए 'सरकारी गिलाफ' के तौर पर जारी है। राजर्षि छत्रपति शाहू महाराज ने इस दरगाह की देखरेख के लिए जमीन इनाम में दी थी और सोने का नारियल भी दान दिया था।

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धार्मिक सद्भाव और बराबरी का प्रतीक

मुस्लिम हिजरी कैलेंडर के मुताबिक रज्जब महीने की 24 तारीख को यह उर्स लगता है। एक दिन पहले सभी धर्मों की महिलाएं मांसाहिबा की 'ओटी भरने' की रस्म अदा करती हैं। यह दरगाह आदिलशाही और शिवकाल से आज तक सामाजिक एकता के प्रतीक के तौर पर लोगों के दिलों में बसी है। कोल्हापुर की अंबाबाई से लेकर राजर्षि शाहू महाराज तक यहां बराबरी का दर्शन कराने वाले कई महापुरुष हुए हैं।

सूफी परंपरा ने भी इस शहर में इंसानियत और बराबरी के विचार बोए हैं। सूफियों ने कभी भेदभाव नहीं किया; उन्होंने सबको एक ही पंगत में जगह दी और लोगों के दुख दूर किए। इसीलिए आज भी जनता कहती है कि बाबा के दरबार में जाने पर समस्याओं का हल निकलता ही है। हजरत पीर शहादुद्दीन कत्ताल वली के शेर की तरह— यह दुनिया भले ही फानी (नश्वर) हो, लेकिन ईश्वरीय तत्व और इंसानियत की यह विरासत हमेशा कायम रहती है।

(लेखक भक्ति और सूफी संत साहित्य के अभ्यासक हैं।)